Love poetry लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Love poetry लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 2 अगस्त 2017

मृदुल स्पर्श

सुंदर, मृदुल स्पर्श
प्रियतम तुम्हारा
बेचैन तन मन
कांपते अधर
मूंदती पलकें
सांसों का थमना
लालिमा गालों पर
मादक आह, होठों पर
सब एकसाथ कहते हैं
मुझे तुमसे प्रेम है
प्रेम का यह अपनत्व
हर पल देता है तुम्हें
डाक, बस बहुत हुआ
अब तो आ जाओ...
रजनीश आनंद
02-08-17

शनिवार, 22 जुलाई 2017

हर स्त्री में राधा है...

कल 'कनुप्रिया' को पढ़ते वक्त लगा जैसे मैं खुद राधा हूं और जो मैं पढ़ रही हूं वह सब मेरे कनु के लिए हैं. आदरणीय धर्मवीर भारती जी ने जिस तरह एक नारी के मन को शब्दों में उकेरा है, मानो राधे उनके हृदय में विराजमान थीं और उनसे अपनी बातें कागज पर उतरवा रही थीं. मुझे ऐसा लगता है कि हर स्त्री जीवन में एक ना एक बार राधा होती है और उसके जीवन में कोई कृष्ण जरूर होता है. यह बात दीगर है कि खुद को किसी की राधा बताना रूक्मिणी के लिए आसान नहीं होता, खैर विषयांतर का इरादा नहींं है.  लेकिन मेरी इस बात को हर औरत अपने दिल पर हाथ रखकर महसूस कर सकती है.
आदरणीय भारती जी की कनुप्रिया पढ़ते वक्त कुछ ख्याल मेरे मन में आये, जिसे अपने 'कनु ' के लिए मैंने कलमबद्ध किया है. भारती जी क्षमायाचना के साथ मैं अपने भाव लिख रही हूं. मैं तुच्छ रचनाकार किंतु मन के भाव पवित्र हैंः-
मैं तुम्हारी कौन हूं कनु?
हर क्षण मेरा मन पूछता है मुझसे
आखिर किस हक से तू
कनु को अपना बताती है?
क्या संबंध है तेरा उससे
उसके सवाल से मैं थोड़ा
घबरा जरूर जाती हूं, लेकिन
फिर उन पलों का स्मरण होता है
जिन पलों में तुम साथ होते हो मेरे
तब बड़े अधिकार से
तुम्हारे बालों में हाथ फिराकर
मैं चूम लेती हूं, तुम्हारा माथा,पलकें,होंठ और छाती
फिर कहती हूं तुमसे,
आज इतनी देर से क्यों आये कनु?
तब बड़े अधिकार से, हंसकर
तुम कस लेते हो मुझे बांहों में
और मैं इतराकर अपनी वेणी
झटक देती हूं तुम्हारे मुख पर
तभी तुम पकड़ लेती मेरी वेणी
और खींचते हो मुझे अपनी ओर
पीड़ा होती है मुझे
आह, निकल जाती है, लेकिन
उस वक्त जो सुख मिलता है
उसके लिए मैं बार-बार अपनी
वेणी झटकना चाहती हूं मुख पर तुम्हारे
क्योंकि उस पल लगता है
मानो साम्राज्ञी हूं मैं तुम्हारे मन की
लेकिन जब तुम पास नहीं होते
तब यह मन फिर कहता है मुझसे
तू कौन है कनु की ?
तब अधीरता में मैं पुकारती हूं तुम्हें
पर तुम सुनते नहीं मेरी पुकार
तब बेचैनी और आशंका में , मैं कहती हूं
एक बार तो बोल दो कनु
मैं इतनी नासमझ नहीं कि समझ
ना सकूं तुम्हारी व्यस्तता
तब हंस कर कहते हो तुम
नहीं-नहीं, नासमझ नहीं तुम तो समझदार हो
मेरी प्रिय सखी, मेरी प्रेरणा
जिसे महसूस कर मैं रत  रहता हूं कर्मपथ पर
तो अकस्मात ऐसा भान होता है
जैसे मेरे पूरे शरीर से
ऊर्जा निकल रही हो
और तुम ओतप्रोत हो उससे
तब मैं कहती हूं  अपने मन से
देखो मैं ऊर्जा हूं अपने कनु की
लेकिन पावस ऋतु में जब
मेरा मन करता है तुमसे प्रेम निवेदन
और तुम बड़ी दुष्टता से मुझे सताने के लिए
करते हो मेरे मन की अनदेखी,उपेक्षा
और करते हो छेड़छाड़ मेरी सखियों संग
तब छलक आते हैं मेरे आंसू
तब कहती हूं मैं अपने मन से
कनु कोई नहींं मेरा, वह तो दुष्ट है
कोई संबंध नहीं मेरा उससे
लेकिन अगले ही पल
जब पीछे से आकर थाम लेते हो मुझे
और अपनी अंगुलियों से मेरे
बदन का स्पर्श कर छेड़ते हो
मनुहार करते हो, कहते तो तुम सिर्फ मेरे हो
तब झगड़ना चाहती हूं तुमसे, देना चाहती हूं उलाहना
लेकिन तुम चतुर, मुझे चुप कराने के लिए
अपने मुख से बंद कर देते हो मेरा मुख
तब अधखुली आंखों और गहराती सांसों के बीच
मैं कहती हूं अपने मन से
'कनु' मेरा सर्वस्व है, जान,जिंदगी,खुशी...

रजनीश आनंद
23-07-17

शनिवार, 15 जुलाई 2017

तुम्हारी आंंखें जैसे...

तुम्हारी आंखें जैसे
मां के हाथों का निवाला
तुम्हारी हंसी जैसे
खुशी का पैमाना
तुम्हारी बातें जैसे
झरने का मीठा जल
तुम्हारी फटकार जैसे
नारियल का खोल
तुम्हारा साथ जैसे
मजबूत चट्टान
तुम्हारे सपने जैसे
मोर का पंख
तुम्हारी मुस्कान जैसे
सतरंगी तितली
छूना चाहती हूं
तभी तो तुम्हारे
रसीले होंठों को
ताकि महसूस हो
तुम्हारा वजूद और
अनमोल प्रेम...
रजनीश आनंद
15-07-17

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

चांद का स्पर्श

जानते हो तुम
हर चांदनी रात में
मैंने धरती को
सिमटते देखा
ज्यों ज्यों पसरा चांद
उसके बदन पर
चांद का स्पर्श
तो नहींं था
नसीब में उसके
फिर भी वो
तन-मन से
उसकी हो ली थी...
रजनीश आनंद
14-07-17

सोमवार, 10 जुलाई 2017

थपकी

एक सपना संजोया
ना जानें क्यों कर
चांद रात में बन चांदनी
बिखरी थी मैं और तुम
सूरज बन चिपके थे
मेरे कलेजे से इस कदर
कि पिघल रही थी चांदनी
इस चांद-सूरज के मिलन में
लेकिन प्रेम के पालने में
सुलाया था तुमको
और दे रही थी थपकी....
................
सपने में आये तुम
प्रेम का पौधा लिये
रोपा मैंने उसे कोख में
पलकों से सींचा
पल में  लहलहाया वृक्ष
हम-तुम थे एक ही डोर में गुथे
रजनीश आनंद
10-07-17

शनिवार, 8 जुलाई 2017

दृगों में यह अभिमान पनपने दो...

जिंदगी के कैनवास पर
उम्मीद की कूची लिये
मैं हर रोज बनाती हूं
एक लड़की की तसवीर
ना जाने क्यों वह बिलकुल
मेरी तरह दिखने लगती है
जिसकी आंंखों में सजे हैं सपने कई
जब महसूस करना चाहती उन्हें
तो उसके नयन पूछते हैं
क्या सपने कभी होंगे सच?
उसके सवालों में जब डूबती हूं
तो अंतरमन कहता है
नहीं चाहती विलासिता कोई
तुम्हारी मीठी मुस्कान बना देगी
मुझे मलिका इस जहान की
मैंने कब चाहा कि तुम कहो
मैं जिंदगी हूं तुम्हारी
पर मेरे दृगों में यह
अभिमान तो पनपने दो
कि तुम्हारी हूं मैं...

रजनीश आनंद
08-07-17

रविवार, 18 जून 2017

जिंंदगी की थाली...

जिंदगी की थाली में
व्यंजन तो कई थे
लेकिन रसोइये ने
नमक ना डालने की
भूल कर दी थी
सब फीका-फीका सा था
हर कौर को उठाकर
जब मुख तक लाती मैं
बेस्वाद है ऐसा बोल पड़ती थी
जिह्वा मेरी, लेकिन
भोजन को सुस्वादु बनाने में
ना जाने क्यों रुचि नहींं थी मेरी
सफर-ए-जिंदगी के बीच में
आया एक राहगीर
मेरे व्यंजनों पर उसने दौड़ाई नजर
हौले से मुस्काया
फिर ना जाने उसे क्या सूझी
एक तेज फूंक मारी उसने
मेरी बेस्वाद थाली पर
और
अगले ही स्टेशन पर गया उतर
उसके जाने पर ज्योंही
मैंने थाली से उठाया
एक कौर और रखा जिह्वा पर
भोजन के स्वाद से
मुख के साथ-साथ
पूरा तन-बदन रोमांचित हुआ
फूंक का रहस्य जो समझी मैं
भागी उस राहगीर के पीछे
लेकिन वो जा चुका था
मेरी थाली के व्यंजनों में
नमक छिड़ककर
मुझे मिली मात्र उसके
फूंक की सुंगध
जिससे सराबोर मैं
आजीवन लिख लिया
हृदय पर नाम
उस राहगीर का...
रजनीश आनंद
18-07-17

शनिवार, 10 जून 2017

इस डर से नहींं सजाती हिना...

चांद पूनम का हो,दूज का हो
या फिर बदली मेंं छिपा क्यों ना हो
कमतर नहीं होती उसकी खूबसूरती
जैसे तुम पास हो, बांहों में हो या फिर
सैकड़ों मील दूर, कसक कम नहींं होती
तुम्हारे प्यार की, एहसास की.

---------------------------------

सोचती हूं कैसे खुशनसीब हैं वो
जो प्यार की अति से ऊब जाते हैं
हम तो उनकी एक नजर के लिए भी
हरपल तरसते रहते हैं.
-------------------------
वर्षों हुए हाथोंं में मेहंदी सजाये
उसका सुर्ख रंग भाता नहीं मुझे
यह भी सच नहींं, पर इस डर से
नहींं सजाती हिना कि जो तुम पास ना होगे
तो कौन संवारेगा मेरी बिखरी जुल्फों को.

रजनीश आनंद
10-06-17

बुधवार, 31 मई 2017

हृदय पर अंकित मैं

ये रात कुछ ऐसी बिखरी है
जैसे टूटकर बिखरा हो
तुम्हारा प्यार मुझपर
मैं समेट कर इन्हें
सजाना चाहती हूं तनबदन
ताकि जिस रात तुम
ना हो साथ मेरे
मैं इन सजावट को जी लूं
महसूस लूं तुम्हारी
खुशबू को जो बिखरी है आसपास
थाम कर तुम्हारे दोनों हाथ
मैं देखना चाहती हूं
हाथ की रेखाओं में
अपना नाम, लेकिन!!!
ना पाकर अपना नाम
जब झलकते हैं नयन मेरे
तो दोनों हाथोंं से सहेज कर मुझे
तुम अपने हृदय पर लिखा मेरा नाम दिखाते हो...
रजनीश आनंद
31-05-17

गुरुवार, 18 मई 2017

तुम मेरे जीवन की प्रेम कविता...

तुम मेरे जीवन की प्रेम कविता हो
बहते हो नस-नस में जीवन सरिता बनकर
मेरे दृगों में सजती है छवि तुम्हारी
वाणी से फूटते हैं तुम्हारे बोल
विचारों में बुनती हूं तुम्हारे साथ के सपने
चोट लगे तो आह की जगह निकलता है नाम तुम्हारा
खुशी की खबर तो खैर तुम्हारे नाम के
लिफाफे में ही कैद होकर आती है पास मेरे
सोचती हूं आखिर क्यों है इतना प्रेम तुमसे
तो मन कहता है , बाती ने कभी बताया
उसे क्यों है दीपक से इतना प्रेम
चांदनी और चांद के प्रेम का क्या है रहस्य?
तुम तो बस प्रेम करो और जीयो इस जीवन को
जो रौशन है उसकी एक बात से कि वो तुम्हारा है...
रजनीश आनंद
18-05-17

बुधवार, 22 मार्च 2017

कविता

हर रात जब
मैं अकेली होती हूं
लाख मना करती हूं
फिर भी दबे पांव
चली आती है तुम्हारी याद
मैं कहती हूं उससे
जाओ ना सताओ
जब प्रिये नहीं आते
तो तू क्यों चली आती है
मुझे मजबूर करने
आंखों में रात बिताने को
क्यों मुझे बेबस करती हो
लिखने के लिए एक कविता
दिल से मजबूर मैं
लिखना चाहती हूं मन की हर बात
हर तड़प, हर सिहरन
लेकिन जैसी ही मैं
कलम पकड़कर बैठती हूं
यादें, लिखकर बैठ जाती हैं नाम तुम्हारा
और मैं कागज पर अंकित उस
नाम को निहारती रह जाती हूं
दिल कहता है
इससे अच्छी कविता क्या होगी...
रजनीश आनंद
22-03-17

गुरुवार, 16 मार्च 2017

आज की रात...

काश, आज की रात
तुम आ जाते सपनों में मेरे
तो मैं जी लेती मनमाफिक जिंदगी
कभी वसंती हवा बन इठलाती
तो कभी बरखा बन बरस जाती
सीने पर तुम्हारे
छोटे से उस पल को ऐसे जीती
मानों जी ली पूरी जिंदगी
गीत सुनाती तुम्हें प्रेम के
और कहानी मधुर मिलन के
करती सोलह श्रृंगार और
तुम्हें रिझाती बन कर रति
कभी सीने से लगकर तुम्हें
सुनाती पीड़ा अकेली रातों की
आखों से जो अश्रु बहता
वो साक्ष्य बनता मेरी तड़प का
सांसें मेरी कहती तुमसे
बांधकर रखना मेरा लक्ष्य नहीं
हां, मैं देना चाहती हूं तुम्हें
अधरों से अपने प्रेम निशानी
आज की रात जो तुम आ जाते...
रजनीश आनंद
16-03-17

शनिवार, 11 मार्च 2017

फिशपॉट

मेरे कमरे के कोने में
पड़ा है एक फिशपॉट
चार-पांच मछलियां
हमेशा तैरती दिखतीं हैं
कमरे होने वाली हर
हलचल से दूर पानी में गोते खातीं हुईं
बिलकुल वैसे ही जैसे
मेरी दुनिया सिमटी है तुम्हारी बांहों मेंं
जब तुम अपनी बांहों को खोलकर
कहते हो आओ प्रिये
और समेट लेते हो मुझे
तो मैं कहना चाहती हूं
बहुत कुछ अपने मन की
लेकिन जुबान साथ नहीं देते
हलक तक आकर रह जातीं हैं बातें
हां, तुम चाहो तो पढ़ लो मेरी आंखें
इनमें अंकित हैं मेरे मन की बातें
तुम बिन कितनी रातें मैंने
आंखों में बिताई, कितने सपने संजोए
इसपर साफ लिखा है
तुम्हारे स्पर्श की नरमाई,सिहरन और
जादुई बातें हैं मेरे जीवन का फिशपॉट
जिनमें डूबकर जीना चाहती हूं मैं...
रजनीश आनंद
11-03-17

मंगलवार, 7 मार्च 2017

तुम्हारे नाम की गूंज...

हिज्र की रातों में
आंखें मूंदें मैं लेना चाहती हूं तुम्हारा नाम
एक बार नहीं, कई बार
ताकि महसूस कर सकूं तुम्हें
मैं जितनी बार पुकारती हूं तुम्हारा नाम
तन-बदन में मौजूद सिहरन
और तड़प दे जाती है सुकून
मैं खोना चाहती हूं
तुम्हारे नाम की गूंज में
ताकि फिजाओं में गूंजें
हमारे मिलन की ध्वनि
और तुम आकर मेरे
कानों में फुसफुसा जाओ
तुम मेरी, हां सिर्फ मेरी हो
फिर कुछ और सुनने की
चाह शेष रह जायेगी क्या भला?
रजनीश आनंद
07-03-17



शनिवार, 4 मार्च 2017

मौसम हुआ रूमानी...

अचानक मौसम कुछ यूं हुआ रूमानी
जैसे कभी-कभी तुम हो जाते हो
ऐसे में बादलों को बरसता देख जी किया
मैं सिमट जाऊं आकर तुम्हारी बांहों में
अदेह स्वरूप में ही सही, मैं रहना चाहती हूं
गिरफ्त में तुम्हारी बांहों के हमेशा
तभी तो छतरी को खोल मैं निकल गयी थी सड़क पर
तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने, कुछ देर जीने
छतरी के घेरे ने कराया तुम्हारे होने का एहसास
मैंने उसे ऐसे थामा जैसे थामना चाहती हूं तुम्हें
आज तुमसे बात करने की बहुत थी चाह
इसलिए मैंने खूब कही अपने मन की
जानते हो मैंने सवाल खुद किया और
तुम्हारी तरफ से जवाब भी दे दिया
ख्यालों में ही सही तुम सुनते रहे मुझे
यूं तो मैं जानती हूं अपने बारे में
हर छोटी-बड़ी बात लेकिन
जब तुम कहते हो उन्हें
अहसास कराते हो मुझे की मैंं खास हूं
तो सुकून मिलता है. जैसे अभी मिल रहा है
धरती से टकराती इन बारिश की बूंदों को देखकर
एहसास हो रहा है मानो मिल रहे हों हम-तुम...
रजनीश आनंद
04-03-17

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

मुट्ठी में खुशी...

जिंदगी की जद्दोजहद ने
छिन ली थी मेरे होंठों की हंसी,
जो मुस्कान दिखती थी
वो दरअसल झूठ का पुलिंदा थी
खोखली हंसी, जिसकी गूंज में
साफ सुनाई पड़ जाती थीं मेरी सिसकियां
मेरा दिल हमेशा कहता था मुझसे
सुन ले तू कभी मेरी भी, तो
आज उसकी बात का असर
दिख गया मुझपर और
मैंने जिंदगी के दामन से
एक चीज चुराकर
कस कर जकड़ लिया है मुट्ठी में
सोचा है अब कभी नहीं छोड़ूगी उसे
परिस्थिति चाहे लाख विकट हो,
तभी मेरी नजर राह चलते
एक बच्चे पर पड़ी
धूल से सने, उस फटेहाल बच्चे की
नजर मेरी मुट्ठी पर थी
शायद वो जानना चाह रहा था
मेरी मुट्ठी का रहस्य
मैं घबराई, सोचा कहीं इसकी नजर
मेरी उस संपत्ति पर तो नहीं
जिसे चुराया था मैंने जिंदगी के दामन से
शायद उसने पकड़ ली थी मेरी चोरी
सहसा वो मेरे नजदीक आया
मेरी आंखों में झांकर कहा उसने
जो तेरी मुट्ठी में है उसे बांट मेरे संग
तेरी खुशी दोगुनी हो जायेगी
मैं उससे बचना चाह रही थी
लेकिन वो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था
मैंने सोचा जब इसे पता ही है
मेरी चोरी का, तो बांट लेती हूं
उस खुशी को जिसे चुराकर रखा था
मैंने अपनी मुट्ठी में कैद करके
बच्चे के सामने मैंने ज्योंही खोली मुट्ठी
उसके होंठों पर थिरकी मुस्कान और आंखों में चमक
उसकी खुशी देख मैं खिलखिला उठी
लेकिन उसकी गूंज से सिसकियां गायब थी
बस सुनाई दिया था , तो सिर्फ तुम्हारे आने का संदेश...
रजनीश आनंद
03-03-17

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

...जिसपर लिखा था सबसे छुपाकर तुम्हारा नाम

रात की तन्हाई में जब भी
मैं किताब को थाम कर बैठती हूं
तुम्हारे आसपास होने का एहसास
करा जाती हैं हवाएं.
कानों में चुपके से कहतीं हैं
सोना नहीं वो आयेगा
सजा ले सपने तू पलकों पे
सुन कर उसकी बात मैंने
लजाकर ज्यों किताब को भींचा
हैरान हो गयी मैं
किताब में धड़क रहा था तुम्हारा दिल
धड़कते दिल की बात समझने की
चाह में मैंने पलटा ज्यों किताब का पन्ना
तुम्हारी प्यारी आवाज कानों में गूंज गयी
जिसने किया मुझसे ये वादा
तुम हर पल साथ खड़े हो मेरे
देह या अदेह, स्वरूप कोई भी हो
तुमने थाम रखा है हाथ मेरा
तुम हर संघर्ष में हो साथ मेरे
पहाड़ से मजबूत इरादों के साथ
तुम्हारे वादे पर यकीन कर मैंने
किताब को चूम लिया
जिसपर लिख रखा था
सबसे छुपाकर मैंने नाम तुम्हारा...
रजनीश आनंद
23-02-17

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

... रात की खामोशी कलरव में बदल गयी

मेरी बोलती रातें अचानक
यूं खामोश हुईं कि उसकी
आह तक नहीं पहुंच पा रही थी मुझतक
मैं तरस गयी थी उसकी एक हां सुनने को
लेकिन उसने इस कदर अलग किया था
खुद को मुझसे कि चाहकर भी
जकड़ ना पायी मैं उसे, खामोशी के साथ
आंखों में सारी रात गयी.
अहले सुबह जब मैंने खोला घर का दरवाजा
चांद को चमकते देखा आंगन में
एक उम्मीद सी जागी, लगा अभी बहुत कुछ है शेष
तभी फागुनी बयार ने हल्के से छुआ मुझे
जैसे दे गया हो किसी का संदेश
लेकिन मन को भरोसा ना हुआ
सुबह का अखबार हाथ में लिये
 मैं चली आयी कमरे में
रोजमर्रा के काम तो निपटाती गयी मैं
लेकिन रात की खामोशी,
मन में वाचाल थी, जो अंदर से तोड़ रही थी मुझे
सुबह की पहली चाय की प्याली को उठा
ज्यों होंठों से लगाया, वो फीकी चाय
करा गयी मुझमें किसी की उपस्थिति
उस उपस्थिति को कस के जकड़ा मैंने
मन को समझाया, इंतजार कर सब ठीक होगा
मंजिल से दूर नहीं तू पास है बिलकुल
इस सकारात्मकता को मन में लिये
भारी कदमों से मैं चली थी आफिस की ओर
तभी मेरे फोन की घंटी कुछ यूं बजी
कि रात की खामोशी कलरव में बदल गयी
मन चहक उठा, नयन बरस गये
क्योंकि मजबूती के साथ खड़ी थी ‘जिंदगी’...

रजनीश आनंद
21-02-17

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

एक द्वंद्व सुबह-शाम

एक द्वंद्व सुबह -शाम,
चला मेरे मन में आज
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है?
आफिस की सीढ़यों को गिनते हुए
जब मैं पहुंची अपने कमरे तक
कई पुरानी यादें मेरीे मानसपटल पर छा गयीं
बचपन से आजतक टूटें कई सपने मेरे
टूटे हुए खिलौनों की कसक
अब भी हैै मन में बाकी
वे खिलौने पूछते हैं मुझसे
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं?
कंप्यूटर के की-बोर्ड को दिनभर खड़खड़ती मैं
खबरों को लिखती -सुधारती मैं
कहीं सदन में मारपीट, कहीं आतंकी हमला
किसी अभिनेत्री का यौन शोषण,
तो किसी नये खिलाड़ी का उद्भव
द्वंद्व फिर उभरा क्या जीवन में
कुछ भी स्थायी नहीं है?
बचपन की दहलीज लांघ
कुछ रिश्ते थे जोड़े मैंने
क्षण भर का साथ निभा पुख्ता कर गये
वे रिश्ते कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है
लोगों ने भी दिये सबूत,विश्वास दिलाया मुझे
लेकिन सारे दावों को नकारती
मैं खड़ी हूं अपने विश्वास के साथ कि
प्रेम स्थायी है और यह हमेशा रहेगा कायम
मेरे जीवन के बाद भी,
मेरे इस विश्वास को प्राप्त है
आशीष शिवालय का भी
खड़ी हूं तुम्हारे सामने मैं इस दावे के साथ
आजीवन कायम रहेगा
प्रेम मेरा और तुम्हारा
इस विश्वास को दिल में समेट
मैं चल पड़ी थी घर की ओर
दरवाजा जो मैंने खटखटाया
मेरी जिंदगी ने बांह पसार कर बुलाया
असमंजस में जो लिपट गयी सीने से उसके
धड़कनों की बेचैनी समझ
उसने पूछा क्या हुआ माँ?
सवाल पर उसके थिरक गयी
मुस्कान मेरे चेहरे पर
विश्वास हुआ मजबूत
जीवन में प्रेम हमेशा होता है स्थायी
तब ही तो वह बिन बोले
समझ लेता है दिल की बात
दिल ने मजबूती से कहा मुझसे
प्रेम मेरा-तुम्हारा सच्चा है, बाकी सब बेमानी...
रजनीश आनंद
18-02-17


गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ख्वाहिश


ख्वाहिश तो ना की थी कभी

कि पा लूं तुमको, लेकिन

कुछ यूं आये तुम जीवन मेंं

सारी ख्वाहिशें खारिज हो गयीं

बस एक ही तमन्ना है बाकी

मोहब्बत जो पा लूं तुम्हारी

दामन में सज जायेंगे खुशियों के सितारे

इल्तिजा है तो बस इतनी सी

एक दिन के लिए ही सही,

 बना लो मलिका ए जिगर अपनी

महसूस होगा कुछ यूं मूझे जैसे

जन्नत में बीत गयी जिंदगी मेरी...

रजनीश आनंद
16-02-17