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गुरुवार, 1 अगस्त 2019

जूठे बरतन

किचन में सिंक तक भरे जूठे बरतन,
देख, कभी- कभी घबरा जाती हूं मैं
फिर आश्वासन देती हूं खुद को
नहीं बहुत थकान नहीं होगी, ज्यादा नहीं है
बेतरतीब ढंग से रखे हैं बस
फिर धीमे से नल खोल मैं पहले
कप-प्लेट और वैसे बरतनों को मांजकर
और धोकर, हटाती हूं, भ्रम बनाये रखना चाहती हूं
कम बरतनों का, फिर थाली और गिलास
कुकर और तेल से चिपचिपी काली हो चुकी कढ़ाई को
तो बस तिरछे नजर से देखा ही है,  हाथ नहीं लगाया
लेकिन एक दो तीन,  चार और थालियों को गिनना छोड़
मैं व्यस्त हूं मांजने और धोने की प्रक्रिया में
बीच-बीच में पानी सिंक के छलनी से निकलता नहीं
तब मैं तन्मयता से साफ करती हूं उसे ताकी पानी जमे ना
सिंक से बाहर ना आये,  फिर सूंऊऊऊ की ध्वनि और
सारा पानी सिंक से बाहर, अनाज, सब्जी,  रोटी के टुकड़े
जो बाधा बने तो मेरे बरतन धोने की क्रिया में सब को
निकाल कूड़ेदान में डाल दिया है मैंने,  ना जाने क्यों
मजा सा आने लगा है इस द्वंद्व में, जिंदगी की जंग सा
जब भी डूबने का एहसास हुआ, खूब हाथ पैर मारा
और अंततः खाली सिंक सी साफ जिंदगी,  जद्दोजहद के बीच
हर बरतन एक पड़ाव जिंदगी का, उसे मांजना-धोना
जीवन जीने की कोशिश,  कठिन परिस्थितियां, 
जैसे तेल में जली कढ़ाई, और उसे साफ करना,  मेरा संघर्ष
जैसे-जैसे कालिख हटती है कढ़ाई निखरती है
और मजा आता है, जीने का,  थकान से परे,
मेरे चेहरे पर खुशी है,  संघर्ष के पलों को जीतने की...

रजनीश आनंद

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

उम्मीद

जीवन  में क्या मायने हैं उम्मीद के?
यह सवाल मेरे लिए बेमानी था तब तक,
जब तक की मैंने नहीं थामा था दामन इसका
पर ज्योंही मैंने उम्मीद को आगोश में लिया
वह धंस सा गया मेरे सीने में
मैं पिघलती गयी उसके सीने से लगकर
और वह मेरी कमजोरी बनता गया
जकड़ लिया बिलकुल उसने मुझे
फिर शातिर खिलाड़ी की तरह उसने कुतरे मेरे पर
मैं झटपटाई, लेकिन कुछ कर ना पायी
उम्मीद ने तो कैद कर लिया था मुझे पिंजरे में
सपने टूटे, वास्तविकता सामने थी मेरे
उम्मीद का चेहरा क्रूर होता जा रहा था
मैं डरने लगी थी उससे और उसका आगोश
चुभने लगा था मुझे, तब समझ पा रही थी मैं
उम्मीद के टूटने का दर्द, हां अब भी स्मरण है
जब पहली बार टूटी थी उम्मीद
प्रतीत हुआ था चांदनी रात में
छा गया हो अमावस जैसे
बहे थे इतने आंसू कि पोंछने की
इच्छा ना रही थी शेष, लेकिन
अब मैं समझ गयी हूं
उम्मीद है , तो सकारात्मक अनुभूति
किंतु जो इसका गुलाम हुआ इसने
दोजख से बदतर कर दी उसकी जिंदगी
इसलिए प्रण किया है मैंने
उम्मीद से प्रेम तो करूंगी, लेकिन
नहीं बनने दूंगी उसे मेरा भाग्यविधाता
क्योंक नकारात्मकता से मुझे चिढ़ है
जीवन सुंदर है इसे एक उम्मीद पर कुर्बान क्यों करना?
रजनीश आनंद
24-02-17

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

रेत की तरह फिसलती है जाती है जिंदगी...

अजीब है जिंदगी
मैं जितना सहेजना चाहती हूं
रेत की तरह फिसलती जाती है
मेरी हाथों से
ऐसा नहीं कि मुझे मोहब्बत नहीं जिंदगी से
लेकिन मुझसे हो जाती हैं कुछ गलतियां
भय और आशंका के बीच ऐसा महसूस होता है
मानो जिंदगी अनदेखी कर रही है मेरी
उपेक्षा की भावना घर कर जाती है
मैं जिंदगी को समझा नहीं पाती अपनी बातें
मैं चाहती हूं कि जिंदगी खुशनुमा हो
इस चाह में पकड़ना चाहती हूं
उसे प्रेम से
लेकिन उसे घुटन महसूस होती है
मैं तो बस उसके सीने से लगकर
कहना चाहती थी तुम साथ रहो मेरे
क्योंकि तुम बिन
सूरज की ऊष्मा नहीं होती महसूस
हवा की शीतलता, मन को नहीं देती शीतलता
जिंदगी का हर व्यंजन हो जाता है बेस्वाद
लेकिन शायद मेरा तरीका गलत है
तभी तो जिंदगी रूठ गयी है मुझसे
तो क्या दफन हो जायेंगे मेरे सारे ख्वाब
जो देखे हैं मैंने जिंदगी की आंखों में?
नहीं-नहीं ऐसा ना कर ‘ओ जिंदगी’!
गुजारिश है सुन लो मेरी बात
मैंने जो भी आरोप लगाये तुमपर
वह दुर्भावनावश नहीं हैं
बस इसके मूल में तुमसे प्रेम ही है
हां, लेकिन अब समझ गयी हूं मैं
जिंदगी को संवारने के लिए प्रेम काफी नहीं
कई और चीजें भी हैं, हुनर भी हैं
जो सिखा देगी जिंदगी मुझे...

रजनीश आनंद
18-02-17