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सोमवार, 6 जून 2016

फिर क्यों भर आती हैं आंखें मेरी?

आह, कितना सुख है, तुम्हारे आलिंगन में
जिस प्रेम की थी जन्मों से तलाश, अब जाकर पाया मैंने
जब झांकती हूं तुम्हारी आंखों में, तो प्रेम का उफान नजर आता है मुझे
तुम्हारा स्पर्श देता है अपनेपन का सुख
सीने में जब तुम्हारे छुपा लेती हूं मैं अपना चेहरा
प्रतीत होता है मानों दुनिया सिमट आयी मेरे इर्द-गिर्द
और तुम अपने प्रेम से सराबोर कर देते हो मुझे
फिर भी ना जानें क्यों बरस जाती हैं आंखें मेरी?
प्रेम का यह स्वरूप अब तक अनुभव से परे था मेरे
साकार किया तुमने उन ख्वाबों को जो दम तोड़ती सी दिख रही थीं
सोचती हूं कि कौन हो तुम?
मसीहा कहूं, तारणहार या फिर सखा तुम्हें
जिसने भर दिये मेरे जीवन में इंद्रधनुषी रंग
लेकिन जब भी देखती हूं, तुम्हारी मुख की ओर
तुम मुझे लगते हो इन सब से परे मेरे श्याम
जिसके लिए मेरे मन में है प्रेम बस प्रेम....!
 रजनीश आनंद
  06-06-16

सोमवार, 9 मई 2016

प्रेम की भाषा...

रात झरोखे से जो मैंने देखा चांद को
उसने इतराकर कहा, ऐसे क्या देखती है
मैं प्रिये नहीं तुम्हारा, नहीं करता तुमसे प्रेम
मैंने हंसकर कहा, क्या अब तुझे मेरा देखना भी नहीं है गंवारा,
क्या करूं मैं, जो मुझे तुझ में दिख जाती है अक्स अपने श्याम की
वो दूर है मुझसे और ये भी कहता है, प्रेम नहीं करता मुझसे
लेकिन मैं जानती हूं उसके होंठ कुछ और नेत्र कुछ और कह रहे हैं
उसके आंखें कभी झूठ नहीं बोलतीं
जिसमें मुझे अपने लिए दिखता है, तो सिर्फ प्रेम और कुछ नहीं
इस बार चांद ने तंज कसा, तू भ्रम में है शायद
मैं भी कहां हार मानने वाली थी
कहा उससे, तुम क्या जानो प्रेम की भाषा
क्या कभी किया है किसी से प्रेम?
मेरी इस बात पर चांद ने मुस्कुराकर कहा
अच्छा तो तू ही बता दे, क्या है प्रेम की भाषा
मैंने कहा, तो सुन, जब मैं कहती हूं अपने प्रिये से
ए सुनो ना, मुझे तुमसे नफरत है,
तो पता है उनको क्या सुनाई देता है?
इस बार चांद ने रुखाई से पूछा, क्या?
मैंने कहा, उनके कानों में गूंजता है यह मधुर स्वर
कि मुझे उससे है आगाध प्रेम, असीमित प्रेम
मेरी इस बात पर चांद ने मुस्कुराकर कहा, हां
मैं समझ गया प्रेम की भाषा और उसने ले लिया मुझे अपने आगोश में
जहां था तो सिर्फ प्रेम और प्रेम...
रजनीश आनंद
09-05-16