बुधवार, 23 सितंबर 2020

मनमाफिक कमरा

वो रहती है एक कमरे में
छोटा किंतु मनमाफिक कमरा
उसकी खिड़की बहुत प्यारी है
उसी से निहारती है, वह
दूर पहाड़ी पर बैठे प्रेमी जोड़ों को
कई बार प्रेमियों के शरीर की खुशबू 
उसे बेचैन करती है, मन होता है
तितली बन फिर आऊं किसी 
फूल का रस चख लूं
या फिर नीले आकाश के आगोश में
चील की तरह उड़ चलूं
कभी पहाड़ी के तालाब में
छपाक से कूदने का मन करता है
मासूम बच्चों की तरह
जिनके इस खेल में होता है सिर्फ विनोद
कभी बगुला बन उसी तलाब से निकाल लूं
चमकीली आंखों वाली मछली
जब अट्टहास करता है बादल
तो मन करता है बाहर जा सोख लूं जल उसका
लेकिन फिर चुपचाप बैठ जाती है खिड़की पर
उस पत्थर को हाथ में कसकर दबाये
जिसे शिवलिंग बताकर माँ ने थमाया था हाथों में
शिव यानी समस्त कामनाओं पर विजय
क्योंकि वह एक शालीन स्त्री है, कामना रहित... 

रजनीश आनंद

सोमवार, 14 सितंबर 2020

बछड़ा

उस दिन दूधवाले ने कम दूध दिया
मेरी जरूरत ज्यादा की थी, पर दूध कम
खीज में पूछा मैंने, क्यों करते हैं भैया ऐसे
वर्षों से आपके भरोसे हम 
फिर ऐन वक्त यह धोखा क्यों? 
मेरे सवालों से भरे नेत्रों को देखा नहीं
उस दिन दूधवाले ने, बस नजरें झुका
कह गये, आज बछड़ा दूध चुरा लिया
दूध की बोतल मेरी हाथों में थमा
वे चले गये पवन वेग से
मैं कुढ़ती रही दिन भर
55 के हो गये होंगे पर इतना बड़ा झूठ
उसपर हर जरूरत में मदद की हमने
बिटिया की शादी पर पैसे दिये
बीमारी या कोई और जरूरत रही हो
पर हमारी जरूरत नहीं दिखी उन्हें
अगले दिन जब सुबह आठ बजे 
दूध वाले भैया जी आये तो गर्व था चेहरे पर
मुझे एक किलो अधिक दूध देकर बोले
आज सवेरे ही बांध दिया था बछड़े को
गाय से दूर, रंभाती रही गैया
 जो कटौती हुई थी वो पूरी कर दी
बोतल हाथ में लिये मैं रसोई में आयी
सफेद दूध रक्त की तरह लाल जान पड़ा
बिलकुल वैसा ही जैसे उस दिन देखा था मैंने
अपने बेटे के खून में सने चेहरे को, 
भागकर बालकनी में उसके पीछे गयी थी
खून क्यों छिपा रहा, बताया क्यों नहीं मुझे? 
मासूम चेहरा, मेरी ओर करके कहा था उसने
तुम तो आफिस गयी थी मेरे पास कहाँ रहती हो
दूधवाले का बछड़ा और मेरा लाडला
एक से दुख में थे, और मैं पीड़ा से रंभाती... 

रजनीश आनंद

शनिवार, 12 सितंबर 2020

स्मृति

स्मृति कभी नहीं मिटती
कायम रहती है हमारे अंदर
किसी ना किसी रूप में
तभी तो जब पुनर्जन्म होता है स्मृति का
वह रूलाती भी है, हंसाती भी
आप स्मृतियों को कागज की तरह
फाड़कर टुकड़े -टुकड़े नहीं कर सकते
क्योंकि वे अंकित होती हैं मानस पटल पर
भूल चुके पल भी सहसा सामने आ खड़े होते हैं
उस क्षण जब आप करते हों संवाद खुद से
वह समय होता है प्रेम का, 
नफरत को बिसार कर प्रेम के शुक्राणु को आश्रय दीजिए
वह पल प्रसवपीड़ा सा कष्टकर हो सकता है
किंतु यह तय है शिशु नफरत का स्वरूप नहीं होगा
क्योंकि स्मृति में प्रेम हर पल जीवित है... 
रजनीश आनंद


रविवार, 6 सितंबर 2020

आंसू

औरतों की जिंदगी मेंं
ढांढस की तरह हैं आंसू
जिनसे सराबोर हो
वह संभल जाती है
झेल लेती है हर
वो घाव, चाहे नये हों
या रिसते रहें हों जख्म बन
आंसू की झील में तैरकर
औरत बन जाती है पारंगत मांझी
नमकीन आंसू बनाये रखते हैं
नमक जिंदगी में
इसे कमजोरी की निशानी ना समझें
स्वार्थपरक इस दुनिया में
जब टूटते हैं भ्रम और विश्वास
तो आंसू होते हैं सच्चे साथी
तो मर्दों कभी रोकर देखो
त्रिया चरित्र के हथकंडे नहीं हैं सिर्फ ये
निर्मल भाव में भी बहते हैं आंसू... 

रजनीश आनंद


सोमवार, 31 अगस्त 2020

बीज

माली सहेजता है, धरती की कोख में
पल रहे उस बीज को जिसे बनना है वृक्ष
अंकुरण से प्रस्फुटन तक वह झेलता है
प्रसव वेदना, मौन चीख के साथ
वह कभी बाड़ लगता है तो 
कभी जंगली घास को उखाड़ता है
शिशु पौध की चिंता में वह कभी कभी
मुखर भी हो जाता है, क्योंकि पौधे की सुरक्षा जरूरी है
वह कभी पानी से सींचता है, 
तो कभी कीटनाशक का छिड़काव करता है
तंदुरुस्त होता पौधा उसकी हिम्मत बढ़ाता है
उसकी सलामती के लिए करता है पूजा पाठ
व्रत, उपवास की श्रद्धा और तलवार का जोश भी है उसके पास
आज जबकि लोग उस वृक्ष के समक्ष आम्रबौर मांगने आये हैं
चर्चा सिर्फ उच्च कोटि के बीज की है, माली के समर्पण और त्याग की नहीं... 

रजनीश आनंद

शनिवार, 29 अगस्त 2020

टिकुली-सिंदूर पर नहीं, इन मुद्दों पर लड़े जंग

पिछले कुछ दिनों से स्त्री कैसी हो इसपर चर्चा आम है। सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव नहीं रही पर देखा जरूर। तीज के समय से शुरू हुआ यह द्वंद्व अब भयावह होता दिख रहा है। रिया चक्रवर्ती के मामले ने इस बहस को और बढ़ाया और कड़वाहट ला दिया है। सबसे पहले तो हम औरतों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जब आप अपने हक और अधिकारों की जंग लड़ रही हैं तो एकजुट रहें अकेले कोई सेनापति युद्ध नहीं जीत सका है, सेना की जरूरत होती ही है। तो बात मुद्दों की करते हैं रिया चक्रवर्ती तमाम स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं कि उनके लिए हम आपस में लड़ मर जाये ं। सुशांत सिंह के मामले में अगर रिया दोषी है तो उसे सजा मिलेगी, और जरूर मिलेगी। लेकिन उस एक लड़की को लेकर तमाम माडर्न लड़कियों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। ऐसी कई घटनाएं हमारे सामने होती हैं लेकिन हम उसकी चर्चा भी नहीं करते, यह हाईप्रोफाइल केस है इसलिए मीडिया लहालोट हो रहा है। बेशक जिस परिवार ने बेटा खोया है हमें उसके साथ खड़े होना चाहिए। सुशांत हमारे इलाके के थे इसलिए यह हमारा फर्ज बनता है कि हम उस परिवार के दुख में शामिल हों। अबतक जो जानकारी सामने आयी है वह चौंकाने वाली है। 
लेकिन कुछ बात मुझे पच नहीं रही मसलन रिया सुशांत के पैसों पर ऐश करती थी। अरे भाई वे लिव इन में रहते थे, और जब दो लोग प्रेम में होते हैं साथ होते हैं तो एक दूसरे पर खर्च करते हैं।लेकिन रिया ने अगर प्रेम का फायदा उठाया है तो यही कहूंगी कि सबको अपने कर्म का फल इसी दुनिया में भुगतना पड़ता है। हमारे देश का कानून उसे सजा देगा। रिया जिस प्रेम का दावा कर रही हैं वह व्यक्ति गत तौर पर मुझे इसलिए झूठा लग रहा है कि अगर प्रेम था तो उसे मरने के लिए क्यों छोड़ दिया। लड़ाई क्या प्रेम से ऊपर है, वह भी तब जब आपका साथी बीमार हो, जैसा कि रिया कह रही हैं। 
खैर मेरा यह कहना है कि रिया को गरिया कर महिलाएं आपस में क्यों भिड़ रही हैं। रिया ऐसे सोसाइटी से है जहाँ कोई महिला पीड़ित या अधिकारों से वंचित नहीं है। अधिकारों की जंग वंचित महिलाओं को लड़नी पड़ती है। रिया या आलिया को नहीं। 
तीज, जीतिया और छठ व्रत हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। अगर कोई  व्रत रखकर अपना प्रेम और केयर प्रदर्शित करता है तो करने दें, इसमें क्या बुरा है। श्रृंगार करके स्त्री मन प्रसन्न होता है होने दीजिए। इसमें आरोप प्रत्यारोप क्या। बंगाल की सारी कम्युनिस्ट महिलाएं दुर्गा पूजा के समय मार्क्स वाद भूलकर वही करती हैं जो उनकी परंपरा है, तो बिहारी औरतें तीज, छठ पर नाक से सिंदूर क्यों ना लगायें। किसी की भावना आहत ना करें। वैसे भी आजकल के पति पत्नियों का खास ख्याल रखते हैं। खैर मेरा कहना यह था कि जिस चीज से आप सहमत नहीं वह गलत है ऐसा नहीं है। वैसे भी हमें बात लैंगिक समानता की करनी चाहिए। स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य, काम के अवसर और निर्णय के अधिकार पर बात करनी चाहिए। स्त्री को देह से इतर एक इंसान के रूप में स्थापित करने की जंग करनी चाहिए तो हम टिकुली-सिंदूर पर भिड़े हुए हैं, अरे समझिए यही हमारी हार है। 

बुधवार, 26 अगस्त 2020

सोने की चेन

वो सोने की चेन मैंने बेच दी थी सुनार के पास
तुम्हें याद है ना, तुम इतना ही कह पाये थे, इसे क्यों? 
लेकिन मैंने तुम्हारे क्यों का उत्तर दिये बिना थमा दिया था
उस चेन को सुनार की हाथों में, मेरे जितने जेवर थे
उनमें से सबसे खरा सोना साबित हुआ था, वह चेन
20 हजार में बेच, मैंने पैसे भी पकड़ा दिये थे तुमको
ताकि तुम दावा ना कर सको मेरी तथाकथित स्वंतत्रता पर
मैंने देखा है तुम्हारी नजरें दबोचना  चाहती है मुझे आज भी
दर असल जिसे मैंने प्रेम का आलिंगन समझा था
वह तो जकड़न थी उस तकिये की जो गला घोंटना चाहता था 
एक स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व का, मिटाना चाहता था उसकी आत्मा को
शरीर तो स्त्री का अपना होता ही नहीं, उसपर तो स्टांप लगा होता है समाज का
हाँ उसकी आत्मा जीवित होती है, जिसका गला घोंटने के लिए
तुमने पहनाई थी मुझे सोने की चेन, लेकिन उसकी गिरफ्त से निकल गयी थी मैं, शरीर लहूलुहान हो तो क्या, आत्मा जीवित थी
इसलिए मैं बेच आयी थी तुम्हारे साथ ही वो सोने की चेन... 

रजनीश आनंद