प्रियतम तुम्हारा
बेचैन तन मन
कांपते अधर
मूंदती पलकें
सांसों का थमना
लालिमा गालों पर
मादक आह, होठों पर
सब एकसाथ कहते हैं
मुझे तुमसे प्रेम है
प्रेम का यह अपनत्व
हर पल देता है तुम्हें
डाक, बस बहुत हुआ
अब तो आ जाओ...
02-08-17
कल 'कनुप्रिया' को पढ़ते वक्त लगा जैसे मैं खुद राधा हूं और जो मैं पढ़ रही हूं वह सब मेरे कनु के लिए हैं. आदरणीय धर्मवीर भारती जी ने जिस तरह एक नारी के मन को शब्दों में उकेरा है, मानो राधे उनके हृदय में विराजमान थीं और उनसे अपनी बातें कागज पर उतरवा रही थीं. मुझे ऐसा लगता है कि हर स्त्री जीवन में एक ना एक बार राधा होती है और उसके जीवन में कोई कृष्ण जरूर होता है. यह बात दीगर है कि खुद को किसी की राधा बताना रूक्मिणी के लिए आसान नहीं होता, खैर विषयांतर का इरादा नहींं है. लेकिन मेरी इस बात को हर औरत अपने दिल पर हाथ रखकर महसूस कर सकती है.
आदरणीय भारती जी की कनुप्रिया पढ़ते वक्त कुछ ख्याल मेरे मन में आये, जिसे अपने 'कनु ' के लिए मैंने कलमबद्ध किया है. भारती जी क्षमायाचना के साथ मैं अपने भाव लिख रही हूं. मैं तुच्छ रचनाकार किंतु मन के भाव पवित्र हैंः-
मैं तुम्हारी कौन हूं कनु?
हर क्षण मेरा मन पूछता है मुझसे
आखिर किस हक से तू
कनु को अपना बताती है?
क्या संबंध है तेरा उससे
उसके सवाल से मैं थोड़ा
घबरा जरूर जाती हूं, लेकिन
फिर उन पलों का स्मरण होता है
जिन पलों में तुम साथ होते हो मेरे
तब बड़े अधिकार से
तुम्हारे बालों में हाथ फिराकर
मैं चूम लेती हूं, तुम्हारा माथा,पलकें,होंठ और छाती
फिर कहती हूं तुमसे,
आज इतनी देर से क्यों आये कनु?
तब बड़े अधिकार से, हंसकर
तुम कस लेते हो मुझे बांहों में
और मैं इतराकर अपनी वेणी
झटक देती हूं तुम्हारे मुख पर
तभी तुम पकड़ लेती मेरी वेणी
और खींचते हो मुझे अपनी ओर
पीड़ा होती है मुझे
आह, निकल जाती है, लेकिन
उस वक्त जो सुख मिलता है
उसके लिए मैं बार-बार अपनी
वेणी झटकना चाहती हूं मुख पर तुम्हारे
क्योंकि उस पल लगता है
मानो साम्राज्ञी हूं मैं तुम्हारे मन की
लेकिन जब तुम पास नहीं होते
तब यह मन फिर कहता है मुझसे
तू कौन है कनु की ?
तब अधीरता में मैं पुकारती हूं तुम्हें
पर तुम सुनते नहीं मेरी पुकार
तब बेचैनी और आशंका में , मैं कहती हूं
एक बार तो बोल दो कनु
मैं इतनी नासमझ नहीं कि समझ
ना सकूं तुम्हारी व्यस्तता
तब हंस कर कहते हो तुम
नहीं-नहीं, नासमझ नहीं तुम तो समझदार हो
मेरी प्रिय सखी, मेरी प्रेरणा
जिसे महसूस कर मैं रत रहता हूं कर्मपथ पर
तो अकस्मात ऐसा भान होता है
जैसे मेरे पूरे शरीर से
ऊर्जा निकल रही हो
और तुम ओतप्रोत हो उससे
तब मैं कहती हूं अपने मन से
देखो मैं ऊर्जा हूं अपने कनु की
लेकिन पावस ऋतु में जब
मेरा मन करता है तुमसे प्रेम निवेदन
और तुम बड़ी दुष्टता से मुझे सताने के लिए
करते हो मेरे मन की अनदेखी,उपेक्षा
और करते हो छेड़छाड़ मेरी सखियों संग
तब छलक आते हैं मेरे आंसू
तब कहती हूं मैं अपने मन से
कनु कोई नहींं मेरा, वह तो दुष्ट है
कोई संबंध नहीं मेरा उससे
लेकिन अगले ही पल
जब पीछे से आकर थाम लेते हो मुझे
और अपनी अंगुलियों से मेरे
बदन का स्पर्श कर छेड़ते हो
मनुहार करते हो, कहते तो तुम सिर्फ मेरे हो
तब झगड़ना चाहती हूं तुमसे, देना चाहती हूं उलाहना
लेकिन तुम चतुर, मुझे चुप कराने के लिए
अपने मुख से बंद कर देते हो मेरा मुख
तब अधखुली आंखों और गहराती सांसों के बीच
मैं कहती हूं अपने मन से
'कनु' मेरा सर्वस्व है, जान,जिंदगी,खुशी...
रजनीश आनंद
23-07-17
जिंदगी के कैनवास पर
उम्मीद की कूची लिये
मैं हर रोज बनाती हूं
एक लड़की की तसवीर
ना जाने क्यों वह बिलकुल
मेरी तरह दिखने लगती है
जिसकी आंंखों में सजे हैं सपने कई
जब महसूस करना चाहती उन्हें
तो उसके नयन पूछते हैं
क्या सपने कभी होंगे सच?
उसके सवालों में जब डूबती हूं
तो अंतरमन कहता है
नहीं चाहती विलासिता कोई
तुम्हारी मीठी मुस्कान बना देगी
मुझे मलिका इस जहान की
मैंने कब चाहा कि तुम कहो
मैं जिंदगी हूं तुम्हारी
पर मेरे दृगों में यह
अभिमान तो पनपने दो
कि तुम्हारी हूं मैं...
रजनीश आनंद
08-07-17
जिंदगी की थाली मेंचांद पूनम का हो,दूज का हो
या फिर बदली मेंं छिपा क्यों ना हो
कमतर नहीं होती उसकी खूबसूरती
जैसे तुम पास हो, बांहों में हो या फिर
सैकड़ों मील दूर, कसक कम नहींं होती
तुम्हारे प्यार की, एहसास की.
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सोचती हूं कैसे खुशनसीब हैं वो
जो प्यार की अति से ऊब जाते हैं
हम तो उनकी एक नजर के लिए भी
हरपल तरसते रहते हैं.
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वर्षों हुए हाथोंं में मेहंदी सजाये
उसका सुर्ख रंग भाता नहीं मुझे
यह भी सच नहींं, पर इस डर से
नहींं सजाती हिना कि जो तुम पास ना होगे
तो कौन संवारेगा मेरी बिखरी जुल्फों को.
रजनीश आनंद
10-06-17
हिज्र की रातों में
आंखें मूंदें मैं लेना चाहती हूं तुम्हारा नाम
एक बार नहीं, कई बार
ताकि महसूस कर सकूं तुम्हें
मैं जितनी बार पुकारती हूं तुम्हारा नाम
तन-बदन में मौजूद सिहरन
और तड़प दे जाती है सुकून
मैं खोना चाहती हूं
तुम्हारे नाम की गूंज में
ताकि फिजाओं में गूंजें
हमारे मिलन की ध्वनि
और तुम आकर मेरे
कानों में फुसफुसा जाओ
तुम मेरी, हां सिर्फ मेरी हो
फिर कुछ और सुनने की
चाह शेष रह जायेगी क्या भला?
रजनीश आनंद
07-03-17
अचानक मौसम कुछ यूं हुआ रूमानी
जैसे कभी-कभी तुम हो जाते हो
ऐसे में बादलों को बरसता देख जी किया
मैं सिमट जाऊं आकर तुम्हारी बांहों में
अदेह स्वरूप में ही सही, मैं रहना चाहती हूं
गिरफ्त में तुम्हारी बांहों के हमेशा
तभी तो छतरी को खोल मैं निकल गयी थी सड़क पर
तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने, कुछ देर जीने
छतरी के घेरे ने कराया तुम्हारे होने का एहसास
मैंने उसे ऐसे थामा जैसे थामना चाहती हूं तुम्हें
आज तुमसे बात करने की बहुत थी चाह
इसलिए मैंने खूब कही अपने मन की
जानते हो मैंने सवाल खुद किया और
तुम्हारी तरफ से जवाब भी दे दिया
ख्यालों में ही सही तुम सुनते रहे मुझे
यूं तो मैं जानती हूं अपने बारे में
हर छोटी-बड़ी बात लेकिन
जब तुम कहते हो उन्हें
अहसास कराते हो मुझे की मैंं खास हूं
तो सुकून मिलता है. जैसे अभी मिल रहा है
धरती से टकराती इन बारिश की बूंदों को देखकर
एहसास हो रहा है मानो मिल रहे हों हम-तुम...
रजनीश आनंद
04-03-17
जिंदगी की जद्दोजहद ने
छिन ली थी मेरे होंठों की हंसी,
जो मुस्कान दिखती थी
वो दरअसल झूठ का पुलिंदा थी
खोखली हंसी, जिसकी गूंज में
साफ सुनाई पड़ जाती थीं मेरी सिसकियां
मेरा दिल हमेशा कहता था मुझसे
सुन ले तू कभी मेरी भी, तो
आज उसकी बात का असर
दिख गया मुझपर और
मैंने जिंदगी के दामन से
एक चीज चुराकर
कस कर जकड़ लिया है मुट्ठी में
सोचा है अब कभी नहीं छोड़ूगी उसे
परिस्थिति चाहे लाख विकट हो,
तभी मेरी नजर राह चलते
एक बच्चे पर पड़ी
धूल से सने, उस फटेहाल बच्चे की
नजर मेरी मुट्ठी पर थी
शायद वो जानना चाह रहा था
मेरी मुट्ठी का रहस्य
मैं घबराई, सोचा कहीं इसकी नजर
मेरी उस संपत्ति पर तो नहीं
जिसे चुराया था मैंने जिंदगी के दामन से
शायद उसने पकड़ ली थी मेरी चोरी
सहसा वो मेरे नजदीक आया
मेरी आंखों में झांकर कहा उसने
जो तेरी मुट्ठी में है उसे बांट मेरे संग
तेरी खुशी दोगुनी हो जायेगी
मैं उससे बचना चाह रही थी
लेकिन वो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था
मैंने सोचा जब इसे पता ही है
मेरी चोरी का, तो बांट लेती हूं
उस खुशी को जिसे चुराकर रखा था
मैंने अपनी मुट्ठी में कैद करके
बच्चे के सामने मैंने ज्योंही खोली मुट्ठी
उसके होंठों पर थिरकी मुस्कान और आंखों में चमक
उसकी खुशी देख मैं खिलखिला उठी
लेकिन उसकी गूंज से सिसकियां गायब थी
बस सुनाई दिया था , तो सिर्फ तुम्हारे आने का संदेश...
रजनीश आनंद
03-03-17
एक द्वंद्व सुबह -शाम,
चला मेरे मन में आज
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है?
आफिस की सीढ़यों को गिनते हुए
जब मैं पहुंची अपने कमरे तक
कई पुरानी यादें मेरीे मानसपटल पर छा गयीं
बचपन से आजतक टूटें कई सपने मेरे
टूटे हुए खिलौनों की कसक
अब भी हैै मन में बाकी
वे खिलौने पूछते हैं मुझसे
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं?
कंप्यूटर के की-बोर्ड को दिनभर खड़खड़ती मैं
खबरों को लिखती -सुधारती मैं
कहीं सदन में मारपीट, कहीं आतंकी हमला
किसी अभिनेत्री का यौन शोषण,
तो किसी नये खिलाड़ी का उद्भव
द्वंद्व फिर उभरा क्या जीवन में
कुछ भी स्थायी नहीं है?
बचपन की दहलीज लांघ
कुछ रिश्ते थे जोड़े मैंने
क्षण भर का साथ निभा पुख्ता कर गये
वे रिश्ते कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है
लोगों ने भी दिये सबूत,विश्वास दिलाया मुझे
लेकिन सारे दावों को नकारती
मैं खड़ी हूं अपने विश्वास के साथ कि
प्रेम स्थायी है और यह हमेशा रहेगा कायम
मेरे जीवन के बाद भी,
मेरे इस विश्वास को प्राप्त है
आशीष शिवालय का भी
खड़ी हूं तुम्हारे सामने मैं इस दावे के साथ
आजीवन कायम रहेगा
प्रेम मेरा और तुम्हारा
इस विश्वास को दिल में समेट
मैं चल पड़ी थी घर की ओर
दरवाजा जो मैंने खटखटाया
मेरी जिंदगी ने बांह पसार कर बुलाया
असमंजस में जो लिपट गयी सीने से उसके
धड़कनों की बेचैनी समझ
उसने पूछा क्या हुआ माँ?
सवाल पर उसके थिरक गयी
मुस्कान मेरे चेहरे पर
विश्वास हुआ मजबूत
जीवन में प्रेम हमेशा होता है स्थायी
तब ही तो वह बिन बोले
समझ लेता है दिल की बात
दिल ने मजबूती से कहा मुझसे
प्रेम मेरा-तुम्हारा सच्चा है, बाकी सब बेमानी...
रजनीश आनंद
18-02-17
ख्वाहिश तो ना की थी कभी
कि पा लूं तुमको, लेकिन
कुछ यूं आये तुम जीवन मेंं
सारी ख्वाहिशें खारिज हो गयीं
बस एक ही तमन्ना है बाकी
मोहब्बत जो पा लूं तुम्हारी
दामन में सज जायेंगे खुशियों के सितारे
इल्तिजा है तो बस इतनी सी
एक दिन के लिए ही सही,
बना लो मलिका ए जिगर अपनी
महसूस होगा कुछ यूं मूझे जैसे
जन्नत में बीत गयी जिंदगी मेरी...
रजनीश आनंद
16-02-17