शनिवार, 19 अगस्त 2017

रिश्ते

जीवन की पगडंडी पर
चलते मिले कई रिश्ते
कुछ खून के थे और
कुछ बोये थे मैंने
रोज निहारा धरती में धंसे बीज को
खाद पानी दिया, पुचकारा स्नेहपूर्वक
कोंपल फूटे तो मन किसान सा हुआ
लगा अब लहलहायेगा जीवन
लेकिन
यह तो सुंदर स्वप्न था
मैं निराश हुई, क्या बंजर है मेरी धरती ?
तभी स्पर्श किसी का चौंका गया
देखा तो खुशी से बरसे नैना
कुछ नन्हें पौधे मुस्कुरा रहे थे...
रजनीश आनंद
20-08-17

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

प्रेम की सीढ़ियां

रात का अकेलापन
कलम हाथ में लिये
मैं गढ़ना चाहती हूं
एक कविता तुम्हारे नाम
कुछ सीढ़ियां उभरती हैं
जो जाती हैं तुम तक
हर सीढ़ी पर मैं उकेरती हूं
इंतजार के  पलों को
और आगे बढ़ती हूं
इस उम्मीद में कि
शिखर पर तुम
बांह पसारे होगे
अधरों से जज्ब करने को
मेरे अकेलेपन को
रोमांचित मैं, इतराती मैं
चाल में मेरे  लचक,
और रूमानियत
उत्साह में मैं
एक की जगह दो सीढ़ियां
चढ़ती जाती हूं, लेकिन, आह!
सीढ़िया तो खत्म ही नहीं होती?
बीत रहे पल, दिवस, महीने, साल
मैं युवा से प्रौढ़ा, वृद्धा हुई
किंतु प्रेम अभी युवा है
देखो,अब भी सीढ़ियां चढ़ रहा
पूरे उत्साह से वह
सीढ़ियां इतनी लंबी
जैसे चांद पर जा बैठे हो तुम
लेकिन, तुम्हारा प्रेम अॅाक्सीजन है
थामे उसका सिलेंडर
मैं चली आऊंगी, तुम तक
क्योंकि मुझे अपने प्रेम पर यकीं है....
रजनीश आनंद
10-08-17


बुधवार, 2 अगस्त 2017

मृदुल स्पर्श

सुंदर, मृदुल स्पर्श
प्रियतम तुम्हारा
बेचैन तन मन
कांपते अधर
मूंदती पलकें
सांसों का थमना
लालिमा गालों पर
मादक आह, होठों पर
सब एकसाथ कहते हैं
मुझे तुमसे प्रेम है
प्रेम का यह अपनत्व
हर पल देता है तुम्हें
डाक, बस बहुत हुआ
अब तो आ जाओ...
रजनीश आनंद
02-08-17

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

मैं दोषी हूं, क्योंंकि औरत हूं...

स्तन, योनि, मांसल देह
इससे इतर कुछ भी नहीं
एक औरत, इस जग में
उसे नोंच खाने की तत्परता
हर गली, हर शख्स में
फर्क नहीं, उभार हैं
या सिर्फ होने का एहसास भर
सहमति, असहमति का प्रश्न
तो बेमानी , बेतुका है
यहां तो गिद्ध की नजरें हैं
और औरत खरहे की जान
सिसकती, छुपाती खुद को
क्या बच्ची, जवान और वृद्धा
फिर भी दोषी मैं ही हूं
क्योंकि मैं औरत हूं
और तुम पुरूष, तन विजेता ...
रजनीश आनंद
27-07-17

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

ओ मेघ सुनो...

ओ मेघ तुम बरस तो रहे हो लगातार,
सारे ताल-तलैया भर गये
तुम में सराबोर पहाड़ी नदियां
इतरा कर उफन रहीं हैं
मैं भी तो भींगी, खूब भींगी
लेकिन मन प्यासा है
ओ मेघ सुनो, सावन में
तुम्हारे बरसने से नहीं
मेरी प्यास तो बुझती है
प्रिये के स्पर्श से
उसकी एक नजर से
क्या उससे जाकर
यह कह पाओगे तुम...
रजनीश आनंद
25-07-17

शनिवार, 22 जुलाई 2017

हर स्त्री में राधा है...

कल 'कनुप्रिया' को पढ़ते वक्त लगा जैसे मैं खुद राधा हूं और जो मैं पढ़ रही हूं वह सब मेरे कनु के लिए हैं. आदरणीय धर्मवीर भारती जी ने जिस तरह एक नारी के मन को शब्दों में उकेरा है, मानो राधे उनके हृदय में विराजमान थीं और उनसे अपनी बातें कागज पर उतरवा रही थीं. मुझे ऐसा लगता है कि हर स्त्री जीवन में एक ना एक बार राधा होती है और उसके जीवन में कोई कृष्ण जरूर होता है. यह बात दीगर है कि खुद को किसी की राधा बताना रूक्मिणी के लिए आसान नहीं होता, खैर विषयांतर का इरादा नहींं है.  लेकिन मेरी इस बात को हर औरत अपने दिल पर हाथ रखकर महसूस कर सकती है.
आदरणीय भारती जी की कनुप्रिया पढ़ते वक्त कुछ ख्याल मेरे मन में आये, जिसे अपने 'कनु ' के लिए मैंने कलमबद्ध किया है. भारती जी क्षमायाचना के साथ मैं अपने भाव लिख रही हूं. मैं तुच्छ रचनाकार किंतु मन के भाव पवित्र हैंः-
मैं तुम्हारी कौन हूं कनु?
हर क्षण मेरा मन पूछता है मुझसे
आखिर किस हक से तू
कनु को अपना बताती है?
क्या संबंध है तेरा उससे
उसके सवाल से मैं थोड़ा
घबरा जरूर जाती हूं, लेकिन
फिर उन पलों का स्मरण होता है
जिन पलों में तुम साथ होते हो मेरे
तब बड़े अधिकार से
तुम्हारे बालों में हाथ फिराकर
मैं चूम लेती हूं, तुम्हारा माथा,पलकें,होंठ और छाती
फिर कहती हूं तुमसे,
आज इतनी देर से क्यों आये कनु?
तब बड़े अधिकार से, हंसकर
तुम कस लेते हो मुझे बांहों में
और मैं इतराकर अपनी वेणी
झटक देती हूं तुम्हारे मुख पर
तभी तुम पकड़ लेती मेरी वेणी
और खींचते हो मुझे अपनी ओर
पीड़ा होती है मुझे
आह, निकल जाती है, लेकिन
उस वक्त जो सुख मिलता है
उसके लिए मैं बार-बार अपनी
वेणी झटकना चाहती हूं मुख पर तुम्हारे
क्योंकि उस पल लगता है
मानो साम्राज्ञी हूं मैं तुम्हारे मन की
लेकिन जब तुम पास नहीं होते
तब यह मन फिर कहता है मुझसे
तू कौन है कनु की ?
तब अधीरता में मैं पुकारती हूं तुम्हें
पर तुम सुनते नहीं मेरी पुकार
तब बेचैनी और आशंका में , मैं कहती हूं
एक बार तो बोल दो कनु
मैं इतनी नासमझ नहीं कि समझ
ना सकूं तुम्हारी व्यस्तता
तब हंस कर कहते हो तुम
नहीं-नहीं, नासमझ नहीं तुम तो समझदार हो
मेरी प्रिय सखी, मेरी प्रेरणा
जिसे महसूस कर मैं रत  रहता हूं कर्मपथ पर
तो अकस्मात ऐसा भान होता है
जैसे मेरे पूरे शरीर से
ऊर्जा निकल रही हो
और तुम ओतप्रोत हो उससे
तब मैं कहती हूं  अपने मन से
देखो मैं ऊर्जा हूं अपने कनु की
लेकिन पावस ऋतु में जब
मेरा मन करता है तुमसे प्रेम निवेदन
और तुम बड़ी दुष्टता से मुझे सताने के लिए
करते हो मेरे मन की अनदेखी,उपेक्षा
और करते हो छेड़छाड़ मेरी सखियों संग
तब छलक आते हैं मेरे आंसू
तब कहती हूं मैं अपने मन से
कनु कोई नहींं मेरा, वह तो दुष्ट है
कोई संबंध नहीं मेरा उससे
लेकिन अगले ही पल
जब पीछे से आकर थाम लेते हो मुझे
और अपनी अंगुलियों से मेरे
बदन का स्पर्श कर छेड़ते हो
मनुहार करते हो, कहते तो तुम सिर्फ मेरे हो
तब झगड़ना चाहती हूं तुमसे, देना चाहती हूं उलाहना
लेकिन तुम चतुर, मुझे चुप कराने के लिए
अपने मुख से बंद कर देते हो मेरा मुख
तब अधखुली आंखों और गहराती सांसों के बीच
मैं कहती हूं अपने मन से
'कनु' मेरा सर्वस्व है, जान,जिंदगी,खुशी...

रजनीश आनंद
23-07-17

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

उड़ान

मैं आकाश में ऊंचे उड़ना चाहती हूं
बाज की तरह, लक्ष्य पर नजरें गड़ाये
मैं गोरैया नहीं होना चाहती, जो थोड़ी
ऊंचाई से ही संतुष्ट हो जाती है,
मुझे बेरोक-टोक उड़ान भरनी है
संभव है साथी कम मिलेंगे, या ना भी मिलें
इसका गम नहींं मुझे, क्योंंकि जानती हूं
जो मिलेंगे वो पुख्ता होंगे, ठोस होंगे
चिड़िया की हड्डी खोखली होती है
उड़ान नहीं, इसलिए शक ना करो
मेरी उड़ान पर, आज नहीं तो कल
मैं भेद ही लूंंगी अपना लक्ष्य
भरोसा है मुझे, हां यकीन है मुझे...
रजनीश आनंद
21-07-17