गुरुवार, 21 जनवरी 2016

सिंदूर का बोझ!

एक औरत के लिए क्या होते हैं रिश्ते? यह सवाल रितिका को लगातार खाये जा रहा था. मांग में सिंदूर डालकर एक आदमी एक औरत को अपनी प्रेयसी बनाता है या फिर दासी, वह समझ नहीं पा रही थी. शादी के वक्त लिये तमाम वचन उसे तो याद हैं, फिर अमन क्यों भूल गया? अमन की चाहत हमेशा यह तो रहती है कि वह उसे प्रेयसी बनकर खुश रखके, लेकिन वह सिंदूर की मर्यादा भूल गया.

क्यों ना तो उसने धार्मिक आयोजनों में, ना निर्णयों में उसे शामिल किया. क्यों वह यह भूल गया कि अब उसे किसी और की तरफ ध्यान नहीं देना है, क्यों वह भूल गया कि वह उसकी पत्नी है, जिसका पालन- पोषण उसे करना है.यह तमाम एेसे सवाल थे, जो रितिका को परेशान कर रहे थे.

रितिका ने वह सबकुछ किया, जो अमन ने उससे करने को कहा, फिर आज एेसी क्या बात हो गयी कि वह उसे अकेला छोड़ गया. बड़ी निष्ठुरता के साथ आज अमन ने उससे यह कह दिया, मैं तुम्हें साथ नहीं रख सकता. लेकिन क्यों? रितिका ने तिलमिला कर पूछा था? अमन ने कहा, बस मेरी मजबूरी है, मैं अब तुम्हें साथ नहीं रख सकता. लेकिन क्यों रितिका ने अमन को झकझोर कर पूछा? अमन-क्योंकि मां-पापा ऐसा ही चाहते हैं. बिन जल मछली की तरह रितिका छटपटा गयी, लेकिन मैं कैसे रहूंगी.? रितिका के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था अमन के पास. वह चुप रहा. रितिका ने अपना हक मांगा, पत्नी हूं तुम्हारी. ऐसे कैसे छोड़ जाओगे, मुझे. अमन नहीं माना, कहा जाना पड़ेगा. रितिका ने सिंदूर का वास्ता दिया. लेेकिन अमन नहीं माना. रितिका ने कहा, मर जाऊंगी, तुम्हारे बिना. अमन -मैं भी नहीं जी पाऊंगा. रितिका उससे लिपट गयी, फिर क्यों जा रहे हो. क्यों आज फिर सीता को वनवास जाना पड़ेगा? अमन ने खुद को रितिका की बांहों से अलग किया, अगर वनवास पसंद नहीं, तो छोड़ दो मेरा साथ. बांध कर नहीं रखा है, मैंने. आजाद हो, कहीं भी जा सकती हो. लेकिन अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता. रितिका अमन के कदमों में गिर गयी, मत करो ऐसा. पत्नी हूं तुम्हारी. अमन-इनकार नहीं है मुझे लेकिन अब तुम्हारे-मेरे रास्ते अलग हैं.
यह कहकर चला गया था अमन, फिर कभी वापस ना आने के लिए. एक बार तो रितिका के जी में आया कि कूद मरे कहीं जाकर. लेकिन फिर उसने हिम्मत जुटायी, नहीं इतनी कमजोर नहीं है, रितिका. मैं अमन को यूं नहीं जाने दूंगी. वह ऐसे कैसे मुझे बर्बाद करके चला जायेगा. रितिका ने खुद से यह वादा किया कि वह खुद को इतना मजबूत करेगी कि अमन को उसके पास वापस आना होगा. खुद से किये वादे के बाद रितिका ने सबसे पहले फिर से अाफिस ज्वाइन किया. आफिस ज्वाइन करने के बाद रितिका के दिन तो कट जाते थे, लेकिन रातें....उसे याद नहीं कि कितनी रातों को उसने अमन के लिए रो-रोकर बिताया. कभी उसे कॉल किया, तो उसने बिजी होने की बात कहकर उससे बात नहीं किया या फिर कभी कॉल पिक ही नहीं किया. रितिका अब इन बातों की आदी हो गयी थी. अमन की उपेक्षा ने रितिका के व्यक्तित्व को ही बदलकर रख दिया.
पूरे दिन हंसने-खिलखिलाने वाली रितिका अब शांत गंभीर हो गयी थी. उसे दुख और सुख के बीच का अंतर झकझोरता नहीं था. आंखें भी सूख गयीं थीं. आंसू नहीं निकलते थे.
लेकिन उसे अब भी विश्वास था अमन उसके पास वापस आयेगा. हर दिन जब वह आफिस जाने के लिए तैयार होती, तो सिंदूर से अपनी मांग इस विश्वास से भरती कि अमन वापस जरूर आयेगा. भले ही उसे अपने इस विश्वास पर भरोसा नहीं रह गया था. उसे लगता वह तो ‘साहब बीवी और गुलाम’ फिल्म की छोटी बहू(मीना कुमारी) हो गयी है, जो अपने पति को अपने पास वापस लाने के लिए भूतनाथ (गुरुदत्त) से मोहिनी सिंदूर मंगाती है. लेकिन कोई मोहिनी सिंदूर और व्रत-त्योहार  अमन को रितिका के पास वापस नहीं ला सका.
चूंकि रितिका ने रिश्ते की डोर को कभी ढीला नहीं छोड़ा, इसलिए कभी-कभार अमन उससे मिलने आ जाया करता था. लेकिन वह मुलाकात एक पति और पत्नी की नहीं होती थी. वह दो अनजानों की तरह मिलते और फिर जुदाई. अमन को रितिका की तड़प कभी दिखाई नहीं देती थी. उसपर किस चीज का फितूर था और वह क्यों उसे छोड़ गया था, यह बात रितिका कभी समझ नहीं पायी.
एक दिन बाजार में रितिका को अमन की एक परिचित मिली. रितिका उससे बात करना नहीं चाहती थी, लेकिन औपचारिकता वश उसने उस महिला से बात की. दूसरों की फटे में पांव डालने की लोगों को आदत होती हैं, सो उसने कहा-‘ बड़ा बुरा है अमन. उसने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया. रितिका चौंक गयी. इसे क्या मालूम है. उसने पूछा-मतलब. उसे तंज करने का एक और मौका मिला. मतलब तुम्हें छोड़ किसी और को ले आया. मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह ऐसा करेगा. अब तो उसे अपना दोस्त कहते मुझे शर्म आती है.’
रितिका ने उसे टोकते हुए कहा‘ यह हमारा निजी मामला है. ऐसे कैसे तुम सबके सामने... मेरे पति के बारे में अनर्गल बातें  कर रही हो.
इसपर वह और तुनक गयी और चिल्लाकर कहा, मैं तो तुमसे सहानुभूति दिखा रही थी. वरना यह जो सिंदूर तुम्हारी मांग में है, वह अब तुम्हारा नहीं रहा. वेबवजह इस बोझ को ढो रही हो. मुझे क्या. इतना कहकर वह रितिका के सामने से चली गयी.
लेकिन रितिका के कानों में उसके शब्द गूंज रहे थे. रितिका की आंखें सूनी थीं, लेकिन कई सवाल उसमें एक साथ तैर रहे थे. घर पहुंचकर वह सीधी अपने कमरे में गयी. बैग रखकर वह आइने के सामने खड़ी हो गयी, उसने खुद को निहारा और खुद से सवाल किया-क्या सचमुच मेरा सिंदूर बोझ है?

रजनीश आनंद
21-01-16

बुधवार, 13 जनवरी 2016

रजाई, स्मार्टफोन और तुम...

जाड़े में रजाई का क्या महत्व है, यह उस इंसान से ज्यादा कौन जान सकता है, जिसने कड़कड़ाती ठंड में पूस की रात बिना रजाई के काटी हो. रजाई ऐसी चीज है जिसकी विशेषता बताने वाले अापको कई मिलेंगे. रजाई की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें नींद बड़ी प्यारी आती है. सुबह अगर आप छह बजे उठने के शौकीन हैं, तो याद रखें कि रजाई वो माशूका है, जो आपको आठ बजे तक खुद से अलग न होने दे.

रजाई का एक अहम गुण यह भी है कि अगर आप किसी से नजरें चुराना चाहते हैं, तो रजाई तान कर चुपचाप पड़े रहें, अगला आपको सोया हुआ समझकर चला जायेगा. युवा लड़के रजाई के इस गुण का खूब इस्तेमाल करते हैं. रात को घर लेट पहुंचे हों और पापा की डांट पढ़ने वाली हो, उससे पहले रजाई तान लें.

अगली सुबह तो ‘रात गयी बात गयी’ की तर्ज पर पापा का गुस्सा उतर गया होगा या फिर अगर गुस्से की तपिश कुछ बाकी भी रही होगी, तो वह उतना नुकसान नहीं करेगी. जितना रात को करती. अरे जरा कान इधर लाइए, रजाई की एक खास और सबसे अहम खूबी, तो मैं आपको बताना भूल ही गयी. अगर आप इससे वाकिफ हैं, तो कोई बात नहीं , इसे सुनी सुनायी बात जानकर भुला दीजिएगा, लेकिन अगर आपके लिए नयी है, तो मेरा आग्रह है कि आप भी इसे इस्तेमाल करें. यकीन मानिए मजा बहुत आयेगा.

 लव यू-आई लव यू टू के चक्कर में फंसे युवाओं को रजाई की यह खूबी भाती है. नहीं समझें, अरे मैं बात कर रही हूं इंटरनेट के जमाने के ‘चैटिंग लव’ की. पूरे दिन तो ये तोता-मैना की तरह कहीं ना कहीं मिल लेते हैं. लेकिन रात... यह तो काटे नहीं कटती. (युवा वर्ग बुरा ना माने) ऐसा नहीं है कि विरह की आग आज के युवाओं को ही अधिक जलाती है. हर युग में अपने प्रेम को पूर्णता देने की कहानियां हमारे देश में मौजूद है. फिर चाहे वह सतयुग हो या कलियुग.
इसलिए मैं आज के युवाओं के प्रेम पर कोई तंज कस रही हूं, राधे-राधे ऐसा पाप मैं कर ही नहीं सकती. मैं तो यह बता रही हूं कि किस तरह नयी तकनीक ‘लव बर्ड्‌स’ को जोड़कर रखती है. शाम को जल्दी-जल्दी काम निपटाकर जब दोनों बिस्तर पर होते हैं, तो स्मार्टफोन ही तो वह जरिया है, जो उन्हें जोड़कर रखता है. एक दूसरे के सांसों की खुशबू ‘वाया डाटा’ उनतक पहुंचती है. फिर तो बातें ‘आई मिस यू से आई लव यू और आई डाई विदआउट यू’ तक पहुंच जाती है.

लेकिन मैं बात रजाई के खूबी की कर रही थी, तो इस मधुर बेला में अगर मम्मी-पापा में से कोई एक आ जाये, तो रजाई आपके लिए ब्रह्मास्त्र है, उसे चलाइए और आराम से बच जाइए, कोई नहीं पूछेगा कि क्या हो रहा है.
कई बार तो जगे हुए में पापा के सामने भी लड़के-लड़कियां उनकी नजरों से बचते हुए रजाई के अंदर से मैसेेज कर देते हैं और पापा बेचारे को पता भी नहीं चलता. तभी तो कहते हैं ना पूस की रात तब और कातिलाना हो जाती है, जब साथ होते हैं रजाई, स्मार्टफोन और तुम...

रजनीश आनंद
13-01-16

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

गलती

रितिका का दुख यह था कि अमन ने उसे अपनी जिंदगी में दोयम दरजा दिया था. उस अमन ने जिसके बिना वह अपनी जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकती थी. अमन उसका पहला प्यार था. लेकिन उसी ने उसे दूसरा दरजा दिया.
इस दुख के साथ वह जी लेना चाहती थी. आखिर अमन उसकी ख्वाहिश था. सो अमन को अपनी पूरी जिंदगी सौंप वह सपनों की दुनिया में खोना चाहती थी. अतीत में कब क्या हुआ उसे इस बात से कोई लेना-देना नहीं था. वह तो बस खुली आंखों से सपने बुनना चाहती थी, जिसमें घोड़े पर सवार होकर उसका अमन आये और उसे दूर देश में ले जाये.

उसने खुद को अमन की चाहत के अनुरूप ढाला. अमन ने कहा, नौकरी छोड़ दो, रितिका ने बिना सवाल किये छोड़ दिया. उसने अपने पहनावे में भी अमन की इच्छानुसार परिवर्तन किया. रितिका ने खुद में वे सारे बदलाव लाये, जो अमन को पसंद थे. फिर भी एक खलिश जो अमन के मन में थी, उसे दूर ना कर पायी. अमन उसे चाहता तो था, लेकिन उतनी शिद्दत से नहीं, जितनी शिद्दत से वह अमन को चाहती थी. जब भी वह अमन की बांहों में होती, उसे यह अहसास होता, कि अमन उसे नहीं किसी और से मोहब्बत कर रहा है. इस अहसास को मिटाने के लिए रितिका ने अपने अस्तित्व को ही मिटा डाला.... और अचानक एक दिन जब उसने आईने में खुद को निहारा, तो उसे उसकी छवि दिखी, जिसकी जगह अमन के दिल में वो कभी नहीं ले पायी.

आईने के सामने वह ठिठकी, खुद को निहारा, रितिका के अस्तित्व की ऐसी मौत होगी, उसे उम्मीद नहीं थी. उसकी आंखों में आंसू थे.
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. आंसू पीकर रितिका दरवाजे तक गयी. छिटकनी खोला, सामने एक महिेला थी. रितिका को उसने ऊपर से नीचे घूरा, वह कुछ कह पाती, तब तक वह अंदर आ गयी. धम्म से सोफे पर बैठी. कहा, अच्छा, तो वो तुम्हीं हो, जिसे मेरा बेटा ब्याह लाया है. ऐसी कोई खूबी तो दिखती नहीं है, तुममें.
माथे पर बड़ा सा लाल टिका लगाये, वह महिला रितिका को जादूगरनी जैसी दिख रही थी. लेकिन वह इतना समझ गयी थी कि वह अमन की कोई रिश्तेदार है.

रितिका कुछ कहती, इससे पहले अमन घर के अंदर दाखिल हुआ और उस महिला को देख उसका चेहरा खिल गया. वह खुशी से लगभग चिल्ला उठा. अरे, ‘ तृप्ति बुआ तुम’. मैं जानता हूं कि मुझसे गलती हुई है, लेकिन ऐसे कोई बेटे से नाराज होता है क्या?

रितिका समझ नहीं पायी, अमन किस गलती की बात कर रहा है. तभी अमन ने उसे आदेश दिया. अरे खड़ी क्या हो, कुछ चाय-पानी लाओ बुआ के लिए. यह मेरी फेवरेट बुआ है और अब तुम्हें इसकी सेवा करनी है.

रितिका तुरंत अंदर गयी और चाय बनाने लगी. तभी उसके कानों में एक बात गयी. बुआ कह रहीं थीं ‘ देख अमन तूने गलती तो की है. कहां से उठा लाया इस लड़की को. ना हमारे जैसे कुल की है, ना जात की है और ना देखने में सुंदर है. अब तू अपने मां-बाप की भी अनदेखी कर रहा है. यह सही बात नहीं है. मैं तुम्हें समझाने आयी हूं. जो हुआ सो हुआ. अब बस कर और इसे इसके घर पहुंचा, बहुत दिन रह ली. और अपने मां-बाप से माफी मांग’. तभी तेरी गलती सुधरेगी.
बुआ की बात पर अमन ने कहा, ‘ हां गलती तो हुई है. लेकिन अब इसे इसके घर पहुंचाना संभव नहीं.’ इसके घर वाले हंगामा कर देंगे. चाय की प्याली रखते हुए रितिका ने अमन की बात सुनी. उसकी बातें रितिका को शूल की तरह चुभ रहे थे.
वह एक पल भी वहां नहीं रूकी. किचन में आकर रोने लगी. उसका कलेजा फटा जा रहा था. अपनी शादी को अमन जितनी आसानी से गलती बता रहा था, वह रितिका को बर्दाश्त नहीं हो रहा था. वह खाना बनाने के लिए गैस जला चुकी थी, लेकिन गैस में उतनी आंच नहीं थी, जितनी उसके दिल में थी.

तभी अमन की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ. कहां खोई हो, जल्दी करो, बुआ को खाना चाहिए. खाने की प्लेट सजाकर रितिका ने टेबल पर सजाया. आलू दम, पूरी, पापड़, खीर, सलाद. इतना खाना अगर वह अपने घर में बनाती, तो तारीफों के पुल बंध जाते. पापा और भैया तो ईनाम तक देते, लेकिन यहां तो बुआ पहला निवाला खाते ही चिल्ला उठी, अरे पूरी ऐसे बनती है क्या... अमन ने बुआ को रोका. इसपर वह थोड़ी शांत हुई. लेकिन बड़बड़ाना बंद नहीं किया. पहली वाली जैसी नहीं है. ना रूप में ना गुण में. जो सच है कह रही हूं, आगे तेरी मरजी. खाली प्लेट उठाते समय रितिका की आंखों में आंसू आ गये.

रात घिर आयी थी, रितिका ने बुआ के लिए बेड ठीक कर दिया और सोने के लिए अपने कमरे में चली आयी. अमन अभी अपनी बुआ से बातें कर रहा था. रितिका की इच्छा हो रही थी कि वह चीख-चीख कर रोये, लेकिन उसकी मजबूरी ऐसी थी कि वह चीख भी नहीं पा रही थी. उसके आंसू बह रहे थे.

रात को 12 बजे अमन कमरे में आया. उसने आते ही रितिका को बांहों में ले लिया. रितिका के आंखों में आंसू देखकर उसने कहा, अरे क्या बेवकूफी करती हो, बुआ-यूं ही बोलती हैं. अब गलती तो हमने की है, तो इतना तो सुनना ही पड़ेगा. अमन ने थोड़ा लाड़ दिखाया, तुमने खाना खाया? रितिका ने हां में सिर हिला दिया. अमन ने उसे बांहों में भर लिया.

रितिका ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन गिरफ्त बहुत मजबूत थी. वह विवश हो गयी. लेकिन उसने अमन का साथ नहीं दिया, उसका ध्यान तो बस उसी बात पर था, जब अमन ने कहा- ‘उससे गलती हो गयी है.’ वह सोच रही थी यह कैसी गलती है, जिसकी सजा उसे दिन के उजाले में तो कुछ और मिलती है और रात में कुछ और....

08-01-16

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

ना जाने कौन था वो...

ना जानें कौन था वो...

ना जानें कौन था वो...
मेरी बेख्वाब आंखों 
को ख्वाब दे गया,
पहचान तो दूर
नाम भी ना जान सकी थी मैं,
कहा था, उसने
जीवन भर का होगा हमारा साथ,
फिर क्यों मुझे बिलखता छोड़ गया,
ना जानें कौन था वो...
कहा था, उसने
अनुपम है मेरा सौंदर्य,
उसकी बातों पर ठीक से
गुमान भी नहीं कर पायी थी
कि, वो मुझे अकेला छोड़ गया
ना जानें कौन था वो...
उसकी बातों से मुझे
हुआ था एहसास अपनी पूर्णता का
फिर , क्यों वो मुझे अधूरा छोड़ गया
ना जाने कौन था वो...

रजनीश आनंद
29-12-2015


शनिवार, 26 दिसंबर 2015

सेकेंड हैंड हसबैंड का फर्स्ट हैंड प्यार

गूगल से साभार : प्रतीकात्मक तसवीर
टीवी पर आजकल एक विज्ञापन बहुत दिखाया जा रहा है, जिसमें यह बताया जाता है कि सेकेंड हैंड चीजों से भी प्यार करना चाहिए. विज्ञापन में एक युवक अपनी खुशी लोगों से इसलिए शेयर नहीं कर पा रहा है क्योंकि उसकी गाड़ी पुरानी है और वह हमेशा नयी चीजों से प्यार करता है.

आखिर क्यों यह मानसिकता इंसान के अंदर है. वह क्योें उन्हीं चीजों से प्यार करता है, जो पहली बार होता है, दूसरी बार होने से या तो उसका प्यार कम हो जाता है या फिर उस चीज में वह उत्साह और रोमांच नहीं होता. कुछ ऐसा ही हुआ है मेरी कहानी की नायिका रितिका के साथ. रितिका का पति उससे प्यार तो करता है, लेकिन बदले में उससे वैसा ही प्यार चाहता है, जैसा की उसकी पहली पत्नी उसे दिया करती थी. वह उसके पहनावे, बोलचाल अौर यहां तक की सेक्स के दौरान भी अपनी पहली पत्नी की छवि ढूंढ़ता है.
रितिका को यह बात पसंद नहीं. आखिर वह एक अलग इंसान है, उसका अपना अस्तित्व है, वह किसी की परछाई क्यों बने.
अब तक आप सोच रहे होंगे कि आखिर क्यों मैं आपको रितिका की कहानी सुना रही हूं. सच है. आपका रितिका से क्या लेना -देना. सही है. लेकिन मैं आपसे यह सब इसलिए कह रही हूं, क्योंकि हो सकता है कि आपके अंदर भी कोई रितिका हो. हो सकता है, आपके अंदर भी कुछ उसी तरह टूट रहा हो, जैसे रितिका के अंदर हर क्षण टूटता है. जो लोग कहानी लिखने में माहिर हैं, वह रितिका के जीवन पर एक अच्छी कहानी लिख सकते हैं.

तो सुनिए कुछ फैक्ट्‌स जिससे आप रितिका का दुख समझ सकेंगे. रितिका एक 25 साल की गेंहुएं रंग की लड़की है. चुनौतियों का सामना करना उसे पसंद है. प्रगतिशील सोच के साथ जीने वाली लड़की. उसके जीवन में सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था. तभी उसके जीवन में अमन आया. अमन अॅाफिस में उसका सीनियर था, उसकी उम्र 35-36 साल के आसपास होगी.
 उनका परिचय रितिका के बॉस ने करवाया था. वह काफी बड़ी-बड़ी बातें करता. आधुनिक सोच, समाज की कुरीतियों के खिलाफ बोलता. रितिका को हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता. सो रितिका उसे पसंद करती थी. एक दिन रितिका के साथ कुछ ऐसा हुआ कि वह अमन के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना करना ही भूल गयी. रितिका और अमन अॅाफिस के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद घर जा रहे थे. तब तक उनदोनों के बीच दोस्ती ही थी. लेकिन उस दिन....

रितिका के घर पहुंचने से पहले अमन ने एक जगह पर कार रोकी और कार की लाइट बंद कर दी. रितिका ने पूछा क्या हुआ. अमन ने रितिका का हाथ जोर से पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा. इससे पहले रितिका कुछ समझ पाती अमन ने उससे पूछा, मुझसे शादी करोगी. अमन के सवाल पर रितिका हैरान थी. उसके जवाब देने से पहले ही अमन ने उसके होंठों को अपने होंठों से सिल दिया, जिसके कारण रितिका कुछ बोल नहीं पायी.

 कुछ देर वैसे ही रहने के बाद अमन रितिका से अलग हो गया और उसने तेजी से कार को आगे बढ़ाया. कार सीधा रितिका के घर आकर रूकी. अमन के इस बर्ताव से रितिका परेशान थी. वह कुछ बोल नहीं पायी. अगले दिन अमन उसके घर तक आ गया और अंतत: तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दोनों की शादी हो गयी.

रितिका भले ही चुनौतियों से खेलने वाली लड़की थी, लेकिन उसके अंदर भी एक नारी सुलभ गुण थे. वह यह चाहती थी कि उसका पति या फिर जिससे वह प्यार करे, वह उसे दिलो-जान से चाहे. जब भी वह उसके पास हो, उसे कम से कम एक बार तो आई लव यू कह दे. वह उसके पास आये, तो वह सिर्फ उसका होगा.

बस इन्हीं अरमानों के साथ रितिका अमन की हो गयी. उसे उम्मीद थी कि उसका अमन उसे घर वो खुशी देगा, जिसकी उसे चाहत थी.

ससुराल की दहलीज में पांव रखते ही रितिका को कुछ अनोखे अहसास हुए, जिनसे उसका सामना कभी नहीं हुआ था. मसलन उसके ससुराल का कोई शादी में शामिल नहीं हुआ. अमन ने उस वक्त बहुत हिम्मत दिखाई. रितिका के घर वालों को भरोसा दिलाया. हर परिस्थिति में उसका साथ निभाने की कसमें खाईं. लेकिन ससुराल में जब पहले ही दिन उसकी मां ने रितिका पर गालियों की बौछार की, तो वह शांत रहा.

रितिका के लिए यह अलग से अनुभव था. इसके लिए वह तैयार नहीं थी. खैर उसके घर जाते ही उसकी सासुमां बोरिया-बिस्तर बांधकर गांव चली गयीं. रितिका और अमन के मिलन की पहली रात करीब थी. रितिका के अरमान फूल की तरह खिल रहे थे. वह समझ नहीं पा रही थी कि जब वह दोनों बिना किसी दीवार के आमने-सामने होंगे, तो क्या और कैसे होगा.

रात को अमन ने उसे बाहर खाना खिलाया और कुछ फूल खरीद वे वापस घर आ गये. अमन ने उसे गिफ्ट पैक पकड़ाया. उसमें एक मैरून कलर का गाउन और एक सोने का चेन था. अमन के कहे अनुसार रितिका ने उसे पहना और वापस बेडरूम में आयी.

अमन ने उसे बांहों में लिया. रितिका का दिल जोर से धड़क रहा था. रितिका को लगा, अभी अमन उससे यह कहेगा कि वह उसके लिए खास है. वह उसके लिए कुछ भी कर सकता है. लेकिन रितिका के सपनों जैसा कोई व्यवहार अमन ने नहीं किया. वह तो बस उसके शरीर को भोग लेना चाहता था. अमन के व्यवहार से रितिका खुश नहीं थी. लेकिन उसने सोचा शायद प्यार ऐसे ही होता होगा. दो-चार दिन ऐसे ही चला.

लेकिन एक दिन रितिका ने अमन से कह ही दिया, क्या तुम आते ही शुरू हो जाते हो, कभी तो मेरी बातें भी सुन लिया करो. कभी तो कहो, कि तुम मुझे कितना चाहते हो. अमन मुस्कुराया, कहा, यह सब फिल्मों में होता है. रितिका ने कहा, क्या प्यार में शरीर ज्यादा जरूरी है. मेरे लिए तो प्यार दो आत्माओं का मिलन है. अमन ने कहा, हां और तो आत्मा ऐसे ही मिलते हैं. यह कहते हुए वह फिर उसके करीब आ गया.

लेकिन आज रितिका तैयार नहीं थी. उसने कहा, नहीं, ऐसे नहीं होता है. तुम हमेशा शारीरिक सुख ही क्यों चाहते हो. क्या हमदोनों का संबंध बस इतना ही है. रितिका के मना करने पर अमन नाखुश हो गया. उसने कहा, तुमसे अच्छी तो मेरी पहली बीवी ही थी, जिसने कभी मुझे मना नहीं किया. उसके जाने के बाद मुझे लगा कि शायद तुम मुझे वो प्यार दे पाओगी. लेकिन नहीं तुम्हारे तो नखरे ही हजार हैं. ना तुम उसकी तरह सलीके की लड़की हो और ना उसकी तरह सुंदर. मुझसे ही गलती हो गयी, जो मैंने तुम्हें उसकी जगह देने की कोशिश की.

यह कहकर अमन पलटकर सो गया. लेकिन यह सच रितिका के लिए वैसा ही था, जैसे किसी ने उसकी जिंदगी छीन ली हो. वह अमन की दूसरी पत्नी है और अमन अपने पहले प्यार की तलाश में उसतक पहुंचा था. वह तो उसे चाहता ही नहीं. किसी और की परछाई उसमें ढूंढ़ रहा था. वह उसके लिए कोई मायने नहीं रखती. यह तमाम बातें रितिका के जीवन का टर्निंग प्वाइंट थे, जिसमें उसके सेकैंड हैंड हसबैंड ने उससे फर्स्ट हैंड प्यार की चाहत की थी. लेकिन इन सब में जो सबसे बुरा हुआ वह यह था कि रितिका का
पूरा वजूद उससे छीन गया था.

तो यह थी मेरी रितिका की कहानी. जिसकी शुरुआत मैंने यहां पर की है. उसके जीवन के अन्य पक्षों से मैं आपको रूबरू कराती रहूंगी. यह एक प्लॉट है, जिसका उपयोग कथाकार कर सकते हैं. अगर यह सब्जेक्ट उन्हें पसंद आये. तो आज के लिए प्रणाम.
रजनीश आनंद
26-12-2015

बुधवार, 23 दिसंबर 2015


...क्योंकि यह टेस्ट का मामला है!
आज ब्लॉग की दुनिया में यह मेरा पहला कदम है. कदम तो पहले ही रखना चाहती थी, लेकिन कुछ ‘एक्सक्लूसिव’ करने की चाह में हिम्मत नहीं कर पायी थी. पत्रकारों को ‘एक्सक्लूसिव’ करने की चाहत बहुत होती है और चाहत साली इतनी कुत्ती चीज होती है कि आपको हर तरह से बाध्य करके रख दे. खैर अब बाध्यता नहीं रही, मैंने अपनी चाहत पर लगाम कस ली है और आपके सामने हूं. भारतीय मिट्टी की उपज हूं, सो श्रीगणेशाय नम:, बिसमिल्लाह या फिर ‘इन द नेम अॅाफ गॉड’ कहकर शुरुआत करना चाहती हूं.
असहिष्णुता के इस दौर में मैं आपको बताना चाहती हूं कि मुझे हमेशा अपने घर के तौर-तरीकों से ज्यादा दूसरों की तहजीब भायी.
जन्म से हिंदू हूं इसलिए प्रणाम, नमस्ते कहकर अभिवादन करती आयी हूं. पैर छूना भी हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है. लेकिन कहीं से ‘वालेकुम सलाम’ की आवाज सुनायी दे, तो मैं रोमांचित सी हो जाती हैं. यह मेरी निजी पसंद है. मेरी इस बात से हर कोई इत्तेफाक रखे, यह जरूरी नहीं है. लेकिन मैं यहां अपनी कहने आयी हूं, सो अपनी बात कह रही हूं.
हां एक बात और, यह एक औरत का ब्लॉग है इसलिए उसकी बातें तो यहां होंगी ही. उसकी पसंद, नापसंद, महत्वाकांक्षा, इच्छा, पीड़ा और सेक्स सबकी बातें मैं यहां करूंगी. अब देखना यह है कि मैं अपनी बातों को आपके सामने उस तरह रख पाती हूं या नहीं, जैसे की मैंने रखने का सोचा है. अगर मैं अपनी बातों को उस तरीके से नहीं रख पायी, तो जल्दी ही मैं आपको अलविदा भी कह दूंगी.

सधन्यवाद
रजनीश आनंद
23-12-2015