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रविवार, 23 अगस्त 2020

धीरज और सृजन

धीरज और सृजन औरतों के ऐसे शस्त्र हैं
जिनका मुकाबला करना ब्रह्मास्त्र के लिए भी संभव ना था
तभी तो अश्वत्थामा का प्रहार खाली गया था
जानते थे कृष्ण औरतों के इस शस्त्र को
तभी तो बदल दिया था उन्होंने परीक्षित का भाग्य
स्त्री धीरज रखती है, अश्रु का सहारा लेकर
वह जानती है शस्त्र घातक हैं मानव समाज के लिए
जो उपहास करते हैं अश्रु का
उन्हें रोकर देखना चाहिए, यह मात्र कुटिलता नहीं 
सहजता है सबकुछ संवारकर, सहेजकर रखने की
स्त्री सबकी चिंता करती है, इसलिए वो रोती है
धीरज धरती औरत तो बिकती आयी है बाजारों में
समाज उस सृजन को दरकिनार कर रहा है
जो औरतों के पेट में नहीं, समाज की कोख में पल रहा
लिंगभेद ने छीना है बच्चियों और उसकी मुस्कान को
फिर भी औरत धैर्य से सृजन कर रही है अनगिनत अश्वत्थामा का... 

रजनीश आनंद

शनिवार, 6 जून 2020

स्त्री और स्मृति

तीक्ष्ण स्मृति की होती हैं स्त्रियाँ
वह कभी कुछ भूलती नहीं
नफरत, प्रेम सब सहेजती हैं
अपने केशों में छुपाती हैं प्रेम 
तो अश्रु में अपमान-दुत्कार
 केशों को सहलाना उसका शगल है
दरअसल वह दुलारती है हर प्रेम निवेदन को
वो याद करती है पहले प्रेमी का वो पहला चुंबन
जिससे दो गज की दूरी पर भी नहीं हुई कभी भेंट
किंतु उसकी गरमाहट मौजूद होती है 
उसके सबसे खास रिश्तों में
उसके हाथों की रोटियों की कोमलता में
स्त्री का प्रेम उसके जीवन की बाधा नहीं
उसके जीवन की सीख है, इसलिए स्त्री 
हमेशा करती है अपने प्रेम पर मान
और अपमान से सींचती है घर आंगन
ताकि लहलहाती रहे खुशियाँ... 

-रजनीश आनंद-

गुरुवार, 7 मई 2020

बड़ी की सब्जी

उस दिन बड़े प्यार से
मैंने बनायी थी बड़ी की सब्जी
जैसे बनाती थी दादी मेरी
इंतज़ार किया था, घंटों उसका
हाँ, श्रृंगार भी किया था, 
लेकिन सिर्फ मन का
उसे रिझाना मेरे बस में नहीं था
इसलिए तो बस उम्मीद की डोर बांधे थी
काश की वो इस डोर के खिंचाव को महसूस करता
इसी उम्मीद में मैंने डोर कुछ ज्यादा ही खिंची
भौतिकी में पढ़ा था प्रत्यास्थता सीमा
संभवतः मेरी उम्मीद उसी सीमा को लांघ गयी
तब मिला मुझे जिंदगी का मूलमंत्र
रिफाइन में नहीं, सरसों के तेल में बनती है
सबसे अच्छी बड़ी की सब्जी... 

रजनीश आनंद

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

हम मुस्कुराने वाले...

जिंदगी प्रेमिका की उलझी लटें नहीं
जिसे आप सुलझाना चाहें मुस्कुरा कर
यह तो किसी वृद्धा के उलझे केश के गुच्छे हैं
जिसे सुलझाते हुए कई बार काटना भी पड़ता है
एक पीड़ा और भावुकता के साथ
जिंदगी वह काली स्लेट है, जिसपर नाम और ख्वाहिशें
आंसुओं के डस्टर से पोंछे जाने के बाद ही
स्पष्ट लिखी जा सकती हैं, ऐसा क्यों? 
यह पूछने का अधिकार नहीं हमें
सिर्फ हर घटित पर प्रतिक्रिया के अधिकारी हम
आंसुओं को पीकर, हम मुस्कुराने वाले... 

रजनीश आनंद

मंगलवार, 21 मार्च 2017

शुभ संकेत

एक जुगनू आज
मेरे बिस्तर पर
कुछ यूं मंडराया
मानों दे रहा हो
कोई शुभ संकेत
मैंने भी आस का
दामन थाम लिया
सुना था कहीं
शुभ होता है यूं
जुगनुओं का मंडराना
जीवन के संघर्षपथ पर
संकल्पशक्ति के साथ
जब मिलाप होता है
ऐसे शुभसंकेतों का
तो इससे जन्मी ऊष्मा
इंसान को प्रेरित करती है
जूझने के लिए
जुगनू की रोशनी
कब बन गयी सूरज की
मुझे पता भी ना चला
लेकिन मैंने देखा सूरज को
मेरे लिए जलते हुए...
रजनीश आनंद
21-03-17

शनिवार, 11 मार्च 2017

फिशपॉट

मेरे कमरे के कोने में
पड़ा है एक फिशपॉट
चार-पांच मछलियां
हमेशा तैरती दिखतीं हैं
कमरे होने वाली हर
हलचल से दूर पानी में गोते खातीं हुईं
बिलकुल वैसे ही जैसे
मेरी दुनिया सिमटी है तुम्हारी बांहों मेंं
जब तुम अपनी बांहों को खोलकर
कहते हो आओ प्रिये
और समेट लेते हो मुझे
तो मैं कहना चाहती हूं
बहुत कुछ अपने मन की
लेकिन जुबान साथ नहीं देते
हलक तक आकर रह जातीं हैं बातें
हां, तुम चाहो तो पढ़ लो मेरी आंखें
इनमें अंकित हैं मेरे मन की बातें
तुम बिन कितनी रातें मैंने
आंखों में बिताई, कितने सपने संजोए
इसपर साफ लिखा है
तुम्हारे स्पर्श की नरमाई,सिहरन और
जादुई बातें हैं मेरे जीवन का फिशपॉट
जिनमें डूबकर जीना चाहती हूं मैं...
रजनीश आनंद
11-03-17

मंगलवार, 7 मार्च 2017

तुम्हारे नाम की गूंज...

हिज्र की रातों में
आंखें मूंदें मैं लेना चाहती हूं तुम्हारा नाम
एक बार नहीं, कई बार
ताकि महसूस कर सकूं तुम्हें
मैं जितनी बार पुकारती हूं तुम्हारा नाम
तन-बदन में मौजूद सिहरन
और तड़प दे जाती है सुकून
मैं खोना चाहती हूं
तुम्हारे नाम की गूंज में
ताकि फिजाओं में गूंजें
हमारे मिलन की ध्वनि
और तुम आकर मेरे
कानों में फुसफुसा जाओ
तुम मेरी, हां सिर्फ मेरी हो
फिर कुछ और सुनने की
चाह शेष रह जायेगी क्या भला?
रजनीश आनंद
07-03-17



शनिवार, 4 मार्च 2017

मौसम हुआ रूमानी...

अचानक मौसम कुछ यूं हुआ रूमानी
जैसे कभी-कभी तुम हो जाते हो
ऐसे में बादलों को बरसता देख जी किया
मैं सिमट जाऊं आकर तुम्हारी बांहों में
अदेह स्वरूप में ही सही, मैं रहना चाहती हूं
गिरफ्त में तुम्हारी बांहों के हमेशा
तभी तो छतरी को खोल मैं निकल गयी थी सड़क पर
तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने, कुछ देर जीने
छतरी के घेरे ने कराया तुम्हारे होने का एहसास
मैंने उसे ऐसे थामा जैसे थामना चाहती हूं तुम्हें
आज तुमसे बात करने की बहुत थी चाह
इसलिए मैंने खूब कही अपने मन की
जानते हो मैंने सवाल खुद किया और
तुम्हारी तरफ से जवाब भी दे दिया
ख्यालों में ही सही तुम सुनते रहे मुझे
यूं तो मैं जानती हूं अपने बारे में
हर छोटी-बड़ी बात लेकिन
जब तुम कहते हो उन्हें
अहसास कराते हो मुझे की मैंं खास हूं
तो सुकून मिलता है. जैसे अभी मिल रहा है
धरती से टकराती इन बारिश की बूंदों को देखकर
एहसास हो रहा है मानो मिल रहे हों हम-तुम...
रजनीश आनंद
04-03-17

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

मुट्ठी में खुशी...

जिंदगी की जद्दोजहद ने
छिन ली थी मेरे होंठों की हंसी,
जो मुस्कान दिखती थी
वो दरअसल झूठ का पुलिंदा थी
खोखली हंसी, जिसकी गूंज में
साफ सुनाई पड़ जाती थीं मेरी सिसकियां
मेरा दिल हमेशा कहता था मुझसे
सुन ले तू कभी मेरी भी, तो
आज उसकी बात का असर
दिख गया मुझपर और
मैंने जिंदगी के दामन से
एक चीज चुराकर
कस कर जकड़ लिया है मुट्ठी में
सोचा है अब कभी नहीं छोड़ूगी उसे
परिस्थिति चाहे लाख विकट हो,
तभी मेरी नजर राह चलते
एक बच्चे पर पड़ी
धूल से सने, उस फटेहाल बच्चे की
नजर मेरी मुट्ठी पर थी
शायद वो जानना चाह रहा था
मेरी मुट्ठी का रहस्य
मैं घबराई, सोचा कहीं इसकी नजर
मेरी उस संपत्ति पर तो नहीं
जिसे चुराया था मैंने जिंदगी के दामन से
शायद उसने पकड़ ली थी मेरी चोरी
सहसा वो मेरे नजदीक आया
मेरी आंखों में झांकर कहा उसने
जो तेरी मुट्ठी में है उसे बांट मेरे संग
तेरी खुशी दोगुनी हो जायेगी
मैं उससे बचना चाह रही थी
लेकिन वो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था
मैंने सोचा जब इसे पता ही है
मेरी चोरी का, तो बांट लेती हूं
उस खुशी को जिसे चुराकर रखा था
मैंने अपनी मुट्ठी में कैद करके
बच्चे के सामने मैंने ज्योंही खोली मुट्ठी
उसके होंठों पर थिरकी मुस्कान और आंखों में चमक
उसकी खुशी देख मैं खिलखिला उठी
लेकिन उसकी गूंज से सिसकियां गायब थी
बस सुनाई दिया था , तो सिर्फ तुम्हारे आने का संदेश...
रजनीश आनंद
03-03-17

बुधवार, 1 मार्च 2017

ठूंठ बना रिश्ता

क्यों ठूंठ बन गया हमारे रिश्ते का पौधा?
कभी जानने की कोशिश की तुमने?
याद करो वो दिन, जब बड़े उत्साह से
हमदोनों ने रोपा था अपने रिश्ते का बीज
रोज पानी से सींच कर मैंने उसे अंकुरित किया थ
तुम भी तो खुश थे उसके शैशव रूप को देखकर
उसकी हरी-हरी पत्तियां मन को लुभाती थीं
मैं तो अकसर उन पत्तियों को छूकर 
जी लेती थी अपने रिश्ते की गहराई को
वह झाड़ का रूप ले चुका था, लेकिन
चाह थी मेरी कि वह बन जाये बरगद
ताकि भरी दुपहरी में उसकी छांव हमें शीतलता दे
और जब जी चाहे हम-तुम उसकी मजबूती से पा लें सहारा
लेकिन आह!! ये हो ना सका
बरगद का सपना, आंखों से आंसू बन बह गया
समय ने नहीं दिया हमें उस पेड़ को सींचने का मौका 
और तुमने उठा दिया उस पौधे के अस्तित्व पर सवाल
मुझे लगा जैसे जीवन ही शेष नहीं बचा
लेकिन मैंने कसम खाई, नहीं-नही
मैं मरने नहीं दूंगी इस पौधे को
मैं सींचूगी इसे, बरगद बनाऊंगी
इसके फूल और फल को पुष्पित होने का पूरा मौका दूंगी
मैं जुटी रही अपने प्रयासों में
कोई दिन ऐसा नहीं गया जब
मैंने उस पौधे की थाह ना ली हो
जब मैं उसके पास जाती वो
निरीह नजरों से मुझे देखता भी था
उसे तुम्हारी तलाश थी, लेकिन 
उसकी आस नहीं हुई पूरी
पौधा था तो कुछ फल भी आय
लेकिन वो फल भी नहीं बदल सके
इरादा तुम्हारा और विपरीत परिस्थितियों की मार में
अंतत: ठूंठ हो गया हमारे रिश्ते का पौधा
ना तो मेरे आंसू, ना निवेदन बचा सका इस पेड़ क
मैंने कारण बहुत जानने की कोशिश की
आखिर क्यों मृत हुआ यह पेड़
तो ज्ञात हुआ उसकी जड़ हो चुकी थी खोखल
फिर पौधा, पेड़ कैसे बनता?
अब जबकि कुछ भी नहीं है शेष
तुम्हें अचानक क्यों यह सवाल परेशान कर रहा है
कि क्यों मर गया वो पेड़?
अब पेड़ को बचाने के लिए
मेरे पास ना तो ऊर्जा बची ना आस
इसलिए ना पूछो ये सवाल
खुश रहो, क्योंकि मैं ये नहीं भूली कि
हमने साथ बोया था रिश्ते का बीज
भले ही बरगद ना बन पाया वो
लेकिन अफसोस नहीं मुझे इस बात का
जो हुआ वो अच्छे के लिए हुआ होगा
शायद हमारे रास्ते कभी एक ना थे
तभी तो ठूंठ हुए रिश्ते को देख
अब सिहरन भी नहीं होती मुझे...
रजनीश आनंद
01-03_17

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

उम्मीद

जीवन  में क्या मायने हैं उम्मीद के?
यह सवाल मेरे लिए बेमानी था तब तक,
जब तक की मैंने नहीं थामा था दामन इसका
पर ज्योंही मैंने उम्मीद को आगोश में लिया
वह धंस सा गया मेरे सीने में
मैं पिघलती गयी उसके सीने से लगकर
और वह मेरी कमजोरी बनता गया
जकड़ लिया बिलकुल उसने मुझे
फिर शातिर खिलाड़ी की तरह उसने कुतरे मेरे पर
मैं झटपटाई, लेकिन कुछ कर ना पायी
उम्मीद ने तो कैद कर लिया था मुझे पिंजरे में
सपने टूटे, वास्तविकता सामने थी मेरे
उम्मीद का चेहरा क्रूर होता जा रहा था
मैं डरने लगी थी उससे और उसका आगोश
चुभने लगा था मुझे, तब समझ पा रही थी मैं
उम्मीद के टूटने का दर्द, हां अब भी स्मरण है
जब पहली बार टूटी थी उम्मीद
प्रतीत हुआ था चांदनी रात में
छा गया हो अमावस जैसे
बहे थे इतने आंसू कि पोंछने की
इच्छा ना रही थी शेष, लेकिन
अब मैं समझ गयी हूं
उम्मीद है , तो सकारात्मक अनुभूति
किंतु जो इसका गुलाम हुआ इसने
दोजख से बदतर कर दी उसकी जिंदगी
इसलिए प्रण किया है मैंने
उम्मीद से प्रेम तो करूंगी, लेकिन
नहीं बनने दूंगी उसे मेरा भाग्यविधाता
क्योंक नकारात्मकता से मुझे चिढ़ है
जीवन सुंदर है इसे एक उम्मीद पर कुर्बान क्यों करना?
रजनीश आनंद
24-02-17

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

...जिसपर लिखा था सबसे छुपाकर तुम्हारा नाम

रात की तन्हाई में जब भी
मैं किताब को थाम कर बैठती हूं
तुम्हारे आसपास होने का एहसास
करा जाती हैं हवाएं.
कानों में चुपके से कहतीं हैं
सोना नहीं वो आयेगा
सजा ले सपने तू पलकों पे
सुन कर उसकी बात मैंने
लजाकर ज्यों किताब को भींचा
हैरान हो गयी मैं
किताब में धड़क रहा था तुम्हारा दिल
धड़कते दिल की बात समझने की
चाह में मैंने पलटा ज्यों किताब का पन्ना
तुम्हारी प्यारी आवाज कानों में गूंज गयी
जिसने किया मुझसे ये वादा
तुम हर पल साथ खड़े हो मेरे
देह या अदेह, स्वरूप कोई भी हो
तुमने थाम रखा है हाथ मेरा
तुम हर संघर्ष में हो साथ मेरे
पहाड़ से मजबूत इरादों के साथ
तुम्हारे वादे पर यकीन कर मैंने
किताब को चूम लिया
जिसपर लिख रखा था
सबसे छुपाकर मैंने नाम तुम्हारा...
रजनीश आनंद
23-02-17

जीवन की धुरी

घड़ी की सुइयों से जुड़ गया है
कुछ ऐसा नाता कि 
कभी-कभी मालूम होता है
जैसे मैं खुद घड़ी की सुई
बन घूम रही हूं उसकी धुरी पर
सुबह के पांच बजते ही 
घड़ी का अलार्म कानों में 
कहता है बस , अब और नहीं
बिस्तर को नहीं है तुम्हारी जरूरत
उठो कि कई काम है तुम्हें निपटाने
ब्रश को हाथ में पकड़े-पकड़े
मैं कर लेती हूं कई प्लानिंग
घर-बाहर की जिम्मेदारियां निभाते
कभी-कभी महीनों बीत जाते हैं
खुद से बातें किये, सोचे हुए
लेकिन मैं खुश हूं, क्योंकि कायम है
मेरी पहचान, मैंने मिटने नहीं दिया है
उस अस्तित्व को जो मुझे कराता है
एहसास मेरे जिंदा होने का
जिसकी अपनी खुशियां हैं
और अपने फैसले भी, जिन्हें
मैं स्वयं गढ़ती हूं, अपने लिए...
रजनीश आनंद
22-02-17

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

... रात की खामोशी कलरव में बदल गयी

मेरी बोलती रातें अचानक
यूं खामोश हुईं कि उसकी
आह तक नहीं पहुंच पा रही थी मुझतक
मैं तरस गयी थी उसकी एक हां सुनने को
लेकिन उसने इस कदर अलग किया था
खुद को मुझसे कि चाहकर भी
जकड़ ना पायी मैं उसे, खामोशी के साथ
आंखों में सारी रात गयी.
अहले सुबह जब मैंने खोला घर का दरवाजा
चांद को चमकते देखा आंगन में
एक उम्मीद सी जागी, लगा अभी बहुत कुछ है शेष
तभी फागुनी बयार ने हल्के से छुआ मुझे
जैसे दे गया हो किसी का संदेश
लेकिन मन को भरोसा ना हुआ
सुबह का अखबार हाथ में लिये
 मैं चली आयी कमरे में
रोजमर्रा के काम तो निपटाती गयी मैं
लेकिन रात की खामोशी,
मन में वाचाल थी, जो अंदर से तोड़ रही थी मुझे
सुबह की पहली चाय की प्याली को उठा
ज्यों होंठों से लगाया, वो फीकी चाय
करा गयी मुझमें किसी की उपस्थिति
उस उपस्थिति को कस के जकड़ा मैंने
मन को समझाया, इंतजार कर सब ठीक होगा
मंजिल से दूर नहीं तू पास है बिलकुल
इस सकारात्मकता को मन में लिये
भारी कदमों से मैं चली थी आफिस की ओर
तभी मेरे फोन की घंटी कुछ यूं बजी
कि रात की खामोशी कलरव में बदल गयी
मन चहक उठा, नयन बरस गये
क्योंकि मजबूती के साथ खड़ी थी ‘जिंदगी’...

रजनीश आनंद
21-02-17

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

एक द्वंद्व सुबह-शाम

एक द्वंद्व सुबह -शाम,
चला मेरे मन में आज
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है?
आफिस की सीढ़यों को गिनते हुए
जब मैं पहुंची अपने कमरे तक
कई पुरानी यादें मेरीे मानसपटल पर छा गयीं
बचपन से आजतक टूटें कई सपने मेरे
टूटे हुए खिलौनों की कसक
अब भी हैै मन में बाकी
वे खिलौने पूछते हैं मुझसे
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं?
कंप्यूटर के की-बोर्ड को दिनभर खड़खड़ती मैं
खबरों को लिखती -सुधारती मैं
कहीं सदन में मारपीट, कहीं आतंकी हमला
किसी अभिनेत्री का यौन शोषण,
तो किसी नये खिलाड़ी का उद्भव
द्वंद्व फिर उभरा क्या जीवन में
कुछ भी स्थायी नहीं है?
बचपन की दहलीज लांघ
कुछ रिश्ते थे जोड़े मैंने
क्षण भर का साथ निभा पुख्ता कर गये
वे रिश्ते कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है
लोगों ने भी दिये सबूत,विश्वास दिलाया मुझे
लेकिन सारे दावों को नकारती
मैं खड़ी हूं अपने विश्वास के साथ कि
प्रेम स्थायी है और यह हमेशा रहेगा कायम
मेरे जीवन के बाद भी,
मेरे इस विश्वास को प्राप्त है
आशीष शिवालय का भी
खड़ी हूं तुम्हारे सामने मैं इस दावे के साथ
आजीवन कायम रहेगा
प्रेम मेरा और तुम्हारा
इस विश्वास को दिल में समेट
मैं चल पड़ी थी घर की ओर
दरवाजा जो मैंने खटखटाया
मेरी जिंदगी ने बांह पसार कर बुलाया
असमंजस में जो लिपट गयी सीने से उसके
धड़कनों की बेचैनी समझ
उसने पूछा क्या हुआ माँ?
सवाल पर उसके थिरक गयी
मुस्कान मेरे चेहरे पर
विश्वास हुआ मजबूत
जीवन में प्रेम हमेशा होता है स्थायी
तब ही तो वह बिन बोले
समझ लेता है दिल की बात
दिल ने मजबूती से कहा मुझसे
प्रेम मेरा-तुम्हारा सच्चा है, बाकी सब बेमानी...
रजनीश आनंद
18-02-17


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

रेत की तरह फिसलती है जाती है जिंदगी...

अजीब है जिंदगी
मैं जितना सहेजना चाहती हूं
रेत की तरह फिसलती जाती है
मेरी हाथों से
ऐसा नहीं कि मुझे मोहब्बत नहीं जिंदगी से
लेकिन मुझसे हो जाती हैं कुछ गलतियां
भय और आशंका के बीच ऐसा महसूस होता है
मानो जिंदगी अनदेखी कर रही है मेरी
उपेक्षा की भावना घर कर जाती है
मैं जिंदगी को समझा नहीं पाती अपनी बातें
मैं चाहती हूं कि जिंदगी खुशनुमा हो
इस चाह में पकड़ना चाहती हूं
उसे प्रेम से
लेकिन उसे घुटन महसूस होती है
मैं तो बस उसके सीने से लगकर
कहना चाहती थी तुम साथ रहो मेरे
क्योंकि तुम बिन
सूरज की ऊष्मा नहीं होती महसूस
हवा की शीतलता, मन को नहीं देती शीतलता
जिंदगी का हर व्यंजन हो जाता है बेस्वाद
लेकिन शायद मेरा तरीका गलत है
तभी तो जिंदगी रूठ गयी है मुझसे
तो क्या दफन हो जायेंगे मेरे सारे ख्वाब
जो देखे हैं मैंने जिंदगी की आंखों में?
नहीं-नहीं ऐसा ना कर ‘ओ जिंदगी’!
गुजारिश है सुन लो मेरी बात
मैंने जो भी आरोप लगाये तुमपर
वह दुर्भावनावश नहीं हैं
बस इसके मूल में तुमसे प्रेम ही है
हां, लेकिन अब समझ गयी हूं मैं
जिंदगी को संवारने के लिए प्रेम काफी नहीं
कई और चीजें भी हैं, हुनर भी हैं
जो सिखा देगी जिंदगी मुझे...

रजनीश आनंद
18-02-17

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ख्वाहिश


ख्वाहिश तो ना की थी कभी

कि पा लूं तुमको, लेकिन

कुछ यूं आये तुम जीवन मेंं

सारी ख्वाहिशें खारिज हो गयीं

बस एक ही तमन्ना है बाकी

मोहब्बत जो पा लूं तुम्हारी

दामन में सज जायेंगे खुशियों के सितारे

इल्तिजा है तो बस इतनी सी

एक दिन के लिए ही सही,

 बना लो मलिका ए जिगर अपनी

महसूस होगा कुछ यूं मूझे जैसे

जन्नत में बीत गयी जिंदगी मेरी...

रजनीश आनंद
16-02-17

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

साथ हो गंतव्य तक...

जिंदगी की गाड़ी चलती है
जंगल, पहाड़, खेत, नदियां
साथी मुसाफिर गुजरते हैं
कोई अपना सा लगता है
कोई हंसाता है, कोई रुलाता है
कोई छल करता है
कोई  विश्वास करना सिखाता है
लेकिन कोई ऐसा भी होता है
जिसके जाने से सीट खाली सी लगती है
भले ही वह स्टेशन पर
पानी की बोतलें लेने गया हो
लेकिन बेचैन होता है मन
कहता है, कहां रह गये तुम
गाड़ी चल पड़ेगी, नहीं पीना
पानी मुझे, बस तुम आ जाओ
तुम छूट गये, तो
नीरस, निरुद्देश्य
हो जायेगा सफर
तुम हो साथ, तो लंबा सफर थकाता नहीं
बैठे-बैठे अकड़ता नहीं बदन
तुम्हारे कांधे पर सिर रखकर
झपकी ले लेती हूं, तो मिट जाती है थकान
ठंड लगती है, तो तुम
ढंक देते हो चादर मुझे
जिसमें गरमाहट है तुम्हारे प्रेम की
और हां तुम्हारे साथ मूंगफली बहुत भाती है
तो आओ ना साथ जी लें यह सफर
जीवन के अंतिम स्टेशन पर
हम होंगे साथ गंतव्य तक...
रजनीश आनंद
14-02-17

पर ना भूलना मेरे प्रेम को...

कोई मजबूरी नहीं तुम्हारा प्रेम
जिसे छुपाती फिरूं मैं
यह गर्व का विषय है
जो स्पष्ट दिखता है
मेरे चेहरे पर
जब पुकारते हो तुम मुझे
तो दमक उठता है चेहरा मेरा
जैसे चांद के आने से इठलाती है रात
तुम्हारी महक में इस कदर सराबोर हूं
जैसे उपवन में मंडराती कोई तितली
मेरे नयनों में सजते हैं सपने तब
जब शिद्दत से कहते हो तुम
हां, मुझे तुमसे प्रेम है,
मेरे सीने में हमेशा जीवित रहेगा यह प्रेम
बस इतनी सी है गुजारिश
चाहे तो भूल जाना मुझे
पर ना भूलना मेरे प्रेम को,
इसकी खुशबू को
ताकि मुझे हमेशा महसूस हो
तुम आसपास हो मेरे...

रजनीश आनंद
13-02-17

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

एक उम्मीद है...


खामोश सी जिंदगी में
एक उम्मीद है इस बात की
अभी कोई अपना सा आकर
पूछेगा हाल मेरा, थाम कर हाथ मेरा
कहेगा चलो कुछ देर जी लें हम-तुम
शहर की सड़कों पर चलें हम बेपरवाह
चेहरे पर बिखरते बालों को
समेटकर कहे, वो खुले बालों में
सुंदर दिखती हो तुम.
किसी महंगे से मॉल के शोकेस में लगी
सुंदर साड़ी को दिखाकर उसे
मैं कहूं उससे ये वाली चाहिए मुझे
और वो मुस्कुरा कहे, हां जरूर
मैं लेकर दूंगा तुम्हें
उसकी यही बात सुकून दे जायेगी
साड़ी तो बस बहाना है
उसके दिल में अपने लिए
जगह तलाशना चाहती हूं मैं...

रजनीश आनंद
04-02-17