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बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

...जिसपर लिखा था सबसे छुपाकर तुम्हारा नाम

रात की तन्हाई में जब भी
मैं किताब को थाम कर बैठती हूं
तुम्हारे आसपास होने का एहसास
करा जाती हैं हवाएं.
कानों में चुपके से कहतीं हैं
सोना नहीं वो आयेगा
सजा ले सपने तू पलकों पे
सुन कर उसकी बात मैंने
लजाकर ज्यों किताब को भींचा
हैरान हो गयी मैं
किताब में धड़क रहा था तुम्हारा दिल
धड़कते दिल की बात समझने की
चाह में मैंने पलटा ज्यों किताब का पन्ना
तुम्हारी प्यारी आवाज कानों में गूंज गयी
जिसने किया मुझसे ये वादा
तुम हर पल साथ खड़े हो मेरे
देह या अदेह, स्वरूप कोई भी हो
तुमने थाम रखा है हाथ मेरा
तुम हर संघर्ष में हो साथ मेरे
पहाड़ से मजबूत इरादों के साथ
तुम्हारे वादे पर यकीन कर मैंने
किताब को चूम लिया
जिसपर लिख रखा था
सबसे छुपाकर मैंने नाम तुम्हारा...
रजनीश आनंद
23-02-17

जीवन की धुरी

घड़ी की सुइयों से जुड़ गया है
कुछ ऐसा नाता कि 
कभी-कभी मालूम होता है
जैसे मैं खुद घड़ी की सुई
बन घूम रही हूं उसकी धुरी पर
सुबह के पांच बजते ही 
घड़ी का अलार्म कानों में 
कहता है बस , अब और नहीं
बिस्तर को नहीं है तुम्हारी जरूरत
उठो कि कई काम है तुम्हें निपटाने
ब्रश को हाथ में पकड़े-पकड़े
मैं कर लेती हूं कई प्लानिंग
घर-बाहर की जिम्मेदारियां निभाते
कभी-कभी महीनों बीत जाते हैं
खुद से बातें किये, सोचे हुए
लेकिन मैं खुश हूं, क्योंकि कायम है
मेरी पहचान, मैंने मिटने नहीं दिया है
उस अस्तित्व को जो मुझे कराता है
एहसास मेरे जिंदा होने का
जिसकी अपनी खुशियां हैं
और अपने फैसले भी, जिन्हें
मैं स्वयं गढ़ती हूं, अपने लिए...
रजनीश आनंद
22-02-17

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

... रात की खामोशी कलरव में बदल गयी

मेरी बोलती रातें अचानक
यूं खामोश हुईं कि उसकी
आह तक नहीं पहुंच पा रही थी मुझतक
मैं तरस गयी थी उसकी एक हां सुनने को
लेकिन उसने इस कदर अलग किया था
खुद को मुझसे कि चाहकर भी
जकड़ ना पायी मैं उसे, खामोशी के साथ
आंखों में सारी रात गयी.
अहले सुबह जब मैंने खोला घर का दरवाजा
चांद को चमकते देखा आंगन में
एक उम्मीद सी जागी, लगा अभी बहुत कुछ है शेष
तभी फागुनी बयार ने हल्के से छुआ मुझे
जैसे दे गया हो किसी का संदेश
लेकिन मन को भरोसा ना हुआ
सुबह का अखबार हाथ में लिये
 मैं चली आयी कमरे में
रोजमर्रा के काम तो निपटाती गयी मैं
लेकिन रात की खामोशी,
मन में वाचाल थी, जो अंदर से तोड़ रही थी मुझे
सुबह की पहली चाय की प्याली को उठा
ज्यों होंठों से लगाया, वो फीकी चाय
करा गयी मुझमें किसी की उपस्थिति
उस उपस्थिति को कस के जकड़ा मैंने
मन को समझाया, इंतजार कर सब ठीक होगा
मंजिल से दूर नहीं तू पास है बिलकुल
इस सकारात्मकता को मन में लिये
भारी कदमों से मैं चली थी आफिस की ओर
तभी मेरे फोन की घंटी कुछ यूं बजी
कि रात की खामोशी कलरव में बदल गयी
मन चहक उठा, नयन बरस गये
क्योंकि मजबूती के साथ खड़ी थी ‘जिंदगी’...

रजनीश आनंद
21-02-17

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

रेत की तरह फिसलती है जाती है जिंदगी...

अजीब है जिंदगी
मैं जितना सहेजना चाहती हूं
रेत की तरह फिसलती जाती है
मेरी हाथों से
ऐसा नहीं कि मुझे मोहब्बत नहीं जिंदगी से
लेकिन मुझसे हो जाती हैं कुछ गलतियां
भय और आशंका के बीच ऐसा महसूस होता है
मानो जिंदगी अनदेखी कर रही है मेरी
उपेक्षा की भावना घर कर जाती है
मैं जिंदगी को समझा नहीं पाती अपनी बातें
मैं चाहती हूं कि जिंदगी खुशनुमा हो
इस चाह में पकड़ना चाहती हूं
उसे प्रेम से
लेकिन उसे घुटन महसूस होती है
मैं तो बस उसके सीने से लगकर
कहना चाहती थी तुम साथ रहो मेरे
क्योंकि तुम बिन
सूरज की ऊष्मा नहीं होती महसूस
हवा की शीतलता, मन को नहीं देती शीतलता
जिंदगी का हर व्यंजन हो जाता है बेस्वाद
लेकिन शायद मेरा तरीका गलत है
तभी तो जिंदगी रूठ गयी है मुझसे
तो क्या दफन हो जायेंगे मेरे सारे ख्वाब
जो देखे हैं मैंने जिंदगी की आंखों में?
नहीं-नहीं ऐसा ना कर ‘ओ जिंदगी’!
गुजारिश है सुन लो मेरी बात
मैंने जो भी आरोप लगाये तुमपर
वह दुर्भावनावश नहीं हैं
बस इसके मूल में तुमसे प्रेम ही है
हां, लेकिन अब समझ गयी हूं मैं
जिंदगी को संवारने के लिए प्रेम काफी नहीं
कई और चीजें भी हैं, हुनर भी हैं
जो सिखा देगी जिंदगी मुझे...

रजनीश आनंद
18-02-17

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

साथ हो गंतव्य तक...

जिंदगी की गाड़ी चलती है
जंगल, पहाड़, खेत, नदियां
साथी मुसाफिर गुजरते हैं
कोई अपना सा लगता है
कोई हंसाता है, कोई रुलाता है
कोई छल करता है
कोई  विश्वास करना सिखाता है
लेकिन कोई ऐसा भी होता है
जिसके जाने से सीट खाली सी लगती है
भले ही वह स्टेशन पर
पानी की बोतलें लेने गया हो
लेकिन बेचैन होता है मन
कहता है, कहां रह गये तुम
गाड़ी चल पड़ेगी, नहीं पीना
पानी मुझे, बस तुम आ जाओ
तुम छूट गये, तो
नीरस, निरुद्देश्य
हो जायेगा सफर
तुम हो साथ, तो लंबा सफर थकाता नहीं
बैठे-बैठे अकड़ता नहीं बदन
तुम्हारे कांधे पर सिर रखकर
झपकी ले लेती हूं, तो मिट जाती है थकान
ठंड लगती है, तो तुम
ढंक देते हो चादर मुझे
जिसमें गरमाहट है तुम्हारे प्रेम की
और हां तुम्हारे साथ मूंगफली बहुत भाती है
तो आओ ना साथ जी लें यह सफर
जीवन के अंतिम स्टेशन पर
हम होंगे साथ गंतव्य तक...
रजनीश आनंद
14-02-17

भूख

रसोई के खाली डिब्बों को
टटोलती-खंगालती मैं
कि मिल जाए दो मुट्ठी
अनाज के दाने,ताकि
मिटा सकूं भूख की आग
जो भड़क रही थी तुम्हारे बच्चे की पेट में
हर खाली डिब्बे का ढक्कन खोलते ही
मेरे अंदर भी बन रही थी एक रिक्तता
रिस रहा था एक दर्द अपनी अपूर्णता का
क्या भूख को बस में करना संभव नहीं?
क्या मैं इतनी बेबस हो गयी हूं
भूख के साथ जंग में मैं
हथियार डालना नहीं चाहती थी
मिले ज्योंही अनाज के दाने
मैं भागी उसे सिझाने
उम्मीद के चूल्हे पर
चढ़ा दी जोश की हांड़ी
चावल तो एक मुट्ठी ही मिली थी
लेकिन कुछ कोमल पत्तों को
चावल के साथ उबाल बना लिया था 
भूख शांत करने योग्य खाद्य
जिसकी मदद से तुम्हारे बच्चे की
भूख तो शांत कर दी थी मैंने
लेकिन तुम्हारी ना कर पायी
क्योंकि वो भूख पेट की ना थी
उसे तो चाहिए था मेरा मांसल तन
उसे कोई सरोकार ना था मेरी जद्दोहद से
मेरी ना सुनकर तुम्हारे चेहरे पर
उभरे थे तिरस्कार के भाव
जिसे झेलना बनती जा रही थी मेरी नियति
क्योंकि मैं एक औरत हूं
जिसका कर्तव्य ही है भूख मिटाना
फिर चाहे वो भूख किसी भी प्रकृति की हो
लेकिन बस अब और नहीं
मैं नहीं बनने दूंगी, इसे अपनी नियति
क्योंकि जीने का, हंसने का
हक मैं खोना नहीं चाहती...

रजनीश आनंद
13-02-17

पर ना भूलना मेरे प्रेम को...

कोई मजबूरी नहीं तुम्हारा प्रेम
जिसे छुपाती फिरूं मैं
यह गर्व का विषय है
जो स्पष्ट दिखता है
मेरे चेहरे पर
जब पुकारते हो तुम मुझे
तो दमक उठता है चेहरा मेरा
जैसे चांद के आने से इठलाती है रात
तुम्हारी महक में इस कदर सराबोर हूं
जैसे उपवन में मंडराती कोई तितली
मेरे नयनों में सजते हैं सपने तब
जब शिद्दत से कहते हो तुम
हां, मुझे तुमसे प्रेम है,
मेरे सीने में हमेशा जीवित रहेगा यह प्रेम
बस इतनी सी है गुजारिश
चाहे तो भूल जाना मुझे
पर ना भूलना मेरे प्रेम को,
इसकी खुशबू को
ताकि मुझे हमेशा महसूस हो
तुम आसपास हो मेरे...

रजनीश आनंद
13-02-17

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

एक उम्मीद है...


खामोश सी जिंदगी में
एक उम्मीद है इस बात की
अभी कोई अपना सा आकर
पूछेगा हाल मेरा, थाम कर हाथ मेरा
कहेगा चलो कुछ देर जी लें हम-तुम
शहर की सड़कों पर चलें हम बेपरवाह
चेहरे पर बिखरते बालों को
समेटकर कहे, वो खुले बालों में
सुंदर दिखती हो तुम.
किसी महंगे से मॉल के शोकेस में लगी
सुंदर साड़ी को दिखाकर उसे
मैं कहूं उससे ये वाली चाहिए मुझे
और वो मुस्कुरा कहे, हां जरूर
मैं लेकर दूंगा तुम्हें
उसकी यही बात सुकून दे जायेगी
साड़ी तो बस बहाना है
उसके दिल में अपने लिए
जगह तलाशना चाहती हूं मैं...

रजनीश आनंद
04-02-17

बुधवार, 25 जनवरी 2017

...क्योंकि मुझे खुद से हो गया प्रेम है


सुबह -सुबह उठकर कभी महसूसा नहीं
ताजी हवा को, कि सोचा नहीं
इतना रोमांचित करती होगी सुबह
भागमभाग की जिंदगी
घर-आफिस-बच्चे
कहां वक्त, यह सोचने की
कि ताजी हवा गुदगुदाती भी है
मैं तो उलझी रही
झाड़ू-पोंछा, रोटी, प्रेशरकुकर और
रोज की ब्रेकिंग खबरों में
नाश्ते की भी फुरसत नहीं
गर्म दाल-रोटी को फूंक-फूंककर कभी खाती
कभी छोड़ भागती मैं
पर उस दिन, हां, मुझे अच्छी तरह याद है
जब तुम शामिल हुए मेरी दिनचर्या में
एक्ट्रावर्क की तरह नहीं,
स्पेशल असाइनमेंट बनकर
जिसने कराई मेरी खुद से पहचान
अब तो खुद से भी बातें कर लेती हूं
रातें अकेली नहीं होती, क्योंकि कागज पर तुम्हें उकेरती हूं
सुबह जब आंखें खोलती हूं, खुद से कह लेती हूं गुड मार्निंग
क्योंकि जब से तुम आये, मुझे खुद से हो गया प्रेम है...

रजनीश आनंद
25-01-17

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

रातें खामोश नहीं होती, बोलती हैं...

रातें खामोश नहीं होती, बोलती हैं
अकसर जब बैठ कर अकेली
मैं इससे बातें करती हूं.
स्याह अंधेरा कहता है
खोल दो जुल्फों को अपनी
कि मैं इनमें उलझना चाहता हूं
लेकिन रूको, कुछ महसूस तो करो हिज्र को
देखो तो ये नीला आकाश
चांद के बिना भी सुंदर दिखता है
जिस रोज चांदनी आकाश की बांहों में होगी
वो रात तो सुकून देगी ही
तब तक तुम मेरे बांहों के घेरे को महसूस करो
और सो जाओ सुकून की नींद
क्योंकि रातें खामोश नहीं होती
वो बहुत कुछ कहती हैं
जरा सुनो तो, आंखें बंद करके...

रजनीश आनंद
25-01-16

सोमवार, 23 जनवरी 2017

...और कसें हम-तुम

वसंत की दस्तक के साथ ही
इठलाती ठंड कुछ सहम सी गयी है
सर्द रातों में अलाव के सहारे
जीते लोगों ने ली है राहत की सांस
ऋतुराज के आगोश में
आम के पेड़ों पर महक उठी मंजरी है
बगिया में एक साथ खिल उठे कई फूल हैं
ऐसे खुशनुमा माहौल में मेरा मन आतुर है
तुम संग कुछ पल जीने को
जब हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ
मैं कह सकूं, तुम साध्य मेरे जीवन के
हां, अब नहीं कोई चाह शेष है.
देखो ना वसंत को भी है ज्ञात
बात मेरे मन की, तभी तो
उसने हवाओं से कह दिया है
जो गुजरे मेरे नजदीक से
तो पहले कर आयें तुम्हारा स्पर्श
तुम्हारी खुशबू से सराबोर हूं मैं
इंतजार है मुझे उस पल का जब
वसंत के सानिध्य में
गूंजे हमारी खिलखिलाहट
और कसें हम-तुम
प्रेम आलिंगन में
क्योंकि मुझे तुमसे प्रेम है
अथाह प्रेम...बस प्रेम...
रजनीश आनंद
24-01-17

मात्र देह होने का एहसास...

मैं औरत हूं, लेकिन
बार-बार होता है एहसास
मात्र देह होने का
आईने के सामने खड़े होकर
जब भी टटोला है खुद को
साफ उभर आयीं, वो वहशी नजरें
जो बचपन से आज तक
मुझे लील जाने को आतुर थीं
जिन्होंने बार-बार कराया मुझे
मात्र देह होने का एहसास
घर के परिचित, जो मां के सामने
पुचकारते थे मुझे, वही
मां के जाते ही, खूंखार लगने लगते थे
उनकी तेज होतीं सांसें, आज भी
डरा जातीं हैं मुझे
मां के जाते ही वे जकड़ना चाहते थे मुझे
अपनी वासना के जाल में
मैं भागकर छुप जाती थी मां के आंचल में
ऐसी ललचाती नजरों से कभी नहीं बच पायी मैं
घर-बाहर हर जगह मौजूद हैं ऐसी नजरें
तभी तो हर शाम जब आफिस से घर आती हूं
ऐसी घूरती, निगलने को आतुर नजरों से भिड़कर
औरत नहीं मात्र देह होने का
एहसास घर कर जाता है मन में...

रजनीश आनंद
23-01-17

शनिवार, 21 जनवरी 2017

तुम्हारी महक...

मेरी जिंदगी में इस कदर शामिल हुआ तू
ना जाने कब मेरे लैपटॉप से बॉल पेन तक में
बिखर गयी तुम्हारी महक .
यूं तो किसी को मैं ऐसे ही नहीं देती यह हक
पर ना जानें कैसे मेरे मन ने मुझसे
पूछे बिना ही तुम्हें दे दिया यह अधिकार
मैंने मन का विरोध भी नहीं किया
क्योंकि एक सहमति, एक खुशी सी थी मस्तिष्क में
मन-मस्तिष्क ने स्वीकारा है तुम्हें संपूर्णता के साथ
तभी तो भोर होती है तुम्हारी मुस्कान के साथ
और रात तुम्हारे अपनेपन के साथ
किशोरवय का आकर्षण नहीं ये
सोची-समझी स्थिति है, ठहराव के साथ
प्रेम तुम्हारा, प्रेरणा मेरी जिंदगी का
जिसके दम पर पाना चाहती हूं
मैं अपने हिस्से का आकाश
और उस आकाश पर लिख देना चाहती हूं
तुम्हारा नाम, ताकि आजीवन बिखरी रहे
मेरे जीवन के हर कोने में तुम्हारी महक...

रजनीश आनंद
21-01-17

सोमवार, 16 जनवरी 2017

रिक्तता का बादल

आज अकेली बैठ ज्यों
अनायास मैंने पलटी
जिंदगी की किताब
एक रिक्तता का बोध
कलेजे को कस गया
चीख निकलने को हुई
लेकिन मजबूरियों ने
चीख को कंठ में ही रोक लिया
अश्रु छलक गये, लेकिन
फिर मन में आयी एक बात
जीवन में हर निर्णय सही तो नहीं होते
कुछ सही, कुछ गलत होते हैं
फिर क्यों इतना शोक, इतना मातम
इस निर्णय का दोष किसी के सिर नहीं
कोई दोषी नहीं, मैं उस निर्णय के लिए
उपयुक्त पात्र नहीं थी,
पर कोई अफसोस नहीं मुझे
मैंने सही समझकर निर्णय लिया था
जो मिला, जो खोया
सब जिंदगी के सफर के सहयात्री थे
जिंदगी में प्रयोगधर्मिता है जरूरी
सो छलके आंसुओं को सहेजा मैंने
सोचा जिंदगी के प्रयोग में
कुछ रिश्ते वाष्प बनते हैं
तो कुछ ठोस भी शेष  रहते हैं
जिंदगी के फ्यूजन में
हमेशा सही धुन नहीं बजता
मन को मजबूत कर ज्यों
मैंने आगे के पृष्ठों को देखा
तो जिंदगी का एक शानदार समागम
मानो मेरी ही प्रतीक्षा में था खड़ा
रिक्तता का बादल
अब छंटने लगा था मानो
मैंने खुलकर ली सांस, तो
प्रतीत हुआ अनंत है आकाश ...

रजनीश आनंद
16-01-17

सोमवार, 9 जनवरी 2017

क्षमाप्रार्थी हूं मैत्रेयी पुष्पा मैम, लेकिन मैं आपसे असहमत हूं


क्षमायाचना. जी हां मैं यह लिखते वक्त क्षमा पहले चाहती हूं. कारण यह है कि मैं जिनके विचारों से असहमति जता रही हूं वह मेरे लिए परम श्रद्धेय हैं और उनके अनादर का विचार सपने में भी मेरे मन में नहीं आ सकता. मैं बात कर रही हूं परम आदरणीय मैत्रेयी पुष्पा जी की. कल मैंने उनका एक इंटरव्यू शब्दांकन डॉट कॉम पर पढ़ा. एक शानदार इंटरव्यू है, लेकिन उसे पढ़ते वक्त एक जगह पर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उनसे असहमत हूं, तो मैं सिर्फ असहमति जता रही हूं और कुछ नहीं.

इस इंटरव्यू में मैत्रयी पुष्पा ने कहा है- सेक्स प्रेम की मृत्यु है. यह मैत्रयी मैम के निजी विचार हो सकते हैं, लेकिन इसे शाश्वत सत्य नहीं माना जा सकता. कोई इंसान, जो प्रेम में हो वो सेक्स तब करता है, जब उसे यह पक्का यकीन हो जाता है कि हां यही वह व्यक्ति है जिससे मुझे अथाह प्रेम है. ऐसे में सेक्स उनके प्रेम को और मजबूती देता है ना कि मृत्यु का कारण बनता है. हां, यहां मैं बलात्‌ सेक्स की बात नहीं कर रही, बल्कि सहमति से बनाये गये शारीरिक संबंध की बात कर रही हूं. जहां बलात्‌ सेक्स होता है वहां मात्र शारीरिक भूख होती है, प्रेम नहीं होता है. प्रेम तो जबरन किया जाने वाला मनोभाव ही नहीं है. यह तो किसी को स्वीकार्य करने की आदर्श स्थिति है. जब इंसान तमाम अहंकार, मेरा-तुम्हारा और स्वार्थ जैसे दुर्गुणों को त्याग कर एक होते हैं. जैसा राधा-कृष्ण का प्रेम. जो तमाम बंधनों और परंपराओं के मुक्त होने के बावजूद आज भी आदर्श है.  

सेक्स तो प्रेम की जरूरत है, महज आत्मिक प्रेम एक टीस पैदा करता है, जबकि शारीरिक प्रेम उस टीस का इलाज है. अपने प्रेमी/प्रेमिका के आलिंगन में जो सुख है, वह सुख उसे दूर से देखने मात्र से मिल पाता है क्या? क्या प्रेमपूर्ण एक आलिंगन, एक चुंबन प्रेम को और गहरा और ऊर्जावान नहीं बनाता है? एक शरीर से मोह होना स्वाभाविक है, क्योंकि वह एक इंसान की पहचान है, जिससे हमें प्रेम होता है, फिर उस शरीर का प्रेम कैसे मृत्यु तुल्य हो जायेगा? हां, मैं उनकी इस बात से सौ फीसदी सहमत हूं कि शादी सेक्स करने का लाइसेंस देता है, लेकिन शादी में हुए सेक्स में प्रेम होता है या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है. हमारे देश में आज भी सामाजिक बंधनों में बंधे लोग अपने प्रेम को उस तरह से नहीं स्वीकार कर पाते, जिस तरह से वे अपने प्रेम को जीते हैं, क्योंकि ऐसा करने से उनके प्रेम को नाजाजय संबंध का टैग दे दिया जाता है.

बस यही कारण है कि लोग अपने प्रेम की कब्र खुद खोद लेते हैं और उसका अंत हो जाता है. चलिए यह मान लिया जाये कि समाज के संचालन हेतु नियम कायदे होते हैं, मर्यादा होती है, तो क्या प्रेम की कोई मर्यादा नहीं है. प्रेम में इंसान अपने साथी का कभी अपमान नहीं करता, ना ही उसका बुरा चाहता है. प्रेम के लिए पति-पत्नी का टैग होना जरूरी नहीं है, यह तो एक सुखद अनुभूति है, जिसके लिए विशाल हृदय चाहिए. हां यह बात सोलह आने सच है कि सेक्स प्रेम की गारंटी नहीं है, लेकिन यह बात भी बिलकुल सही नहीं है कि प्रेम में अगर सेक्स हो तो प्रेम की मृत्यु हो जाती है.



रजनीश आनंद
10-01-17

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

अब इच्छाओं पर नहीं लगेगा ताला

क्यों मेरी हर इच्छा पर
ताला लगा दिया जाता है?
और चाबी नहीं दी जाती मुझे
मरती इच्छाओं के बंद कमरे में
घुटन सी महसूस होती है
पसीने से तर-बतर शरीर
लेकिन फिर भी मैं
जद्दोजहद करती हूं
कोई झरोखा मिल जाये
जहां से झांकू मैं
अपनी इच्छाओं का बालपन निहारूं
उसकी अल्हड़ जवानी का लुत्फ उठाऊं
लेकिन नहीं, मैंने तो हमेशा
अपनी इच्छाओं को अर्थीं पर देखा
हां, उसे कांधा देने समाज के कई ठेकेदार आ जाते थे
लेकिन बस अब और नहीं
तय कर लिया है मैंने
तोड़ दूंगी हर दीवार
नहीं सजने दूंगी
अपनी इच्छाओं की अर्थी
औरत हूं मैं, सृजन कर सकती हूं
तो जन्म दूंगी अपनी
इच्छाओं के मधुर जीवन को
मासूम बालपन से गंभीर वृद्धावस्था
तक संवारूंगी उसे, क्योंकि अब कोई
ताला नहीं लगा सकेगा मेरी इच्छाओं पर...

रजनीश आनंद
05-01-17

बुधवार, 4 जनवरी 2017

...तो मिल जाये थोड़ी सी नीरवता

सुनो प्रिये, यह अधीर मन
कुछ कहना चाहता है तुमसे
जानती हूं मैं, तुम तक नहीं पहुंचती
मेरी आवाज, किंतु मानता नहीं यह मन
यह विश्वास भी है कि
ये हवाएं तुम्हारे कानों में
फुसफुसा कर दे देंगी मेरा संदेश
औरत हूं, सिखाया गया है धीरज धरना
लेकिन जब से हृदय में वास हुआ तुम्हारा
एक आग सी जलती है सीने में
जिसकी जलन नहीं होती कम
ठंडी हवा का रुख किया
बारिश में भींगकर भी देखा
लेकिन हृदय को नहीं मिला सुकून
चाह होती है, तुम छिपा लो अपना
मुखमंडल मेरे हृदय के करीब
और सुनो इसके मन की बात,
तो मिल जाये थोड़ी सी नीरवता
चाह होती है, तुम्हें सीने से लगाये
मैं लिख दूं अपना नाम तुम्हारी पीठ पर
और तुम छा जाओ मुझ पर
पाकर मेरे अधरों  का स्पर्श
तुम्हें मिले तृप्ति और मुझे निस्तब्धता
रजनीश आनंद
01-04-17

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

...यह समझो औरतों और चुप रहो

नये वर्ष के स्वागत में लोग जुटे हों, चारों ओर खुशी का वातावरण हो, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए 1500 पुलिसकर्मी भी तैनात हों, तभी कुछ लोग महिलाओं के साथ बदसलूकी करने लगे, उनके ना चाहते हुए भी उनके शरीर को हाथ लगाने लगे और महिलाओं की स्थिति यह हो जाये कि वे वहां से भागने लिए मजबूर हो जायें और पुलिस वालों से मदद की गुहार लगायें, लेकिन शोहद्दे अपनी हरकतों से बाज ना आयें, तो इस पूरे घटनाक्रम में दोष किसका कहा जाये? नि:संदेह महिलाओं का भाई! अरे नववर्ष का स्वागत करने का अधिकार पुरुषों को है बेकार में महिलाएं उतावली हो जाती हैं. जश्न तो पुरुष मनाते हैं, महिलाएं तो उनके जश्न मनाने का जरिया हैं, तभी तो जब जश्न के दौरान महिलाएं सहज उपलब्ध हो गयीं, तो उन्होंने एक युवती के कपड़े तक उतार दिये.

अरे लड़कियां तो बिन कपड़ों के ही अच्छी लगती हैं, वो तो अपनी बहू-बेटियों को लोग पूरे कपड़े में, या यूं कहें कि बुर्के में देखना पसंद करते हैं. बेंगलुरू में महिलाओं के साथ जो हुआ, वह बिलकुल सही तो है, जहां पेट्रोल होगा वहां आग के आने से आग तो लगेगी ही, भड़केगी ही. अरे भाई महिलाओं को तो सगे भाइयों और पिता के साथ भी कमरे में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इससे शैतान जाग उठता है, तो फिर इन लड़कों का तो उन युवतियों से कोई संबंध भी नहीं था, फिर ये सब तो होना ही था.

सही है. जिनके दिमाग में कबाड़ भरा हो उसके लिए पूरे कपड़े में औरत हो या बिना कपड़ों के क्या फर्क पड़ता है. उसकी नजर तो देह पर होती है, वह औरत को इंसान नहीं वस्तु समझता है, जिसे उसे भोगना है. सही है भोगने का सुख तो सिर्फ उसे चाहिए चाहे औरत की मरजी हो या ना हो. क्योंकि कामेच्छा तो सिर्फ पुरुषों के अंदर होती है, औरत तो बेजान है, संवेदनाशून्य. उसकी कोई इच्छा नहीं, कोई मरजी नहीं.

 अरे यहां तो अपना पति इच्छा-अनिच्छा की परवाह नहीं करता तो भीड़ का क्या है? सही तो किया, भीड़ ने. बिना भाई-बाप के मॉडर्न ड्रेस पहनकर महिलाएं नये वर्ष का स्वागत करेंगी, तो यह सब तो होगा ही. रोने-चिल्लाने की कोई जरूरत नहीं लड़कियों, चुप रहो, सबकुछ झेल जाओ. सड़क पर कोई हाथ लगाता है, तुम्हारे प्राइवेट पार्ट छूता है, तो क्या? छूने दो, तुम वस्तु हो, लोग छू-छा कर तो देखेंगे ही, वे इंसान हैं. चुप रहो तुम. सड़क पर, घर में जो चाहे जहां चाहे, तुम्हें हाथ लगा सकता है. लेकिन अगर तुम अपनी इच्छा के साथ किसी के साथ रहो, अगर वह तुम्हारा पति नहीं, तो तुम चरित्रहीन हो, यह जानो, चरित्रवान तो वो हैं, जो तुम्हारी मरजी जानें बिना तुम्हारे शरीर को छूते हैं. यह समझो औरतों और चुप रहो, क्योंकि बोलने पर इज्जत तुम्हारी जाती है, पुरुषों की नहीं. पूरे समाज की इज्जत का टोकरा तुम्हारे सिर जो लदा है.

रजनीश आनंद
04-01-17

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

तब सिर्फ दैहिक नहीं आत्मिक भी हो जायेगा प्रेम...

मात्र अदेह कल्पना नहीं
तुम तो मेरा साकार प्रेम हो
नहीं-नहीं यह मेरा भ्रम नहीं
तुम सचमुच मेरे सीने से लगे हो
और मैंने तुम्हारे बालों को
अपनी अंगुलियां से सहलाया भी है
तुम्हारी आंखों की शरारत
उनकी प्यास, उनका प्यार
सब देखा है मैंने
उनकी ख्वाहिशों को
महसूस किया है, साकार स्वरूप में
लेकिन क्या इतनी सी है
हमारे प्रेम की ख्वाहिशें
नहीं बिलकुल नहीं
हम तो चाहते हैं
उम्र भर साथ चलना
ऐसा हो हमारा साथ
कि बिन बोले समझ जायें
एक दूजे की बात
और जब धुंधली हो जाये नजर मेरी
तब पढ़ देना तुम
मेरे लिए अखबार
और मैं तुम्हें मदद करूंगी
अपनी कांपती हाथों से
पहनने में स्वेटर,टोपी और मफलर
तब ना कहना तुम
टोपी ना पहनाओ प्रिये
अच्छा नहीं लगता
साथ बैठ चाय पीयें हम
और चाय की चुस्कियों के साथ
तुम बताना मुझे देश-विदेश की बातें
और मैं तुम्हें एकटक ताकती रहूंगी
तब, जब सिर्फ दैहिक नहीं
आत्मिक भी हो जायेगा हमारा प्रेम...
रजनीश आनंद
31-12-16 

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

मेरे शहर में तुम...

क्या कभी मेरे शहर की धरती को
चूम सकते हैं तुम्हारे कदम?
यह सोच उत्पन्न होते ही
सिहरन बन दौड़ जाता है
मेरे नस-नस में
आह!! काश
यह सुख मेरे शहर को नसीब हो
तुम्हारा स्पर्श पाते ही
मेरी हरी-भरी धरती
झूम उठेगी मानो
नव ब्याहता हो कोई
चाहती हूं, थाम कर
हाथ तुम्हारा घूम लूं
थोड़ा अपने शहर की गलियों में
कुछ पहचान हो जाये
मेरे शहर से तुम्हारी
ताकि जब जाओ तुम
मुझे छोड़ तन्हा
मेरे शहर की गलियां बन जाये
तुम्हारी बाहें और मैं
सिमटकर इनमें
सिसक लूं,झगड़ लूं
ताकि तुम्हारे होने का अहसास
रहे हमेशा मेरे शहर की गलियों में...

रजनीश आनंद
29-12-16