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शनिवार, 21 मार्च 2020

बंटवारा

बंटवारा दर्द देता है
फिर चाहे वो देश का हो या रिश्तों का
बंटवारे में नहीं हो सकती समान भागेदारी
तब ही तो कई बार माँ के प्रेम में भी
बच्चे महसूस करते हैं अपनी उपेक्षा। 
बंटवारे के दर्द से उपजी हैं 
अनगिनत कहानियाँ-कविताएं
मैंने नहीं देखा देश विभाजन का दर्द
लेकिन रिश्तों के बंटवारे को महसूसा है। 
हम भूगोल नहीं बदल सकते, 
इसी तर्ज पर जीते रिश्तों को और 
छलकते आंसुओं को छूकर कई रात मैं भी जागी
यह समझने की कोशिश करती कि बंटवारा क्यों है जरूरी? 

रजनीश आनंद

सोमवार, 8 जुलाई 2019

प्राथमिकता बदलो

मैं बेचैन रहती हूं तबतक
जबतक,  नहीं लिख लेती
कोई आलेख, कविता
डरती हूं, कलम निकालते
अकसर मैंने पाया जब नहीं होता
सृजन कोई मेरी कलम से
वह आंखें तरेरती है
उलाहना भी देती है
मैं चाहे जितनी से
बंद कर लूं अपने कान
स्पष्ट आवाज आती है
मेरी डायरी के साथ चिपकी
मेरी कलम नजर रखती है
मेरे उन पलों पर,  जब मैं
करती हूं कोताही, बनाती हूं बहाने
चौबीस घंटे तो सबके लिए है,
गालिब शेक्सपियर,  महादेवी
इन्हीं घंटों में पनपे, उन्होंने तो नहीं गिने घंटे
रचना के लिए समय, नहीं समर्पण चाहिए
कलम कहती है होकर वाचाल
प्राथमिकता बदलो, यह दुनिया बहुत हसीन है...

रजनीश आनंद

सोमवार, 19 जून 2017

अनगिनत रंग

मौत बेरंग होती है
रुखी, नीरस
कफन का सफेद रंग
छीन लेता है होंठों की खुशी
लेकिन मौत नहींं लूट सकती
किसी के जज्बे को
जीवन के प्रति
उसके प्रेम को
मौत की उदासी पर
कई गुणा भारी है
इंसान की संकल्पशक्ति
तभी तो देखा मैंने
उस औरत की आंंखों में
मौत को परास्त करने की तिश्नगी
मौत ले भागी है उसके
सिंदूर का लाल रंग
धुल गयी है कपड़े की रंगीनी
लेकिन वह हारी नहीं
वह देगी अपने बच्चों के भविष्य को
सुंदर रंगीन मंच
जहां से साफ दिखेगा
एक औरत का संघर्ष
और उसके जीवन के अनगिनत रंग...
रजनीश आनंद
19-06-17

सोमवार, 12 जून 2017

...फिर चाहे बेहया क्योंं ना कहलाऊँ मैं

आज बहुत दिनों बाद
अट्टाहस करना चाहता है मन
एकदम बेफिक्री में, बिना विचारे
मैं नहींं सोचना चाहती
कितनी जोर से खिलखिलाऊं
ताकि बेशर्म ना कहलाऊं मैं
होठों के किनारों को
कहां तक खींच कर ले जाऊं
कि पोशीदा रहे परिवार की आबरू
मैं तो उसकी बांहें थामकर
फिरना चाहती हूं सड़कों पर
चाहती हूं भटकना जंगल, पहाड़, नदियां
जो नहीं है मेरे जात का, प्रांत का
पर मेरे दिल से उसका नाता
मैं संग उसके साड़ी खरीदूंगी और शार्ट्स भी
दिल से आयेगी आवाज तो चूम भी लूंगी उसे
आज प्रेम प्रदर्शन का शौक हुआ है
फिर चाहे बेहया, बेशर्म ही
क्यों ना कहलाऊं मैं
मैंं अब वह सब करूंगी
जिसे बचपन से आज तक
मैंने सीने में दफन किया
संगीत पर अकेली नाच भी लूंगी
आईने में खुद को देख इतरा भी लूंगी
आंखों में काजल डाल भी लूंगी
होठों को सुर्ख लाल भी करूंगी
खुश हूं क्योंंकि मिला है
स्वनिर्णय का खजाना
जिसे अब छुपाऊंगी नहीं,लुटाऊंगी मैं...
रजनीश आनंद
12-06-17

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मेरी सुबह...

मेरी सुबह सूरज के आने से नहीं होती
उस वक्त होती है जब तुम हौले से
मेरी कानों में गुड मार्निंग कहते हो
मेरी अलसाई अंगडाई को जब तुम
नजरों से चूम लेते हो, तो ऐसा सुकून
महसूस होता है, मानो शिवालय हो आयी मैं
इतना सुकून, इतनी खुशी,
पूरे दिन सराबोर रहती हूं मैं
रात तब होती है जब मैं समा जाती हूं
तुम्हारी बांहों में, मानों लहरें सागर में
नरम होंठों से छूकर तुम्हारी पेशानी को
अपनी पलकों में छुपा लेती हूं
तुम्हारी शरारती आंखो को
और दो होंठ कहते हैं एक दूसरे को गुड नाइट
और तब तुम समेट लेते हो मुझे खुद में
जैसे मैं कोई सपना हूं हसीन...
रजनीश आनंद
24-03-17

कुछ बातें...

               1
जिंदगी की जद्दोजहद भी अजीब है
थोड़े से फायदे के लिए,रिश्ते बदलते रोज हैं
जो कल तक गलबहियां, डाले घूमते थे
वो आज कहते हैं, मतलब खत्म तो रिश्ता खत्म.
              2
मैंने देखा था उस लड़की को
प्रेम के लिए तड़पते हुए
लेकिन उसके दुपट्टे में कभी समाया नहीं वो
फिसलता गया रेत की तरह.
             3
रो तो मैं रोज लेती हूं, इसलिए नहीं कि
रोना औरतों का शगल है
बल्कि इसलिए कि कहीं आंसू सूख गये
तो समाज की बदहाली पर कौन रोयेगा.

रजनीश आनंद
24-03-17

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

छोड़ी हुई औरत...

छोड़ी हुई हमेशा
औरत ही क्यों होती?
मर्द क्यों नहीं होता?
क्यों हमेशा यह त्रासदी
औरत के हिस्से रही
दुष्कर्म तो इंद्र ने किया
लेकिन सजा अहिल्या को मिली
परित्यक्ता! सीता क्यों
यह सवाल बेचैन करते हैं मुझे
हां  छोड़ी हुई औरत हूं मैं
लेकिन इसमें मेरा दोष क्या?
मैंने तो हर कोशिश की
तुम्हें खुश रखने की
एक आदर्श पत्नी बनने की
इच्छा-अनिच्छा जताये बिना
बिछी तुम्हारे बिस्तर पर
जो चाहा तुमने वो दिया
फिर भी मुझपर लगा
एक छोड़ी हुई औरत का ठप्पा
खुद पर यह मुहर
ना लगने देने के लिए
कितना तड़पी मैं
कितनी मिन्नतें की
लेकिन तुमने क्या किया
मुझे बना दिया
एक छोड़ी हुई औरत
जो सहज उपलब्ध मानी जाती है सबके लिए
क्या रिश्ते प्रेमवश बनते हैं
मैंने तो इसे स्वार्थवश बनते देखा
फिर भी थामे रखा
रिश्ते की उस डोर को
जो बेमानी थे तुम्हारे लिए
इसलिए नहीं कि रिश्तों में
गरमाहट शेष थी, बल्कि
इसलिए कि कही ना जाऊं
एक छोड़ी हुई औरत
लेकिन कम ना हुआ
तुम्हारा पुरूष दंभ
दंभी पुरूष से यह जवाब चाहती है
एक छोड़ी हुई औरत
कि
जब छोड़ दिया मुझे
तो अधिकार क्यों जताते हो
मैं जागीर नहीं तुम्हारी
एक इंसान हूं
और जानती हूं कि
छोड़ी हुई मैं हूं
लेकिन अभागी मैं नहीं
तुम हो, जिसने समझा नहीं मेरे प्रेम को...
रजनीश आनंद
17-10-16

शनिवार, 24 सितंबर 2016

मुझे तुमसे जो हो गया है प्रेम...

मुझे तुमसे जो हो गया है प्रेम
लगता है बावली हो गयी हूं मैं
सोचती हूं अहा!
कितना हसीन होगा वो पल
जब होगे तुम मेरे सम्मुख और खुशी से
भर आयीं होगी मेरी आंखें
समझ नहीं पाऊंगी कि क्या करूं मैं
निहारूंगी तुम्हारा मुखमंडल
या बाहों में समा जाऊंगी
या छू लूंगी तुम्हें हौले से
या खो जाऊंगी तुम्हारी आंखों में
जिसमें सजे हैं सपने कई
जिसे सजाया है हमने मिलकर
लेकिन जानते हो तुम बड़ी दुष्ट हैं
तुम्हारी आंखें, जितना मैं झांकती हूं इनमें
खुद से दूर होती जाती हूं
काबू नहीं रहता तनमन पर
लेकिन क्या करूं मैं
भाता है मुझे यह सब
क्योंकि मुझे खुद से ज्यादा
तुमसे जो हो गया है प्रेम...
रजनीश आनंद
24-09-16

सोमवार, 11 जुलाई 2016

पावस ऋतु और तुम

पावस ऋतु हमेशा जलाती होगी
लेकिन इस बार तो
उम्मीद कि डोर मैंने थाम रखी है
जब भी आकाश में मेघ उमड़ते हैं
प्रतीत होता है तुम आसपास कहीं हो
अपने प्रेम की वर्षा कर तनमन शीतल कर दोगे
देखो ना,  बिजली भी चहक कर तुम्हारे आने का संदेश देती है
इस सावन जब बांहों में भरोगे तुम
बूंदें बादलों से  नहीं, मेरी आंखों से बरसेंगे
ए सुनो ना प्रिये
मेरे आंसुओं को तुम
बन धरती खुद में समेट लेना
क्योंकि वो आंसू नहीं प्रेम है मेरा
तुम्हारे लिये तड़प का प्रमाण है
जब कई रातें मैंने तुम्हारे इंतजार में काट दी
पलकें नहीं भींगने दी, क्योंकि तुम पास नहीं थे
लेकिन अब एक आस है
तभी तो जब-जब आकाश में काले बादल छाते हैं
मैं भागकर छत पर जाती हूं
काले बादलों को निहारती हूं
प्रतीत होता है प्रिय जैसे
अभी, बस अभी बूंद बन
तुम कर लोगे मेरा स्पर्श...

रजनीश आनंद
12-07-16

बुधवार, 6 जुलाई 2016

मेरा कुछ भी नहीं प्रिये, जो है सब तुम्हारा है

मेरा कुछ भी नहीं प्रिये,
जो है सब तुम्हारा है.
होंठों  पर थिरकती है हंसी तब,
जब पास तुम आते  हो.
कजरारे नयन भी मतवाले होते हैं तब,
जब झलक तुम्हारी पाते हैं.
खनकती कलाइयों में हैं चूड़ियां तब,
जब तुम संग होते हो.
मेरा कुछ भी नहीं प्रिये...
छनक जाती है पैरों में पायल तब,
जब बाहुपाश में तुम कसते हो.
केश बन बादल बिखरते हैं तब,
जब लबों पर तुम्हारे अधरों के निशान बनते हैं.
बरस उठती हैं मेरे नैना तब,
जब निर्मोही तुम हो जाते हो.
फिर भी पहाड़ों सा स्थिर रहता मन,
कहता तुम प्रियतम मेरे मैं प्रेयसी तुम्हारी हूं.
मेरा कुछ ही नहीं प्रिये,
जो है सब तुम्हारा है...
रजनीश आनंद
07-07-16

मंगलवार, 21 जून 2016

...ताकि संपूर्ण हो हमारा प्रेम

ए सुनो ना प्रिये
क्या तुमने कभी घड़ी की सुइयों को ध्यान से देखा है
वे अनथक एक दूसरे के पीछे भागती हैं
मिलन की चाह में
भले ही उनकी मिलन बेला क्षणिक  होती हो
लेकिन उनका प्रेम देखो
मिलन की आस में बस चलना जानती हैं
एक दूसरे के स्पर्श की असीम चाह लिये
गौर से देखो इन्हें
एक है इनकी धुरी
भले ही साथ ना मिलता हो इन्हें हमेशा
लेकिन धुरी पर एक दूसरे को कसे रहती हैं
मानों जीवन की डोर बंधी हो
मेरा-तुम्हारा प्रेम भी तो कुछ ऐसा ही है
मिलन के अवसर कम हैं
लेकिन
हाय, हमारे प्रेम का उद्वेग देखो
मिलन की तड़प को महसूस करो
सुनो ना,जब एकाकार होंगे हम
तब कहना ना तुम इन घड़ी की सुइयों से
एक ही नाव पर सवार हैं हम
बख्श दो हमें थम जाओ कुछ पल
जी लेने दो, ताकि संपूर्ण हो हमारा प्रेम
चांद और चकोर की तरह नहीं
कमल और भौंरे की तरह ...
रजनीश आनंद
21-06-16

बुधवार, 15 जून 2016

मरीचिका नहीं है प्रेम

उसने कहा, मरीचिका है प्रेम
पास से देखोगी तो टूट जायेगा भ्रम
मैंने कहा, जीवन की आस है प्रेम
पास से देखूंगी तो भाग कर लिपट जाऊंगी, तर जाऊंगी
उसने कहा, नहीं है वो तुम्हारा
क्यों जता रही हो अपना हक
मैंने कहा, कहा है उसने मैं उसकी हूं
हक नहीं, प्रेम जता रही हूं
उसने कहा, छलावा है प्रेम
हासिल है बस क्षणिक सुख, शेष सब मिथ्या
मैंने कहा, मेरे लिए जीने का साधन और साध्य है प्रेम
क्षण भर जो पा जाऊं अपने प्रियतम के बांहों का घेरा, तनमन प्रफुल्लित होगा मेरा
जो अबतक मुझसे प्रेम पर था उलझा
उस चांद ने सुन मेरी यह बात भर लिया मुझे आगोश में
चूम कर मेरी पलकों को , कहा उसने, तू नहीं मानेगी
जो देखा मैंने उसके मुख की ओर
बढ़ गयी धड़कनें मेरी, क्योंकि मैं थी अपने प्रिये की बांहों में
एहसास हुआ वो श्याम मेरा मैं उसकी मीरा
मेरी नस-नस में दौड़ता है रक्त बन उसका प्रेम
हां मुझे है यकीन, जिस दिन मैं उसकी
बांहों में बेसुध रहूंगी और मौन प्रेम के बीच
गूंजेगी उसकी मोहक वाणी
उस दिन जीवन विष का प्याला नहीं
अमृत का प्याला होगा, उसके प्रेम से छलकता हुआ...
रजनीश आनंद
16-06-16  

बुधवार, 8 जून 2016

...क्योंकि नापाक नहीं है मेरा प्रेम

प्रेम कभी नापाक नहीं होता प्रिये
इसलिए बरस जाओ तुम सावन बनकर
प्यासी हूं मैं तुम्हारे प्रेम की
जन्मों से, अंतरघट तक
आओ प्रिये बांह थाम लो, गूंथ लो तुम मुझे बांहों में
ताकि शीतल हो जाये तनमन
मैंने प्रेम किया है, शर्म नहीं, गर्व है
किसी का हक ना छीना, ना शर्तों पर किया
हृदय में बस बसाया तुम्हें,
किसी को नहीं बताया मैंने
किसी से नहीं छुपाया मैंने
बस प्रेम किया, जो अब भी तुम कहो
नहीं है हमारा रिश्ता
तो छलक सकती है आंखें मेरी
लेकिन फिर भी होंठ मुस्कुरायेंगे
क्योंकि तुमने ‘कुछ’ तो कहा हमारे बारे में
उस ‘कुछ’ से ही सजा लूंगी मांग अपनी
क्योंकि नापाक नहीं है मेरा प्रेम....
रजनीश आनंद
09-06-16





गोरैया

सूरज की पहली किरण जब धरती को छूकर मुस्कुराती है
और उसके स्पर्श से कमल खिल उठते हैं
तब धरती की ऐसी छवि देख मुझे भी खिलखिलाने का मन करता है
चाहती हूं गोरैये की तरह चहक कर मैं इधर-उधर उड़ती फिरूं
लेकिन तभी कुछ सवाल घेर लेते हैं मुझे
नहीं मैं सूरज के स्पर्श से आनंदित नहीं हो सकती
क्योंकि मैं एक औरत हूं, पाप-पुण्य का सारा हिसाब मेरे खाते में है
लेकिन मैंने तो रिश्तों को जीने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी
फिर क्यों मर गया हमारा रिश्ता?
इस मृत रिश्ते का शव मेरे कांधे पर ही क्यों?
तुम बेपरवाह होकर आनंदित रहो और मैं....?
लेकिन अब नहीं मेरा अंतस मुझे झकझोर रहा है
कहता है खुशियों से मुंह मत मोड़ो
जो मिलते हैं उन्हें समेट लो
उठो गोरैये की तरह तिनका बिनो और मेहनत करो
आशियाने को संवारने में
क्योंकि हमेशा आंधी नहीं आती
और गर आती भी है
तो वह डर कर घोंसला बनाना तो नहीं छोड़ती...
रजनीश आनंद
08-06-16


सोमवार, 6 जून 2016

फिर क्यों भर आती हैं आंखें मेरी?

आह, कितना सुख है, तुम्हारे आलिंगन में
जिस प्रेम की थी जन्मों से तलाश, अब जाकर पाया मैंने
जब झांकती हूं तुम्हारी आंखों में, तो प्रेम का उफान नजर आता है मुझे
तुम्हारा स्पर्श देता है अपनेपन का सुख
सीने में जब तुम्हारे छुपा लेती हूं मैं अपना चेहरा
प्रतीत होता है मानों दुनिया सिमट आयी मेरे इर्द-गिर्द
और तुम अपने प्रेम से सराबोर कर देते हो मुझे
फिर भी ना जानें क्यों बरस जाती हैं आंखें मेरी?
प्रेम का यह स्वरूप अब तक अनुभव से परे था मेरे
साकार किया तुमने उन ख्वाबों को जो दम तोड़ती सी दिख रही थीं
सोचती हूं कि कौन हो तुम?
मसीहा कहूं, तारणहार या फिर सखा तुम्हें
जिसने भर दिये मेरे जीवन में इंद्रधनुषी रंग
लेकिन जब भी देखती हूं, तुम्हारी मुख की ओर
तुम मुझे लगते हो इन सब से परे मेरे श्याम
जिसके लिए मेरे मन में है प्रेम बस प्रेम....!
 रजनीश आनंद
  06-06-16

गुरुवार, 26 मई 2016

मैं नहीं जानती कि तुम मेरे क्या हो?


मैं नहीं जानती कि तुम मेरे क्या हो?
लेकिन जब सांस आती है, तो हर सांस में होता है तुम्हारा नाम
जैसे धड़कन हो तुम .
पूरी दुनिया की भीड़ में खुद को तुम्हारे साथ पाती हूं हर्षित
जैसे सबसे प्रिय मित्र हो तुम
जो मुस्कान कभी छिन गयी थी होंठों से, उसे वापस लाये हो तुम
जैसे मुस्कान हो तुम
जब पीड़ा होती है बहुत तो, कांधे पर तुम्हारे सिर रख कर रो लेती हूं, जैसे वरदान हो तुम
जीवन के संघर्षपथ पर, अग्रसर हूं तुम्हारे उस वादे के सहारे कि कभी ना छूटेगा यह हाथ
जैसे आत्मविश्वास हो तुम
जब मूंद लेती हूं आंखें अपनी और अपने सीने पर रखती हूं तुम्हारा हाथ तो
अंतस  से आती है एक आवाज, जिंदगी हो तुम, जिंदगी हो तुम...
रजनीश आनंद
26-05-16