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रविवार, 25 अगस्त 2019

स्वाभाविकता

मैंने गढ़ा नहीं कुछ भी
जो भी है सब स्वाभाविक है
रोटी को बेलती हूं चकले पर
कोशिश नहीं करती कि गोल ही बने
फुलाती हूं तो कभी-कभी नहीं भी फूलते
नरमाई कम हो जाती है
अरहर की दाल उलाती हूं
स्वाद के लिए, सौंधेपन के लिए
कभी-कभी जल भी जाती है
रसोई की व्यस्तता में
पर फेंकती नहीं मैं
घी का छौंका लगाती हूं जीरे के साथ
बैंगन-बड़ी की सब्जी बहुत पसंद है
पर अक्सर बैंगन में कीड़े निकल आते हैं
तो क्या? पूरा बैंगन नहीं फेंकती
कीड़े को फेंकती हूं पहले,  फिर सड़ चुके हिस्से को
सहेजती हूं दूध की मलाई
जो अब कम पड़ती है दूध में
दूध वाले भाई साहब पानी ज्यादा डाल देते हैं
मैंने कहा भी दिया है,  पानी ही डालें
फर्जी दूध का खेल स्वीकार्य नहीं होगा
मैं प्रेम के बदले प्रेम ही देती हूं
लेकिन पता नहीं क्यों
खो गयी मेरी स्वाभाविकता...

रजनीश आनंद

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

दीवार पर पड़ी कील

दीवार पर ठोंकी एक कील
कपड़े और मच्छर दानी के लिए
तो कुछ दिन में व्यवस्थित सी हो गयी
जिंदगी और अस्त-व्यस्त सा दिखने वाला कमरा
धीरे-धीरे बढ़ने लगी निर्भरता कील पर
कभी सब्जी का थैला,  कभी घर की चाबी
लेकिन कील ने कभी सेवा देने से इनकार नहीं किया
अनामिका अंगुली के बराबर भी ना थी कील
लेकिन उम्मीदें हजारों थी उससे
हैंडबैग,  पापा की छड़ी सब टंगते थे उसपर
पर उस रोज,  जब भींगे कपड़ों की रस्सी टांग दी गयी
तो सर्रर से निकल आयी थी कील दीवार से
और मेरे हाथों में पड़ा शव मेरे नापाक उम्मीदों का...

रजनीश आनंद

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

जूठे बरतन

किचन में सिंक तक भरे जूठे बरतन,
देख, कभी- कभी घबरा जाती हूं मैं
फिर आश्वासन देती हूं खुद को
नहीं बहुत थकान नहीं होगी, ज्यादा नहीं है
बेतरतीब ढंग से रखे हैं बस
फिर धीमे से नल खोल मैं पहले
कप-प्लेट और वैसे बरतनों को मांजकर
और धोकर, हटाती हूं, भ्रम बनाये रखना चाहती हूं
कम बरतनों का, फिर थाली और गिलास
कुकर और तेल से चिपचिपी काली हो चुकी कढ़ाई को
तो बस तिरछे नजर से देखा ही है,  हाथ नहीं लगाया
लेकिन एक दो तीन,  चार और थालियों को गिनना छोड़
मैं व्यस्त हूं मांजने और धोने की प्रक्रिया में
बीच-बीच में पानी सिंक के छलनी से निकलता नहीं
तब मैं तन्मयता से साफ करती हूं उसे ताकी पानी जमे ना
सिंक से बाहर ना आये,  फिर सूंऊऊऊ की ध्वनि और
सारा पानी सिंक से बाहर, अनाज, सब्जी,  रोटी के टुकड़े
जो बाधा बने तो मेरे बरतन धोने की क्रिया में सब को
निकाल कूड़ेदान में डाल दिया है मैंने,  ना जाने क्यों
मजा सा आने लगा है इस द्वंद्व में, जिंदगी की जंग सा
जब भी डूबने का एहसास हुआ, खूब हाथ पैर मारा
और अंततः खाली सिंक सी साफ जिंदगी,  जद्दोजहद के बीच
हर बरतन एक पड़ाव जिंदगी का, उसे मांजना-धोना
जीवन जीने की कोशिश,  कठिन परिस्थितियां, 
जैसे तेल में जली कढ़ाई, और उसे साफ करना,  मेरा संघर्ष
जैसे-जैसे कालिख हटती है कढ़ाई निखरती है
और मजा आता है, जीने का,  थकान से परे,
मेरे चेहरे पर खुशी है,  संघर्ष के पलों को जीतने की...

रजनीश आनंद

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

सपनों की किताब

मैंने छुपाकर रखी थी सबसे
अपने सपनों की किताब
जिसके पन्नों पर बिखरे थे
मेरे कई मासूम सपने
चांद को मुट्ठी में भींचने के नहीं
सूरज से आंख लड़ाने के ख्वाब
स्थिति-परिस्थिति ने तोड़ा मुझे
कभी-कभार यह ख्याल भी
चस्पां हुआ कि फेंक दूं यह किताब
आसार नहींं दिख रहे, सपने पूरे होने के
औरत होकर इतने बड़े सपने देखने की जुर्रत!
औकात में रहो का व्यंग्य भी सहा
टूटकर छोड़ दिया था सपने देखना
सोचा था अबकी दीवाली
सिरहाने से निकाल फेंक दूंगी रद्दी संग
इस ख्याल ने पलकें गीली की
तो जी चाहा एकबार सिसक लूं
उस किताब को सीने से लगाकर
खोली जो किताब, दंग थी मैं
जिन सपनों को दफन किया था
सब जीवित थे नन्हें पौधों की तरह
जीवन के प्रति मेरी जिजीविषा ने
खाद पानी दिया था इन्हें
नन्हें पौधों को मारने की नहीं
अब उन्हें पेड़ बनाने का समय था
और मैं समझौते के मूड में
बिल्कुल नहींं थी, बिल्कुल भी नहीं...

रजनीश आनंद
05-10-17

बुधवार, 27 सितंबर 2017

क्योंकि जरूरी है छूटना भी...

जब कुछ छूटता है
तो दर्द होता है क्योंंकि
हम बना चुके होते हैं
उस छूटते से एक रिश्ता
रिश्ते की डोर को थामने की चाह
कई बार बलवती भी होती है
जैसे बाढ़ में सामने से बहकर
जा रहा हो अपने घर का
कुछ खास सामान हाथ ना आये
छूटने का दर्द इतना मानो
जिंदा शरीर से काटा जा रहा हो
मांस का लोथड़ा.
फिर रिसता है दर्द
बहता है खून आंखों से
लेकिन रूको, जरा सोचो
कितना जरूरी था ,
मांस का वह लोथड़ा?
क्योंकि कई बार छूटना भी
जरूरी होता है जीवन में...

रजनीश आनंद
27-09-18

सोमवार, 4 सितंबर 2017

बस प्रेम जीवित हो...

जाने -अनजाने
मैं जो बेवजह
पूछ बैठती हूं
बेतुके सवाल
कभी सोचा तुमने
मैं ऐसा क्योंं करती हूं
कोई गुमान नहीं ं
बस सहज प्रेम
चिंता तड़प है
तुम्हारे मुख से
गायब हंसी को
लौटा लाने की
स्त्रीमन की बेचैनी
पर तुम्हें यह
भाता नहीं
तुम्हें तो दुराव पसंद है
प्रेम आलिंगन नहीं
यही सही, मेरे लिये
तुम्हारे होने का एहसास
काफी है, चाहे पास हो या दूर
बस प्रेम जीवित हो...

रजनीश आनंद
04-09-17

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

मानवद्रोही क्यों हुई प्रकृति

मैंने तो झेला नहीं
सिर्फ तसवीरों में देखा
क्यों कर पानी-पानी
धरती हुई जाती है
बेचैन मन ने पूछा
प्रकृति से एक सवाल
नदियाँ उफान पर
मानवद्रोही क्यों हुई जाती हैं?
सबकुछ समेट लेने को आतुर
जिंदगी, खेत,रिश्ते अपनापन
सबकुछ विसर्जित
इस जल आतंक में
कातिल नदियां
बच्चों को लील लेने के फिराक में
पर गंगा तो मैया है!
बच्चों से अपराध जरूर हुआ
तभी बिफरी है वो दंड देने को
नेता करते सिर्फ हवाई सर्वेक्षण
समस्या के मूल तक क्यों कर जा पायेंगे?
तो क्या हर वर्ष कोशी
लोगों को कोसों पलायन करवायेगी?
रजनीश आनंद
29-08-17

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

जिंदगी की जद्दोहद

जिंंदगी की रसोई में
कुछ स्वादिष्ट बनाने की
जद्दोहद में जुटा इंसान
हर पल, हर क्षण
किंतु कई बार
जो कुछ कढ़ाही में
बहुत स्वादिष्ट, सुस्वादु
मालूम होता है
असल में होता है
कड़ुआ, कसैला
पसोपेश में इंसानियत
कसैलेपन के साथ
क्या भविष्य होगा
इस व्यंजन का?
कसैली चीज मीठी
नहीं होती, लाख शक्कर डाल दो
एकतरफा कोशिश
बेकार ही जाती है
एकतरफा प्रेम की तरह
कुशल रसोइया वाकिफ है
इस सच से, तभी तो
कसैले व्यंजन को वह
परोसता नहीं, फेंक देता है
और जुट जाता है
एक बार फिर कुछ
स्वादिष्ट बनाने की चाह में
निश्चय ही इस बार
कुछ ऐसा बनेगा,जिसका
स्वाद घुल जायेगा
मुख में हमेशा-हमेशा के लिए
क्योंकि जिंंदगी बिखेरती है,
तो समेटती भी है...

रजनीश आनंद
22-08-17

सोमवार, 21 अगस्त 2017

एक मां के सवाल?

सिर्फ 50 रुपये, हां,इतनी ही तो कीमत
लगायी थी इन्होंने,मेरे जान के प्राण की
लेकिन हम गरीब ना जुटा पाये रुपये पचास
बस, बेदर्दी से उजाड़ दी गयी मेरी गोद
अरे! पूरे नौ माह कोख में संजोया जिसे
छाती चूसा जिसे थी पाल रही
प्रसव की अथाह पीड़ा का परिणाम जो
उसके जान की कीमत सिर्फ पचास रुपये?
बड़े प्यार से नाम धरा था मैंने कान्हा का
एक वर्ष से जप रही थी यह नाम, श्याम
गरीब माता-पिता के होंठों की मुस्कान था वो
पर काल को सही नहींं गयी खुशी हमारी
धकेल दिया उसे छत से और फिर,
गिरा जो श्याम मेरा, उठ ना सका
अस्पताल के चक्कर काटे हमने
हर किसी से मिन्नतें की, लेकिन मदद को
नहीं आया कोई, निर्दयी दुनिया!!
गरीब के जान की कीमत महज पचास रूपये?
बिना इलाज मर गया लाल मेरा
छोड़ आंचल मेरा, वह चला गया
उस लोक जहां लोग तारे बन जाते हैं
सुबह से कर रही इंतजार कि
एक तारा टूट गिरेगा मेरे आंचल में
और हो जायेगी पूरी मनोकामना
वह खिलखिलायेगा मेरे आंचल में
लेकिन उसका नाजुक देह तो शिथिल हो गया है?
आह! उजड़ गयी मेरी गोद
लेकिन क्यों? इस अपराध के दोषियों जवाब दो
नाभि नाल का रिश्ता ,यूं ही नहींं मिट जाता
जवाब दो संवेदना शून्य लोगों
क्या मात्र पचास रुपये ही थी मेरे लाल की कीमत?
फिर क्यों भला उसे बांहों में भरते ही
भान होता था मुझे, जैसे मेरे बांहों मे सिमटी हो दुनिया

रजनीश आनंद
21-07-2017


शनिवार, 19 अगस्त 2017

रिश्ते

जीवन की पगडंडी पर
चलते मिले कई रिश्ते
कुछ खून के थे और
कुछ बोये थे मैंने
रोज निहारा धरती में धंसे बीज को
खाद पानी दिया, पुचकारा स्नेहपूर्वक
कोंपल फूटे तो मन किसान सा हुआ
लगा अब लहलहायेगा जीवन
लेकिन
यह तो सुंदर स्वप्न था
मैं निराश हुई, क्या बंजर है मेरी धरती ?
तभी स्पर्श किसी का चौंका गया
देखा तो खुशी से बरसे नैना
कुछ नन्हें पौधे मुस्कुरा रहे थे...
रजनीश आनंद
20-08-17

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

प्रेम की सीढ़ियां

रात का अकेलापन
कलम हाथ में लिये
मैं गढ़ना चाहती हूं
एक कविता तुम्हारे नाम
कुछ सीढ़ियां उभरती हैं
जो जाती हैं तुम तक
हर सीढ़ी पर मैं उकेरती हूं
इंतजार के  पलों को
और आगे बढ़ती हूं
इस उम्मीद में कि
शिखर पर तुम
बांह पसारे होगे
अधरों से जज्ब करने को
मेरे अकेलेपन को
रोमांचित मैं, इतराती मैं
चाल में मेरे  लचक,
और रूमानियत
उत्साह में मैं
एक की जगह दो सीढ़ियां
चढ़ती जाती हूं, लेकिन, आह!
सीढ़िया तो खत्म ही नहीं होती?
बीत रहे पल, दिवस, महीने, साल
मैं युवा से प्रौढ़ा, वृद्धा हुई
किंतु प्रेम अभी युवा है
देखो,अब भी सीढ़ियां चढ़ रहा
पूरे उत्साह से वह
सीढ़ियां इतनी लंबी
जैसे चांद पर जा बैठे हो तुम
लेकिन, तुम्हारा प्रेम अॅाक्सीजन है
थामे उसका सिलेंडर
मैं चली आऊंगी, तुम तक
क्योंकि मुझे अपने प्रेम पर यकीं है....
रजनीश आनंद
10-08-17


गुरुवार, 27 जुलाई 2017

मैं दोषी हूं, क्योंंकि औरत हूं...

स्तन, योनि, मांसल देह
इससे इतर कुछ भी नहीं
एक औरत, इस जग में
उसे नोंच खाने की तत्परता
हर गली, हर शख्स में
फर्क नहीं, उभार हैं
या सिर्फ होने का एहसास भर
सहमति, असहमति का प्रश्न
तो बेमानी , बेतुका है
यहां तो गिद्ध की नजरें हैं
और औरत खरहे की जान
सिसकती, छुपाती खुद को
क्या बच्ची, जवान और वृद्धा
फिर भी दोषी मैं ही हूं
क्योंकि मैं औरत हूं
और तुम पुरूष, तन विजेता ...
रजनीश आनंद
27-07-17

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

ओ मेघ सुनो...

ओ मेघ तुम बरस तो रहे हो लगातार,
सारे ताल-तलैया भर गये
तुम में सराबोर पहाड़ी नदियां
इतरा कर उफन रहीं हैं
मैं भी तो भींगी, खूब भींगी
लेकिन मन प्यासा है
ओ मेघ सुनो, सावन में
तुम्हारे बरसने से नहीं
मेरी प्यास तो बुझती है
प्रिये के स्पर्श से
उसकी एक नजर से
क्या उससे जाकर
यह कह पाओगे तुम...
रजनीश आनंद
25-07-17

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

उड़ान

मैं आकाश में ऊंचे उड़ना चाहती हूं
बाज की तरह, लक्ष्य पर नजरें गड़ाये
मैं गोरैया नहीं होना चाहती, जो थोड़ी
ऊंचाई से ही संतुष्ट हो जाती है,
मुझे बेरोक-टोक उड़ान भरनी है
संभव है साथी कम मिलेंगे, या ना भी मिलें
इसका गम नहींं मुझे, क्योंंकि जानती हूं
जो मिलेंगे वो पुख्ता होंगे, ठोस होंगे
चिड़िया की हड्डी खोखली होती है
उड़ान नहीं, इसलिए शक ना करो
मेरी उड़ान पर, आज नहीं तो कल
मैं भेद ही लूंंगी अपना लक्ष्य
भरोसा है मुझे, हां यकीन है मुझे...
रजनीश आनंद
21-07-17

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

हे कृष्ण न्याय करो...

हे कृष्ण कहां हो तुम?
देखो तो यहां रोज लुट रहीं
तुम्हारी सखियां, एक नहीं
कई द्रौपदी हैं, जिनकी चीख
गूंजती है धरती से अंतरिक्ष तक
क्यों नहीं सुनते तुम
क्या इन सखियों की पुकार
नहीं दहलाती तुम्हारा दिल
देखो तो यहां कई शिशुपाल हैं
जिन्होंने सौ क्या हजारों गलतियां की
फिर क्यों नहीं चल रहा तुम्हारा सुदर्शन
क्या अब तुमने गलतियों की सीमारेखा
लोगोंं के अश्रु से धो दी है
हे कर्मयोगी!!!
सुनो अधीर ना करो मुझे
देखो राजनीति के मैदान पर
कई-कई शकुनि और दुर्योधन
बांधने को बेचैन हैं
राजनीति की शुचिता को
आकर देते नहीं क्यों इन्हें चेतावनी
क्या द्वारकापति सच में
निर्मोही है, अगर हां तो
तो हे न्याय के रक्षक न्याय करो
बच्चों को भोजन दो
सखियों को सम्मान
गोमाता के नाम पर
क्यों छीन रहे लोग
मानव प्राण हैं
देखो ,कान्हा तो अब भी बसता है
इस देश के हर घर में
हर बच्चे की चंचलता में
यशोदा मैया की लोरी में
लेकिन रास रचाने वाला कान्हा
खो गया, एसिड अटैक की धुंध में
नहीं दिखता कर्मयोगी कृष्ण का
चमत्कारिक रूप, लेकिन
भरोसा है मुझे
नहीं टूटने दोगे तुम
मेरा यह विश्वास कि
कर्मयोगी कृष्ण हमेशा न्याय करते हैं...
रजनीश आनंद
18-07-17

गुरुवार, 29 जून 2017

मैं कविताएं लिखती हूं...

मैं कविताएं लिखती हूं
अक्षर-अक्षर तुम में भींगी
बिनती हूं तिनका-तिनका
जो मिल जाये तुम्हारे प्रेम का
बया की तरह बुन लूंगी मैं
घोंसला हमारे प्रेम का
जो रौशन होगा तुम्हारे ठहाकों से
जहां बसती होगी खुशबू
हमारे अनोखे प्रेम की
जहां नहीं रिसेगा दर्द कोई
बस तड़प होगी तो मिलन की
आस में उस पल के
जब भी मैं आहें भरती हूं
प्रतीत होता है जैसे
मेरे प्रेम की छींटे
तुम्हें सराबोर करती हैं
विनती बस है इतनी सी
तौलिए से पोंछ हटाना नहीं
तुम इन प्यार के छींटों को...
रजनीश आनंद
29-06-17

सोमवार, 26 जून 2017

मैं पत्र तुम्हारे नाम लिखूं...

जी चाहता है एक
पत्र लिखूं मैं तुम्हारे नाम
अपनी नीली कलम से
जो बहुत प्रिय है मुझे
पता नहीं क्या बात है
इस कलम में जब भी
थामती हूं मैं इसे
यह समझ लेती है मेरी मनोस्थिति
और उकेरती है मेरे मन की बात कागज पर
जैसे कि तुम पढ़ लेते हो
बिना कहे मेरे मन की बात
फिर सोचती हूं
फेसबुक,व्हाट्‌सएप के युग में
क्या तुम पढ़ोगे मेरा पत्र
लेकिन यह पत्र आभासी नहीं
सजीव है, जिसे मैं लिख रही हूं
तुम्हारे नाम अपनी कलम से
मैंने चूमा है अपनी कलम को
और सीने से लगाया है उस कोरे कागज को
जिसपर लिखूंगी मैं अपने मन की बात
कागज पर ज्योंही मैंने लिखा तुम्हारा नाम
भावनाएं कुछ यूं उमड़ीं कि
जहां लिखा था तुम्हारा नाम
वहीं बरस पड़े अश्रु
यह आंसू नहीं मेरा प्रेम है तुम्हारे लिए
इसलिए इनसे मुंह ना मोड़ना
सीने से लगाकर देखना पत्र को
मेरी धड़कनें सुनाई देंगी तुम्हें
और महसूस कर सकोगे मेरे प्रेम की खुशबू
यह प्रेम का दिखावा नहीं, ना तो अति है
क्योंकि मेरा प्रेम दिखावे का मोहताज नहीं
हां, अति तो शायद कभी ना होगी प्रेम की
क्योंकि हर पल मुझे लगता है
जैसे तुमसे मन भर प्यार ना कर पायी मैं
जब मिले यह पत्र तुम्हें
बस इतना करना तुम
पढ़ना इसे मेरा सच समझ कर
और कहना बस एक बात
मुझे तुमसे प्रेम है...

रजनीश आनंद
26-06-17

बुधवार, 21 जून 2017

मैंने दुनिया खरीदी...

मैंने आज दुनिया खरीदी,
वह भी गुल्लक से सौ रुपये निकालकर
इन रुपयों को संजोया था मैंने
हर सिक्के को गुल्लक में डाल
मैं बन जाती थी एक औरत
और सजाती थी कई सपने
कई ख्वाहिशें भी जनमींं
पर उनका बेदर्दी से हुआ कत्ल
लेकिन आज वो औरत कब्र से जागी है
और एक बार जीना चाहती है
अपने सपनों के साथ
क्योंकि उसने पाया है
प्रेम और अधिकार तुम्हारा
इस सौ रुपये से लिपटे हैं
मेरे अनगिनत सपने
लाल, गुलाबी, नीले, पीले
मैं इन सपनों को साकार करूंगी
तुम्हारी आंखों में डूबकर
क्योंकि मैं तुम्हारी हूं...
रजनीश आनंद
21-06-17

गुरुवार, 15 जून 2017

तो जन्म लेती है दूसरी आस...

आज मैंने देखा अपनी जड़ों से
उखड़ कर बिखरे बूढ़े बरगद को
आह निकल आयी, आते-जाते
राह में रोज होती थी उससे मुलाकात
मैंने देखा था उसे शान से लहलहाते हुए
उसके हरे पत्तों पर, जीवन ठहराता था
लंबी जटाओं में बचपन उमड़ता था
जिन कदमों की शक्ति हो रही थी क्षीण
वे भी सानिध्य में इसके पाते थे अपनापन
दो पल को जी लेते थे, ठिठक कर
तुम भी तो एक दुपहरी इसकी छांव में
मेरी गोद में सिर रखकर लेटे थे सुकून से
कुछ पल के लिए ही सही पनपा था प्यार हमारा
हमारे जिस प्रेम पर लोग उठाते हैं सवाल
उसपर भी स्नेह बरसाया था इसने
बस, उसी दिन से यह बरगद
पिता तुल्य हो गया था मेरे लिए
आज जब देखा, इसकी एक शाखा पर चलते कुल्हाड़ी
चीख उठी थी मैं, मत करो यह अनर्थ
भाग कर लिपट गयी थी उसके टूटे तने से
चीत्कार उठा था मन
अश्रु जो बरसे तो धुली आंखों से देखा
मैंने एक सुंदर दृश्य, नन्हा बरगद
हां, बूढ़े बरगद की जड़ों से फूटा था नन्हा पौधा
उसमें थी अद्‌भुत जीवंतता, जैसे कह रही हो
जीवन थमता नहीं, एक उम्मीद टूटती है
तो जन्म लेती है दूसरी आस...

रजनीश आनंद
15-06-17

शनिवार, 20 मई 2017

औरत या मशीन

रास्ते से आते-जाते
हर रोज देखती थी उसे
पैर मशीन के पहिये पर
और हाथ फिसलते कपड़ों पर
स्टूल पर बैठ वह सिलती
ना जाने किसके-किसके कपड़े
लेकिन खुद के लिये कपड़े
नहींं सिल पा रही थी वो
कपड़ोंं के टुकड़ों से बने
बिस्तर पर सोई रहती थी
एक अबोध, जिसके रुंदन को भी
दरकिनार कर वो चलाती रहती थी मशीन
कई बार महसूस किया
उसकी आंखों की तड़प को
बच्ची के रुंदन पर वह
मशीन बंद नहीं करती
मुख से निकालती थी अजीब सी धुन
जिसे सुन बच्चे को होता था
मां के साथ होने का अहसास
इस अहसास को ही मां समझ बैठी थी बच्ची
और मुझे दिखती थी मां की तड़प
और बेबसी
कई बार देखा दूध से भींगा स्तन
क्योंकि मशीन छीन रहा था
बच्चे से मां का आंचल
भूख से जंग में मां तो जीत रही थी
लेकिन हार रही थी मानवता
जब भी गुजरती थी उस ओर से
सोचती थी भेद क्या बचा है
औरत और मशीन का?
रजनीश आनंद
20-05-17