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शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

खून के धब्बे

सफेद कपड़ों पर लगे खून के दाग
आसानी से नहीं धुलते
अगर रख दिया हो उन्हें छिपाकर वर्षों
सर्फ एक्सेल से भी नहीं धुलते
खौलता पानी डालकर,  साबुन लगाकर
ब्रश से घिसो तब भी
हल्के होते हैं, पर धुलते नहीं
मरे रिश्तों की तरह चिपके खून के दाग
मौत तो स्वीकार्य है, हत्या नहीं
तभी तो इंसान घिसता रहता है
सफेद कमीज को,  परिणाम जानते हुए भी...

रजनीश आनंद

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

दीवार पर पड़ी कील

दीवार पर ठोंकी एक कील
कपड़े और मच्छर दानी के लिए
तो कुछ दिन में व्यवस्थित सी हो गयी
जिंदगी और अस्त-व्यस्त सा दिखने वाला कमरा
धीरे-धीरे बढ़ने लगी निर्भरता कील पर
कभी सब्जी का थैला,  कभी घर की चाबी
लेकिन कील ने कभी सेवा देने से इनकार नहीं किया
अनामिका अंगुली के बराबर भी ना थी कील
लेकिन उम्मीदें हजारों थी उससे
हैंडबैग,  पापा की छड़ी सब टंगते थे उसपर
पर उस रोज,  जब भींगे कपड़ों की रस्सी टांग दी गयी
तो सर्रर से निकल आयी थी कील दीवार से
और मेरे हाथों में पड़ा शव मेरे नापाक उम्मीदों का...

रजनीश आनंद

बुधवार, 22 मार्च 2017

कविता

हर रात जब
मैं अकेली होती हूं
लाख मना करती हूं
फिर भी दबे पांव
चली आती है तुम्हारी याद
मैं कहती हूं उससे
जाओ ना सताओ
जब प्रिये नहीं आते
तो तू क्यों चली आती है
मुझे मजबूर करने
आंखों में रात बिताने को
क्यों मुझे बेबस करती हो
लिखने के लिए एक कविता
दिल से मजबूर मैं
लिखना चाहती हूं मन की हर बात
हर तड़प, हर सिहरन
लेकिन जैसी ही मैं
कलम पकड़कर बैठती हूं
यादें, लिखकर बैठ जाती हैं नाम तुम्हारा
और मैं कागज पर अंकित उस
नाम को निहारती रह जाती हूं
दिल कहता है
इससे अच्छी कविता क्या होगी...
रजनीश आनंद
22-03-17

योगी के कारण हुआ मेरा मोहभंग

मोहभंग होना दुखद स्थिति है,लेकिन मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मेरा मोहभंग हुआ है. हां भाजपा से मेरा मोहभंग हुआ है. मुझे यह कहने में न कोई शर्म है संकोच कि मैंने  भाजपा का अबतक सही नीतियों पर समर्थन किया है अटल बिहारी वाजपेयी मेरे प्रिय नेता थे , हैं और हमेशा रहेंगे. जितने दिन भी वे सत्ता में रहे देश को विकास को ओर ले जाने का प्रयास किया. बात चाहे अर्थव्यवस्था की हो या विदेश नीति की उन्होंने शानदार काम किया. जबकि वे गठबंधन की सरकार चला रहे थे. लेकिन आज भाजपा का जो चेहरा उभरकर सामने आया है, मैं उसके समर्थन में ना पहले थी, ना भविष्य में कभी रहूंगी.
हां मैं बात कर रही हूं उत्तरप्रदेश की, जहां योगी आदित्यनाथ सीएम बने हैं उनका चयन कहीं से भी शुभ नहीं है.और यह साबित करता है कि मोदी जी विकास का जो दावा करते वो खोखला है. प्रचंंड बहुमत के बाद योगी आदित्यनाथ का चयन किस मजबूरी के कारण मोदी जी ने किया है. कहा जा रहा है कि योगी मोदी की पसंद नहीं, तो क्या यह माना जाये कि संघ पीएम से अधिक शक्तिशाली है?
एक ऐसा व्यक्ति जो नफरत फैलाता हो, जिसके पास कोई विजन ना हो ,वो प्रदेश को किस ओर ले जायेगा? कानून व्यवस्था का प्रदेश में क्या होगा भगवा जाने, जिस मठ के लोग बंदूक तान रहते हैं अब उनकी सरकार है. महिलाओं पर कितनी बंदिश लगेगी, पता नहीं.  मजनू स्क्वायड और गुटखा पर प्रतिबंध से कुछ नहीं होगा.प्रदेश का विकास होता है शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार और बुनियादी जरूरतों की उपलब्धता से. राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि योगी जी भविष्य के नेता हैं, जो मोदी जी को रिप्लेस करेंगे. तो ऐसे में क्या होगा देश का , देश की छवि का. विदेशनीति का. मोदी जी तो दावा करते हैं कि भारत अगले कुछ वर्षों में विश्व की महानशक्ति बनेगा, लेकिन योगी जी के आने के बाद तो यह कैसे होगा समझ नहीं आ रहा है.

रजनीश आनंद
22-03-17

मंगलवार, 21 मार्च 2017

शुभ संकेत

एक जुगनू आज
मेरे बिस्तर पर
कुछ यूं मंडराया
मानों दे रहा हो
कोई शुभ संकेत
मैंने भी आस का
दामन थाम लिया
सुना था कहीं
शुभ होता है यूं
जुगनुओं का मंडराना
जीवन के संघर्षपथ पर
संकल्पशक्ति के साथ
जब मिलाप होता है
ऐसे शुभसंकेतों का
तो इससे जन्मी ऊष्मा
इंसान को प्रेरित करती है
जूझने के लिए
जुगनू की रोशनी
कब बन गयी सूरज की
मुझे पता भी ना चला
लेकिन मैंने देखा सूरज को
मेरे लिए जलते हुए...
रजनीश आनंद
21-03-17

गुरुवार, 16 मार्च 2017

आज की रात...

काश, आज की रात
तुम आ जाते सपनों में मेरे
तो मैं जी लेती मनमाफिक जिंदगी
कभी वसंती हवा बन इठलाती
तो कभी बरखा बन बरस जाती
सीने पर तुम्हारे
छोटे से उस पल को ऐसे जीती
मानों जी ली पूरी जिंदगी
गीत सुनाती तुम्हें प्रेम के
और कहानी मधुर मिलन के
करती सोलह श्रृंगार और
तुम्हें रिझाती बन कर रति
कभी सीने से लगकर तुम्हें
सुनाती पीड़ा अकेली रातों की
आखों से जो अश्रु बहता
वो साक्ष्य बनता मेरी तड़प का
सांसें मेरी कहती तुमसे
बांधकर रखना मेरा लक्ष्य नहीं
हां, मैं देना चाहती हूं तुम्हें
अधरों से अपने प्रेम निशानी
आज की रात जो तुम आ जाते...
रजनीश आनंद
16-03-17

शनिवार, 11 मार्च 2017

फिशपॉट

मेरे कमरे के कोने में
पड़ा है एक फिशपॉट
चार-पांच मछलियां
हमेशा तैरती दिखतीं हैं
कमरे होने वाली हर
हलचल से दूर पानी में गोते खातीं हुईं
बिलकुल वैसे ही जैसे
मेरी दुनिया सिमटी है तुम्हारी बांहों मेंं
जब तुम अपनी बांहों को खोलकर
कहते हो आओ प्रिये
और समेट लेते हो मुझे
तो मैं कहना चाहती हूं
बहुत कुछ अपने मन की
लेकिन जुबान साथ नहीं देते
हलक तक आकर रह जातीं हैं बातें
हां, तुम चाहो तो पढ़ लो मेरी आंखें
इनमें अंकित हैं मेरे मन की बातें
तुम बिन कितनी रातें मैंने
आंखों में बिताई, कितने सपने संजोए
इसपर साफ लिखा है
तुम्हारे स्पर्श की नरमाई,सिहरन और
जादुई बातें हैं मेरे जीवन का फिशपॉट
जिनमें डूबकर जीना चाहती हूं मैं...
रजनीश आनंद
11-03-17

मंगलवार, 7 मार्च 2017

तुम्हारे नाम की गूंज...

हिज्र की रातों में
आंखें मूंदें मैं लेना चाहती हूं तुम्हारा नाम
एक बार नहीं, कई बार
ताकि महसूस कर सकूं तुम्हें
मैं जितनी बार पुकारती हूं तुम्हारा नाम
तन-बदन में मौजूद सिहरन
और तड़प दे जाती है सुकून
मैं खोना चाहती हूं
तुम्हारे नाम की गूंज में
ताकि फिजाओं में गूंजें
हमारे मिलन की ध्वनि
और तुम आकर मेरे
कानों में फुसफुसा जाओ
तुम मेरी, हां सिर्फ मेरी हो
फिर कुछ और सुनने की
चाह शेष रह जायेगी क्या भला?
रजनीश आनंद
07-03-17



शनिवार, 4 मार्च 2017

मौसम हुआ रूमानी...

अचानक मौसम कुछ यूं हुआ रूमानी
जैसे कभी-कभी तुम हो जाते हो
ऐसे में बादलों को बरसता देख जी किया
मैं सिमट जाऊं आकर तुम्हारी बांहों में
अदेह स्वरूप में ही सही, मैं रहना चाहती हूं
गिरफ्त में तुम्हारी बांहों के हमेशा
तभी तो छतरी को खोल मैं निकल गयी थी सड़क पर
तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने, कुछ देर जीने
छतरी के घेरे ने कराया तुम्हारे होने का एहसास
मैंने उसे ऐसे थामा जैसे थामना चाहती हूं तुम्हें
आज तुमसे बात करने की बहुत थी चाह
इसलिए मैंने खूब कही अपने मन की
जानते हो मैंने सवाल खुद किया और
तुम्हारी तरफ से जवाब भी दे दिया
ख्यालों में ही सही तुम सुनते रहे मुझे
यूं तो मैं जानती हूं अपने बारे में
हर छोटी-बड़ी बात लेकिन
जब तुम कहते हो उन्हें
अहसास कराते हो मुझे की मैंं खास हूं
तो सुकून मिलता है. जैसे अभी मिल रहा है
धरती से टकराती इन बारिश की बूंदों को देखकर
एहसास हो रहा है मानो मिल रहे हों हम-तुम...
रजनीश आनंद
04-03-17

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

मुट्ठी में खुशी...

जिंदगी की जद्दोजहद ने
छिन ली थी मेरे होंठों की हंसी,
जो मुस्कान दिखती थी
वो दरअसल झूठ का पुलिंदा थी
खोखली हंसी, जिसकी गूंज में
साफ सुनाई पड़ जाती थीं मेरी सिसकियां
मेरा दिल हमेशा कहता था मुझसे
सुन ले तू कभी मेरी भी, तो
आज उसकी बात का असर
दिख गया मुझपर और
मैंने जिंदगी के दामन से
एक चीज चुराकर
कस कर जकड़ लिया है मुट्ठी में
सोचा है अब कभी नहीं छोड़ूगी उसे
परिस्थिति चाहे लाख विकट हो,
तभी मेरी नजर राह चलते
एक बच्चे पर पड़ी
धूल से सने, उस फटेहाल बच्चे की
नजर मेरी मुट्ठी पर थी
शायद वो जानना चाह रहा था
मेरी मुट्ठी का रहस्य
मैं घबराई, सोचा कहीं इसकी नजर
मेरी उस संपत्ति पर तो नहीं
जिसे चुराया था मैंने जिंदगी के दामन से
शायद उसने पकड़ ली थी मेरी चोरी
सहसा वो मेरे नजदीक आया
मेरी आंखों में झांकर कहा उसने
जो तेरी मुट्ठी में है उसे बांट मेरे संग
तेरी खुशी दोगुनी हो जायेगी
मैं उससे बचना चाह रही थी
लेकिन वो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था
मैंने सोचा जब इसे पता ही है
मेरी चोरी का, तो बांट लेती हूं
उस खुशी को जिसे चुराकर रखा था
मैंने अपनी मुट्ठी में कैद करके
बच्चे के सामने मैंने ज्योंही खोली मुट्ठी
उसके होंठों पर थिरकी मुस्कान और आंखों में चमक
उसकी खुशी देख मैं खिलखिला उठी
लेकिन उसकी गूंज से सिसकियां गायब थी
बस सुनाई दिया था , तो सिर्फ तुम्हारे आने का संदेश...
रजनीश आनंद
03-03-17

बुधवार, 1 मार्च 2017

ठूंठ बना रिश्ता

क्यों ठूंठ बन गया हमारे रिश्ते का पौधा?
कभी जानने की कोशिश की तुमने?
याद करो वो दिन, जब बड़े उत्साह से
हमदोनों ने रोपा था अपने रिश्ते का बीज
रोज पानी से सींच कर मैंने उसे अंकुरित किया थ
तुम भी तो खुश थे उसके शैशव रूप को देखकर
उसकी हरी-हरी पत्तियां मन को लुभाती थीं
मैं तो अकसर उन पत्तियों को छूकर 
जी लेती थी अपने रिश्ते की गहराई को
वह झाड़ का रूप ले चुका था, लेकिन
चाह थी मेरी कि वह बन जाये बरगद
ताकि भरी दुपहरी में उसकी छांव हमें शीतलता दे
और जब जी चाहे हम-तुम उसकी मजबूती से पा लें सहारा
लेकिन आह!! ये हो ना सका
बरगद का सपना, आंखों से आंसू बन बह गया
समय ने नहीं दिया हमें उस पेड़ को सींचने का मौका 
और तुमने उठा दिया उस पौधे के अस्तित्व पर सवाल
मुझे लगा जैसे जीवन ही शेष नहीं बचा
लेकिन मैंने कसम खाई, नहीं-नही
मैं मरने नहीं दूंगी इस पौधे को
मैं सींचूगी इसे, बरगद बनाऊंगी
इसके फूल और फल को पुष्पित होने का पूरा मौका दूंगी
मैं जुटी रही अपने प्रयासों में
कोई दिन ऐसा नहीं गया जब
मैंने उस पौधे की थाह ना ली हो
जब मैं उसके पास जाती वो
निरीह नजरों से मुझे देखता भी था
उसे तुम्हारी तलाश थी, लेकिन 
उसकी आस नहीं हुई पूरी
पौधा था तो कुछ फल भी आय
लेकिन वो फल भी नहीं बदल सके
इरादा तुम्हारा और विपरीत परिस्थितियों की मार में
अंतत: ठूंठ हो गया हमारे रिश्ते का पौधा
ना तो मेरे आंसू, ना निवेदन बचा सका इस पेड़ क
मैंने कारण बहुत जानने की कोशिश की
आखिर क्यों मृत हुआ यह पेड़
तो ज्ञात हुआ उसकी जड़ हो चुकी थी खोखल
फिर पौधा, पेड़ कैसे बनता?
अब जबकि कुछ भी नहीं है शेष
तुम्हें अचानक क्यों यह सवाल परेशान कर रहा है
कि क्यों मर गया वो पेड़?
अब पेड़ को बचाने के लिए
मेरे पास ना तो ऊर्जा बची ना आस
इसलिए ना पूछो ये सवाल
खुश रहो, क्योंकि मैं ये नहीं भूली कि
हमने साथ बोया था रिश्ते का बीज
भले ही बरगद ना बन पाया वो
लेकिन अफसोस नहीं मुझे इस बात का
जो हुआ वो अच्छे के लिए हुआ होगा
शायद हमारे रास्ते कभी एक ना थे
तभी तो ठूंठ हुए रिश्ते को देख
अब सिहरन भी नहीं होती मुझे...
रजनीश आनंद
01-03_17

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

उम्मीद

जीवन  में क्या मायने हैं उम्मीद के?
यह सवाल मेरे लिए बेमानी था तब तक,
जब तक की मैंने नहीं थामा था दामन इसका
पर ज्योंही मैंने उम्मीद को आगोश में लिया
वह धंस सा गया मेरे सीने में
मैं पिघलती गयी उसके सीने से लगकर
और वह मेरी कमजोरी बनता गया
जकड़ लिया बिलकुल उसने मुझे
फिर शातिर खिलाड़ी की तरह उसने कुतरे मेरे पर
मैं झटपटाई, लेकिन कुछ कर ना पायी
उम्मीद ने तो कैद कर लिया था मुझे पिंजरे में
सपने टूटे, वास्तविकता सामने थी मेरे
उम्मीद का चेहरा क्रूर होता जा रहा था
मैं डरने लगी थी उससे और उसका आगोश
चुभने लगा था मुझे, तब समझ पा रही थी मैं
उम्मीद के टूटने का दर्द, हां अब भी स्मरण है
जब पहली बार टूटी थी उम्मीद
प्रतीत हुआ था चांदनी रात में
छा गया हो अमावस जैसे
बहे थे इतने आंसू कि पोंछने की
इच्छा ना रही थी शेष, लेकिन
अब मैं समझ गयी हूं
उम्मीद है , तो सकारात्मक अनुभूति
किंतु जो इसका गुलाम हुआ इसने
दोजख से बदतर कर दी उसकी जिंदगी
इसलिए प्रण किया है मैंने
उम्मीद से प्रेम तो करूंगी, लेकिन
नहीं बनने दूंगी उसे मेरा भाग्यविधाता
क्योंक नकारात्मकता से मुझे चिढ़ है
जीवन सुंदर है इसे एक उम्मीद पर कुर्बान क्यों करना?
रजनीश आनंद
24-02-17

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

...जिसपर लिखा था सबसे छुपाकर तुम्हारा नाम

रात की तन्हाई में जब भी
मैं किताब को थाम कर बैठती हूं
तुम्हारे आसपास होने का एहसास
करा जाती हैं हवाएं.
कानों में चुपके से कहतीं हैं
सोना नहीं वो आयेगा
सजा ले सपने तू पलकों पे
सुन कर उसकी बात मैंने
लजाकर ज्यों किताब को भींचा
हैरान हो गयी मैं
किताब में धड़क रहा था तुम्हारा दिल
धड़कते दिल की बात समझने की
चाह में मैंने पलटा ज्यों किताब का पन्ना
तुम्हारी प्यारी आवाज कानों में गूंज गयी
जिसने किया मुझसे ये वादा
तुम हर पल साथ खड़े हो मेरे
देह या अदेह, स्वरूप कोई भी हो
तुमने थाम रखा है हाथ मेरा
तुम हर संघर्ष में हो साथ मेरे
पहाड़ से मजबूत इरादों के साथ
तुम्हारे वादे पर यकीन कर मैंने
किताब को चूम लिया
जिसपर लिख रखा था
सबसे छुपाकर मैंने नाम तुम्हारा...
रजनीश आनंद
23-02-17

जीवन की धुरी

घड़ी की सुइयों से जुड़ गया है
कुछ ऐसा नाता कि 
कभी-कभी मालूम होता है
जैसे मैं खुद घड़ी की सुई
बन घूम रही हूं उसकी धुरी पर
सुबह के पांच बजते ही 
घड़ी का अलार्म कानों में 
कहता है बस , अब और नहीं
बिस्तर को नहीं है तुम्हारी जरूरत
उठो कि कई काम है तुम्हें निपटाने
ब्रश को हाथ में पकड़े-पकड़े
मैं कर लेती हूं कई प्लानिंग
घर-बाहर की जिम्मेदारियां निभाते
कभी-कभी महीनों बीत जाते हैं
खुद से बातें किये, सोचे हुए
लेकिन मैं खुश हूं, क्योंकि कायम है
मेरी पहचान, मैंने मिटने नहीं दिया है
उस अस्तित्व को जो मुझे कराता है
एहसास मेरे जिंदा होने का
जिसकी अपनी खुशियां हैं
और अपने फैसले भी, जिन्हें
मैं स्वयं गढ़ती हूं, अपने लिए...
रजनीश आनंद
22-02-17

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

... रात की खामोशी कलरव में बदल गयी

मेरी बोलती रातें अचानक
यूं खामोश हुईं कि उसकी
आह तक नहीं पहुंच पा रही थी मुझतक
मैं तरस गयी थी उसकी एक हां सुनने को
लेकिन उसने इस कदर अलग किया था
खुद को मुझसे कि चाहकर भी
जकड़ ना पायी मैं उसे, खामोशी के साथ
आंखों में सारी रात गयी.
अहले सुबह जब मैंने खोला घर का दरवाजा
चांद को चमकते देखा आंगन में
एक उम्मीद सी जागी, लगा अभी बहुत कुछ है शेष
तभी फागुनी बयार ने हल्के से छुआ मुझे
जैसे दे गया हो किसी का संदेश
लेकिन मन को भरोसा ना हुआ
सुबह का अखबार हाथ में लिये
 मैं चली आयी कमरे में
रोजमर्रा के काम तो निपटाती गयी मैं
लेकिन रात की खामोशी,
मन में वाचाल थी, जो अंदर से तोड़ रही थी मुझे
सुबह की पहली चाय की प्याली को उठा
ज्यों होंठों से लगाया, वो फीकी चाय
करा गयी मुझमें किसी की उपस्थिति
उस उपस्थिति को कस के जकड़ा मैंने
मन को समझाया, इंतजार कर सब ठीक होगा
मंजिल से दूर नहीं तू पास है बिलकुल
इस सकारात्मकता को मन में लिये
भारी कदमों से मैं चली थी आफिस की ओर
तभी मेरे फोन की घंटी कुछ यूं बजी
कि रात की खामोशी कलरव में बदल गयी
मन चहक उठा, नयन बरस गये
क्योंकि मजबूती के साथ खड़ी थी ‘जिंदगी’...

रजनीश आनंद
21-02-17

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

एक द्वंद्व सुबह-शाम

एक द्वंद्व सुबह -शाम,
चला मेरे मन में आज
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है?
आफिस की सीढ़यों को गिनते हुए
जब मैं पहुंची अपने कमरे तक
कई पुरानी यादें मेरीे मानसपटल पर छा गयीं
बचपन से आजतक टूटें कई सपने मेरे
टूटे हुए खिलौनों की कसक
अब भी हैै मन में बाकी
वे खिलौने पूछते हैं मुझसे
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं?
कंप्यूटर के की-बोर्ड को दिनभर खड़खड़ती मैं
खबरों को लिखती -सुधारती मैं
कहीं सदन में मारपीट, कहीं आतंकी हमला
किसी अभिनेत्री का यौन शोषण,
तो किसी नये खिलाड़ी का उद्भव
द्वंद्व फिर उभरा क्या जीवन में
कुछ भी स्थायी नहीं है?
बचपन की दहलीज लांघ
कुछ रिश्ते थे जोड़े मैंने
क्षण भर का साथ निभा पुख्ता कर गये
वे रिश्ते कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है
लोगों ने भी दिये सबूत,विश्वास दिलाया मुझे
लेकिन सारे दावों को नकारती
मैं खड़ी हूं अपने विश्वास के साथ कि
प्रेम स्थायी है और यह हमेशा रहेगा कायम
मेरे जीवन के बाद भी,
मेरे इस विश्वास को प्राप्त है
आशीष शिवालय का भी
खड़ी हूं तुम्हारे सामने मैं इस दावे के साथ
आजीवन कायम रहेगा
प्रेम मेरा और तुम्हारा
इस विश्वास को दिल में समेट
मैं चल पड़ी थी घर की ओर
दरवाजा जो मैंने खटखटाया
मेरी जिंदगी ने बांह पसार कर बुलाया
असमंजस में जो लिपट गयी सीने से उसके
धड़कनों की बेचैनी समझ
उसने पूछा क्या हुआ माँ?
सवाल पर उसके थिरक गयी
मुस्कान मेरे चेहरे पर
विश्वास हुआ मजबूत
जीवन में प्रेम हमेशा होता है स्थायी
तब ही तो वह बिन बोले
समझ लेता है दिल की बात
दिल ने मजबूती से कहा मुझसे
प्रेम मेरा-तुम्हारा सच्चा है, बाकी सब बेमानी...
रजनीश आनंद
18-02-17


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

रेत की तरह फिसलती है जाती है जिंदगी...

अजीब है जिंदगी
मैं जितना सहेजना चाहती हूं
रेत की तरह फिसलती जाती है
मेरी हाथों से
ऐसा नहीं कि मुझे मोहब्बत नहीं जिंदगी से
लेकिन मुझसे हो जाती हैं कुछ गलतियां
भय और आशंका के बीच ऐसा महसूस होता है
मानो जिंदगी अनदेखी कर रही है मेरी
उपेक्षा की भावना घर कर जाती है
मैं जिंदगी को समझा नहीं पाती अपनी बातें
मैं चाहती हूं कि जिंदगी खुशनुमा हो
इस चाह में पकड़ना चाहती हूं
उसे प्रेम से
लेकिन उसे घुटन महसूस होती है
मैं तो बस उसके सीने से लगकर
कहना चाहती थी तुम साथ रहो मेरे
क्योंकि तुम बिन
सूरज की ऊष्मा नहीं होती महसूस
हवा की शीतलता, मन को नहीं देती शीतलता
जिंदगी का हर व्यंजन हो जाता है बेस्वाद
लेकिन शायद मेरा तरीका गलत है
तभी तो जिंदगी रूठ गयी है मुझसे
तो क्या दफन हो जायेंगे मेरे सारे ख्वाब
जो देखे हैं मैंने जिंदगी की आंखों में?
नहीं-नहीं ऐसा ना कर ‘ओ जिंदगी’!
गुजारिश है सुन लो मेरी बात
मैंने जो भी आरोप लगाये तुमपर
वह दुर्भावनावश नहीं हैं
बस इसके मूल में तुमसे प्रेम ही है
हां, लेकिन अब समझ गयी हूं मैं
जिंदगी को संवारने के लिए प्रेम काफी नहीं
कई और चीजें भी हैं, हुनर भी हैं
जो सिखा देगी जिंदगी मुझे...

रजनीश आनंद
18-02-17

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ख्वाहिश


ख्वाहिश तो ना की थी कभी

कि पा लूं तुमको, लेकिन

कुछ यूं आये तुम जीवन मेंं

सारी ख्वाहिशें खारिज हो गयीं

बस एक ही तमन्ना है बाकी

मोहब्बत जो पा लूं तुम्हारी

दामन में सज जायेंगे खुशियों के सितारे

इल्तिजा है तो बस इतनी सी

एक दिन के लिए ही सही,

 बना लो मलिका ए जिगर अपनी

महसूस होगा कुछ यूं मूझे जैसे

जन्नत में बीत गयी जिंदगी मेरी...

रजनीश आनंद
16-02-17

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

साथ हो गंतव्य तक...

जिंदगी की गाड़ी चलती है
जंगल, पहाड़, खेत, नदियां
साथी मुसाफिर गुजरते हैं
कोई अपना सा लगता है
कोई हंसाता है, कोई रुलाता है
कोई छल करता है
कोई  विश्वास करना सिखाता है
लेकिन कोई ऐसा भी होता है
जिसके जाने से सीट खाली सी लगती है
भले ही वह स्टेशन पर
पानी की बोतलें लेने गया हो
लेकिन बेचैन होता है मन
कहता है, कहां रह गये तुम
गाड़ी चल पड़ेगी, नहीं पीना
पानी मुझे, बस तुम आ जाओ
तुम छूट गये, तो
नीरस, निरुद्देश्य
हो जायेगा सफर
तुम हो साथ, तो लंबा सफर थकाता नहीं
बैठे-बैठे अकड़ता नहीं बदन
तुम्हारे कांधे पर सिर रखकर
झपकी ले लेती हूं, तो मिट जाती है थकान
ठंड लगती है, तो तुम
ढंक देते हो चादर मुझे
जिसमें गरमाहट है तुम्हारे प्रेम की
और हां तुम्हारे साथ मूंगफली बहुत भाती है
तो आओ ना साथ जी लें यह सफर
जीवन के अंतिम स्टेशन पर
हम होंगे साथ गंतव्य तक...
रजनीश आनंद
14-02-17

भूख

रसोई के खाली डिब्बों को
टटोलती-खंगालती मैं
कि मिल जाए दो मुट्ठी
अनाज के दाने,ताकि
मिटा सकूं भूख की आग
जो भड़क रही थी तुम्हारे बच्चे की पेट में
हर खाली डिब्बे का ढक्कन खोलते ही
मेरे अंदर भी बन रही थी एक रिक्तता
रिस रहा था एक दर्द अपनी अपूर्णता का
क्या भूख को बस में करना संभव नहीं?
क्या मैं इतनी बेबस हो गयी हूं
भूख के साथ जंग में मैं
हथियार डालना नहीं चाहती थी
मिले ज्योंही अनाज के दाने
मैं भागी उसे सिझाने
उम्मीद के चूल्हे पर
चढ़ा दी जोश की हांड़ी
चावल तो एक मुट्ठी ही मिली थी
लेकिन कुछ कोमल पत्तों को
चावल के साथ उबाल बना लिया था 
भूख शांत करने योग्य खाद्य
जिसकी मदद से तुम्हारे बच्चे की
भूख तो शांत कर दी थी मैंने
लेकिन तुम्हारी ना कर पायी
क्योंकि वो भूख पेट की ना थी
उसे तो चाहिए था मेरा मांसल तन
उसे कोई सरोकार ना था मेरी जद्दोहद से
मेरी ना सुनकर तुम्हारे चेहरे पर
उभरे थे तिरस्कार के भाव
जिसे झेलना बनती जा रही थी मेरी नियति
क्योंकि मैं एक औरत हूं
जिसका कर्तव्य ही है भूख मिटाना
फिर चाहे वो भूख किसी भी प्रकृति की हो
लेकिन बस अब और नहीं
मैं नहीं बनने दूंगी, इसे अपनी नियति
क्योंकि जीने का, हंसने का
हक मैं खोना नहीं चाहती...

रजनीश आनंद
13-02-17