ब्लॉग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ब्लॉग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 8 जुलाई 2019

प्राथमिकता बदलो

मैं बेचैन रहती हूं तबतक
जबतक,  नहीं लिख लेती
कोई आलेख, कविता
डरती हूं, कलम निकालते
अकसर मैंने पाया जब नहीं होता
सृजन कोई मेरी कलम से
वह आंखें तरेरती है
उलाहना भी देती है
मैं चाहे जितनी से
बंद कर लूं अपने कान
स्पष्ट आवाज आती है
मेरी डायरी के साथ चिपकी
मेरी कलम नजर रखती है
मेरे उन पलों पर,  जब मैं
करती हूं कोताही, बनाती हूं बहाने
चौबीस घंटे तो सबके लिए है,
गालिब शेक्सपियर,  महादेवी
इन्हीं घंटों में पनपे, उन्होंने तो नहीं गिने घंटे
रचना के लिए समय, नहीं समर्पण चाहिए
कलम कहती है होकर वाचाल
प्राथमिकता बदलो, यह दुनिया बहुत हसीन है...

रजनीश आनंद

बुधवार, 22 मार्च 2017

कविता

हर रात जब
मैं अकेली होती हूं
लाख मना करती हूं
फिर भी दबे पांव
चली आती है तुम्हारी याद
मैं कहती हूं उससे
जाओ ना सताओ
जब प्रिये नहीं आते
तो तू क्यों चली आती है
मुझे मजबूर करने
आंखों में रात बिताने को
क्यों मुझे बेबस करती हो
लिखने के लिए एक कविता
दिल से मजबूर मैं
लिखना चाहती हूं मन की हर बात
हर तड़प, हर सिहरन
लेकिन जैसी ही मैं
कलम पकड़कर बैठती हूं
यादें, लिखकर बैठ जाती हैं नाम तुम्हारा
और मैं कागज पर अंकित उस
नाम को निहारती रह जाती हूं
दिल कहता है
इससे अच्छी कविता क्या होगी...
रजनीश आनंद
22-03-17

योगी के कारण हुआ मेरा मोहभंग

मोहभंग होना दुखद स्थिति है,लेकिन मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मेरा मोहभंग हुआ है. हां भाजपा से मेरा मोहभंग हुआ है. मुझे यह कहने में न कोई शर्म है संकोच कि मैंने  भाजपा का अबतक सही नीतियों पर समर्थन किया है अटल बिहारी वाजपेयी मेरे प्रिय नेता थे , हैं और हमेशा रहेंगे. जितने दिन भी वे सत्ता में रहे देश को विकास को ओर ले जाने का प्रयास किया. बात चाहे अर्थव्यवस्था की हो या विदेश नीति की उन्होंने शानदार काम किया. जबकि वे गठबंधन की सरकार चला रहे थे. लेकिन आज भाजपा का जो चेहरा उभरकर सामने आया है, मैं उसके समर्थन में ना पहले थी, ना भविष्य में कभी रहूंगी.
हां मैं बात कर रही हूं उत्तरप्रदेश की, जहां योगी आदित्यनाथ सीएम बने हैं उनका चयन कहीं से भी शुभ नहीं है.और यह साबित करता है कि मोदी जी विकास का जो दावा करते वो खोखला है. प्रचंंड बहुमत के बाद योगी आदित्यनाथ का चयन किस मजबूरी के कारण मोदी जी ने किया है. कहा जा रहा है कि योगी मोदी की पसंद नहीं, तो क्या यह माना जाये कि संघ पीएम से अधिक शक्तिशाली है?
एक ऐसा व्यक्ति जो नफरत फैलाता हो, जिसके पास कोई विजन ना हो ,वो प्रदेश को किस ओर ले जायेगा? कानून व्यवस्था का प्रदेश में क्या होगा भगवा जाने, जिस मठ के लोग बंदूक तान रहते हैं अब उनकी सरकार है. महिलाओं पर कितनी बंदिश लगेगी, पता नहीं.  मजनू स्क्वायड और गुटखा पर प्रतिबंध से कुछ नहीं होगा.प्रदेश का विकास होता है शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार और बुनियादी जरूरतों की उपलब्धता से. राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि योगी जी भविष्य के नेता हैं, जो मोदी जी को रिप्लेस करेंगे. तो ऐसे में क्या होगा देश का , देश की छवि का. विदेशनीति का. मोदी जी तो दावा करते हैं कि भारत अगले कुछ वर्षों में विश्व की महानशक्ति बनेगा, लेकिन योगी जी के आने के बाद तो यह कैसे होगा समझ नहीं आ रहा है.

रजनीश आनंद
22-03-17

मंगलवार, 21 मार्च 2017

शुभ संकेत

एक जुगनू आज
मेरे बिस्तर पर
कुछ यूं मंडराया
मानों दे रहा हो
कोई शुभ संकेत
मैंने भी आस का
दामन थाम लिया
सुना था कहीं
शुभ होता है यूं
जुगनुओं का मंडराना
जीवन के संघर्षपथ पर
संकल्पशक्ति के साथ
जब मिलाप होता है
ऐसे शुभसंकेतों का
तो इससे जन्मी ऊष्मा
इंसान को प्रेरित करती है
जूझने के लिए
जुगनू की रोशनी
कब बन गयी सूरज की
मुझे पता भी ना चला
लेकिन मैंने देखा सूरज को
मेरे लिए जलते हुए...
रजनीश आनंद
21-03-17

गुरुवार, 16 मार्च 2017

आज की रात...

काश, आज की रात
तुम आ जाते सपनों में मेरे
तो मैं जी लेती मनमाफिक जिंदगी
कभी वसंती हवा बन इठलाती
तो कभी बरखा बन बरस जाती
सीने पर तुम्हारे
छोटे से उस पल को ऐसे जीती
मानों जी ली पूरी जिंदगी
गीत सुनाती तुम्हें प्रेम के
और कहानी मधुर मिलन के
करती सोलह श्रृंगार और
तुम्हें रिझाती बन कर रति
कभी सीने से लगकर तुम्हें
सुनाती पीड़ा अकेली रातों की
आखों से जो अश्रु बहता
वो साक्ष्य बनता मेरी तड़प का
सांसें मेरी कहती तुमसे
बांधकर रखना मेरा लक्ष्य नहीं
हां, मैं देना चाहती हूं तुम्हें
अधरों से अपने प्रेम निशानी
आज की रात जो तुम आ जाते...
रजनीश आनंद
16-03-17

शनिवार, 11 मार्च 2017

फिशपॉट

मेरे कमरे के कोने में
पड़ा है एक फिशपॉट
चार-पांच मछलियां
हमेशा तैरती दिखतीं हैं
कमरे होने वाली हर
हलचल से दूर पानी में गोते खातीं हुईं
बिलकुल वैसे ही जैसे
मेरी दुनिया सिमटी है तुम्हारी बांहों मेंं
जब तुम अपनी बांहों को खोलकर
कहते हो आओ प्रिये
और समेट लेते हो मुझे
तो मैं कहना चाहती हूं
बहुत कुछ अपने मन की
लेकिन जुबान साथ नहीं देते
हलक तक आकर रह जातीं हैं बातें
हां, तुम चाहो तो पढ़ लो मेरी आंखें
इनमें अंकित हैं मेरे मन की बातें
तुम बिन कितनी रातें मैंने
आंखों में बिताई, कितने सपने संजोए
इसपर साफ लिखा है
तुम्हारे स्पर्श की नरमाई,सिहरन और
जादुई बातें हैं मेरे जीवन का फिशपॉट
जिनमें डूबकर जीना चाहती हूं मैं...
रजनीश आनंद
11-03-17

मंगलवार, 7 मार्च 2017

तुम्हारे नाम की गूंज...

हिज्र की रातों में
आंखें मूंदें मैं लेना चाहती हूं तुम्हारा नाम
एक बार नहीं, कई बार
ताकि महसूस कर सकूं तुम्हें
मैं जितनी बार पुकारती हूं तुम्हारा नाम
तन-बदन में मौजूद सिहरन
और तड़प दे जाती है सुकून
मैं खोना चाहती हूं
तुम्हारे नाम की गूंज में
ताकि फिजाओं में गूंजें
हमारे मिलन की ध्वनि
और तुम आकर मेरे
कानों में फुसफुसा जाओ
तुम मेरी, हां सिर्फ मेरी हो
फिर कुछ और सुनने की
चाह शेष रह जायेगी क्या भला?
रजनीश आनंद
07-03-17



शनिवार, 4 मार्च 2017

मौसम हुआ रूमानी...

अचानक मौसम कुछ यूं हुआ रूमानी
जैसे कभी-कभी तुम हो जाते हो
ऐसे में बादलों को बरसता देख जी किया
मैं सिमट जाऊं आकर तुम्हारी बांहों में
अदेह स्वरूप में ही सही, मैं रहना चाहती हूं
गिरफ्त में तुम्हारी बांहों के हमेशा
तभी तो छतरी को खोल मैं निकल गयी थी सड़क पर
तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने, कुछ देर जीने
छतरी के घेरे ने कराया तुम्हारे होने का एहसास
मैंने उसे ऐसे थामा जैसे थामना चाहती हूं तुम्हें
आज तुमसे बात करने की बहुत थी चाह
इसलिए मैंने खूब कही अपने मन की
जानते हो मैंने सवाल खुद किया और
तुम्हारी तरफ से जवाब भी दे दिया
ख्यालों में ही सही तुम सुनते रहे मुझे
यूं तो मैं जानती हूं अपने बारे में
हर छोटी-बड़ी बात लेकिन
जब तुम कहते हो उन्हें
अहसास कराते हो मुझे की मैंं खास हूं
तो सुकून मिलता है. जैसे अभी मिल रहा है
धरती से टकराती इन बारिश की बूंदों को देखकर
एहसास हो रहा है मानो मिल रहे हों हम-तुम...
रजनीश आनंद
04-03-17

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

मुट्ठी में खुशी...

जिंदगी की जद्दोजहद ने
छिन ली थी मेरे होंठों की हंसी,
जो मुस्कान दिखती थी
वो दरअसल झूठ का पुलिंदा थी
खोखली हंसी, जिसकी गूंज में
साफ सुनाई पड़ जाती थीं मेरी सिसकियां
मेरा दिल हमेशा कहता था मुझसे
सुन ले तू कभी मेरी भी, तो
आज उसकी बात का असर
दिख गया मुझपर और
मैंने जिंदगी के दामन से
एक चीज चुराकर
कस कर जकड़ लिया है मुट्ठी में
सोचा है अब कभी नहीं छोड़ूगी उसे
परिस्थिति चाहे लाख विकट हो,
तभी मेरी नजर राह चलते
एक बच्चे पर पड़ी
धूल से सने, उस फटेहाल बच्चे की
नजर मेरी मुट्ठी पर थी
शायद वो जानना चाह रहा था
मेरी मुट्ठी का रहस्य
मैं घबराई, सोचा कहीं इसकी नजर
मेरी उस संपत्ति पर तो नहीं
जिसे चुराया था मैंने जिंदगी के दामन से
शायद उसने पकड़ ली थी मेरी चोरी
सहसा वो मेरे नजदीक आया
मेरी आंखों में झांकर कहा उसने
जो तेरी मुट्ठी में है उसे बांट मेरे संग
तेरी खुशी दोगुनी हो जायेगी
मैं उससे बचना चाह रही थी
लेकिन वो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था
मैंने सोचा जब इसे पता ही है
मेरी चोरी का, तो बांट लेती हूं
उस खुशी को जिसे चुराकर रखा था
मैंने अपनी मुट्ठी में कैद करके
बच्चे के सामने मैंने ज्योंही खोली मुट्ठी
उसके होंठों पर थिरकी मुस्कान और आंखों में चमक
उसकी खुशी देख मैं खिलखिला उठी
लेकिन उसकी गूंज से सिसकियां गायब थी
बस सुनाई दिया था , तो सिर्फ तुम्हारे आने का संदेश...
रजनीश आनंद
03-03-17

बुधवार, 1 मार्च 2017

ठूंठ बना रिश्ता

क्यों ठूंठ बन गया हमारे रिश्ते का पौधा?
कभी जानने की कोशिश की तुमने?
याद करो वो दिन, जब बड़े उत्साह से
हमदोनों ने रोपा था अपने रिश्ते का बीज
रोज पानी से सींच कर मैंने उसे अंकुरित किया थ
तुम भी तो खुश थे उसके शैशव रूप को देखकर
उसकी हरी-हरी पत्तियां मन को लुभाती थीं
मैं तो अकसर उन पत्तियों को छूकर 
जी लेती थी अपने रिश्ते की गहराई को
वह झाड़ का रूप ले चुका था, लेकिन
चाह थी मेरी कि वह बन जाये बरगद
ताकि भरी दुपहरी में उसकी छांव हमें शीतलता दे
और जब जी चाहे हम-तुम उसकी मजबूती से पा लें सहारा
लेकिन आह!! ये हो ना सका
बरगद का सपना, आंखों से आंसू बन बह गया
समय ने नहीं दिया हमें उस पेड़ को सींचने का मौका 
और तुमने उठा दिया उस पौधे के अस्तित्व पर सवाल
मुझे लगा जैसे जीवन ही शेष नहीं बचा
लेकिन मैंने कसम खाई, नहीं-नही
मैं मरने नहीं दूंगी इस पौधे को
मैं सींचूगी इसे, बरगद बनाऊंगी
इसके फूल और फल को पुष्पित होने का पूरा मौका दूंगी
मैं जुटी रही अपने प्रयासों में
कोई दिन ऐसा नहीं गया जब
मैंने उस पौधे की थाह ना ली हो
जब मैं उसके पास जाती वो
निरीह नजरों से मुझे देखता भी था
उसे तुम्हारी तलाश थी, लेकिन 
उसकी आस नहीं हुई पूरी
पौधा था तो कुछ फल भी आय
लेकिन वो फल भी नहीं बदल सके
इरादा तुम्हारा और विपरीत परिस्थितियों की मार में
अंतत: ठूंठ हो गया हमारे रिश्ते का पौधा
ना तो मेरे आंसू, ना निवेदन बचा सका इस पेड़ क
मैंने कारण बहुत जानने की कोशिश की
आखिर क्यों मृत हुआ यह पेड़
तो ज्ञात हुआ उसकी जड़ हो चुकी थी खोखल
फिर पौधा, पेड़ कैसे बनता?
अब जबकि कुछ भी नहीं है शेष
तुम्हें अचानक क्यों यह सवाल परेशान कर रहा है
कि क्यों मर गया वो पेड़?
अब पेड़ को बचाने के लिए
मेरे पास ना तो ऊर्जा बची ना आस
इसलिए ना पूछो ये सवाल
खुश रहो, क्योंकि मैं ये नहीं भूली कि
हमने साथ बोया था रिश्ते का बीज
भले ही बरगद ना बन पाया वो
लेकिन अफसोस नहीं मुझे इस बात का
जो हुआ वो अच्छे के लिए हुआ होगा
शायद हमारे रास्ते कभी एक ना थे
तभी तो ठूंठ हुए रिश्ते को देख
अब सिहरन भी नहीं होती मुझे...
रजनीश आनंद
01-03_17

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

उम्मीद

जीवन  में क्या मायने हैं उम्मीद के?
यह सवाल मेरे लिए बेमानी था तब तक,
जब तक की मैंने नहीं थामा था दामन इसका
पर ज्योंही मैंने उम्मीद को आगोश में लिया
वह धंस सा गया मेरे सीने में
मैं पिघलती गयी उसके सीने से लगकर
और वह मेरी कमजोरी बनता गया
जकड़ लिया बिलकुल उसने मुझे
फिर शातिर खिलाड़ी की तरह उसने कुतरे मेरे पर
मैं झटपटाई, लेकिन कुछ कर ना पायी
उम्मीद ने तो कैद कर लिया था मुझे पिंजरे में
सपने टूटे, वास्तविकता सामने थी मेरे
उम्मीद का चेहरा क्रूर होता जा रहा था
मैं डरने लगी थी उससे और उसका आगोश
चुभने लगा था मुझे, तब समझ पा रही थी मैं
उम्मीद के टूटने का दर्द, हां अब भी स्मरण है
जब पहली बार टूटी थी उम्मीद
प्रतीत हुआ था चांदनी रात में
छा गया हो अमावस जैसे
बहे थे इतने आंसू कि पोंछने की
इच्छा ना रही थी शेष, लेकिन
अब मैं समझ गयी हूं
उम्मीद है , तो सकारात्मक अनुभूति
किंतु जो इसका गुलाम हुआ इसने
दोजख से बदतर कर दी उसकी जिंदगी
इसलिए प्रण किया है मैंने
उम्मीद से प्रेम तो करूंगी, लेकिन
नहीं बनने दूंगी उसे मेरा भाग्यविधाता
क्योंक नकारात्मकता से मुझे चिढ़ है
जीवन सुंदर है इसे एक उम्मीद पर कुर्बान क्यों करना?
रजनीश आनंद
24-02-17

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

एक द्वंद्व सुबह-शाम

एक द्वंद्व सुबह -शाम,
चला मेरे मन में आज
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है?
आफिस की सीढ़यों को गिनते हुए
जब मैं पहुंची अपने कमरे तक
कई पुरानी यादें मेरीे मानसपटल पर छा गयीं
बचपन से आजतक टूटें कई सपने मेरे
टूटे हुए खिलौनों की कसक
अब भी हैै मन में बाकी
वे खिलौने पूछते हैं मुझसे
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं?
कंप्यूटर के की-बोर्ड को दिनभर खड़खड़ती मैं
खबरों को लिखती -सुधारती मैं
कहीं सदन में मारपीट, कहीं आतंकी हमला
किसी अभिनेत्री का यौन शोषण,
तो किसी नये खिलाड़ी का उद्भव
द्वंद्व फिर उभरा क्या जीवन में
कुछ भी स्थायी नहीं है?
बचपन की दहलीज लांघ
कुछ रिश्ते थे जोड़े मैंने
क्षण भर का साथ निभा पुख्ता कर गये
वे रिश्ते कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है
लोगों ने भी दिये सबूत,विश्वास दिलाया मुझे
लेकिन सारे दावों को नकारती
मैं खड़ी हूं अपने विश्वास के साथ कि
प्रेम स्थायी है और यह हमेशा रहेगा कायम
मेरे जीवन के बाद भी,
मेरे इस विश्वास को प्राप्त है
आशीष शिवालय का भी
खड़ी हूं तुम्हारे सामने मैं इस दावे के साथ
आजीवन कायम रहेगा
प्रेम मेरा और तुम्हारा
इस विश्वास को दिल में समेट
मैं चल पड़ी थी घर की ओर
दरवाजा जो मैंने खटखटाया
मेरी जिंदगी ने बांह पसार कर बुलाया
असमंजस में जो लिपट गयी सीने से उसके
धड़कनों की बेचैनी समझ
उसने पूछा क्या हुआ माँ?
सवाल पर उसके थिरक गयी
मुस्कान मेरे चेहरे पर
विश्वास हुआ मजबूत
जीवन में प्रेम हमेशा होता है स्थायी
तब ही तो वह बिन बोले
समझ लेता है दिल की बात
दिल ने मजबूती से कहा मुझसे
प्रेम मेरा-तुम्हारा सच्चा है, बाकी सब बेमानी...
रजनीश आनंद
18-02-17


गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ख्वाहिश


ख्वाहिश तो ना की थी कभी

कि पा लूं तुमको, लेकिन

कुछ यूं आये तुम जीवन मेंं

सारी ख्वाहिशें खारिज हो गयीं

बस एक ही तमन्ना है बाकी

मोहब्बत जो पा लूं तुम्हारी

दामन में सज जायेंगे खुशियों के सितारे

इल्तिजा है तो बस इतनी सी

एक दिन के लिए ही सही,

 बना लो मलिका ए जिगर अपनी

महसूस होगा कुछ यूं मूझे जैसे

जन्नत में बीत गयी जिंदगी मेरी...

रजनीश आनंद
16-02-17

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

मैं नहीं छिनने दूंगी अपनी पहचान...


ए सुनो पितृसत्तामक समाज
मैं तुमसे पूछना चाहती हूं एक सवाल?
क्यों मेरी पहचान छिनना चाहते हो तुम?
मैंने तो तुमसे कभी नहीं कहा
भूल जाओ, अपनी जड़ों को
मां-बाप, परिजनों को
उन गलियों को जहां हम जीते हैं
अपना बचपन, जहां होती है जिंदगी जवां
कैसे भूलूं मैं मां की लोरियों को
पापा के लाड़ को,
भैया-दीदी, दोस्तों के साथ की मस्ती को
मैं तो अपनी जड़ों से बिछड़कर
लहलहाती हूं तुम्हारे आंगन में
हां सही है मेरा नाम जुड़ा है तुमसे
संग कटेंगे अब जीवन के शेष अध्याय
लेकिन इसके माने ये तो नहीं
कि तुमसे जुड़ते ही जीवन की किताब के
मिट गये सारे पुराने पन्ने.
इस समाज ने हमेशा छिनी औरतों से उसकी पहचान
लेकिन मैं अपनी मां की तरह
नहीं करूंगी त्याग, नहीं फटने दूंगी
अपने जीवन से प्रारंभिक पन्नों को
तुम मेरे जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय हो
किंतु मेरी बुनियाद प्रारंभिक पन्ने हैं
उन पन्नों के बिना गिर जायेगी
मेरी जीवनरूपी इमारत
इसलिए मैं सफल नहीं होने दूंगी
इस साजिश को,
मैं तुम्हारे साथ हूं खड़ी
लेकिन तब ही, जब तुम
स्वीकारो मेरी पहचान को
क्योंकि मैंने तो तुमसे
कभी नहीं छिनी तुम्हारी पहचान...
रजनीश आनंद
04-02-17

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

जीवन पारदर्शी क्यों नहीं?

जब भी कांच के गिलास में
निर्मल-स्वच्छ पानी को देखती हूं
सोचती हूं जीवन ऐसा क्यों नहीं?
सब कुछ स्पष्ट, पारदर्शी, लुभावना
कि तड़प उठूं उस पानी के लिए
क्यों जीवन के गिलास में काई जमी है?
पानी में पनप चुके हैं कई जीवाणु
मेरा-तुम्हारा,अभिमान-स्वाभिमान की जंग में
जब फूट गया जीवन का गिलास
मैं चुपचाप समेटती रही, कांच के टुकड़ों को
इस उम्मीद के साथ कि अबकी जब
कांच पिघलेगा और बनेगा कोई नया गिलास
तो उसमें काई नहीं जमेगी
वह होगा साफ, स्वच्छ और पारदर्शी
क्योंकि जिंदगी की कलाई
मैंने अबतक बड़ी उम्मीद से थाम रखी है...

रजनीश आनंद
02-02-17

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

मेरी कमजोरी नहीं तुम...

मेरी कमजोरी नहीं तुम
कि
ना हो मिलन, तो टूट जाऊं मैं
तुम तो प्रेरणा हो
मेरे जीवन के
जो देता है मेरे जीवन को
नीले आकाश सा विस्तार
मिलन की आस तो
प्रेरित करती है मुझे
और मैं हर रोज
चुन लाती हूं मिलन की उम्मीद को
मानों चुन लाई मैं
हरसिंगार के फूल
खुद को सजा लेने को
इतनी गहराई है
प्रेम में तुम्हारे
कि
मैं जितना डूबती हूं
गहरा होता जाता है प्रेमरंग
क्षणिक आवेश या आकर्षण नहीं
तुम्हारे लिए प्रेम मेरा
इसमें तो ठहराव है
जीवन भर का...

रजनीश आनंद
01-02-17

शनिवार, 28 जनवरी 2017

आ जाओ एक बार कि...

आ जाओ एक बार
कि
कहना है कुछ मुझे
सीने से लगकर तुम्हारे
जीना है चंद पल मुझे
बिंदिया सजा मैं माथे पर
रचती हूं हर रोज सपना हसीन
कि
हौले से आकर तुम
चूम लेते हो पेशानी मेरी
आ जाओ अब तुम
कि
फीकी चाय भी मीठी लगने लगी
जिंदगी में इस कदर
सराबोर हो तुम
कि
सांसें तुम्हारे नाम पर चलने लगी
ख्वाहिश है, मैं टांक दूं 
तुम्हारी कमीज के कुछ टूटे बटन
और कुछ को छिपा लूं.
अब बेचैन है मन
कि
तुुम्हारे पीठ पर
लिखना है मुझे अपना नाम
भरना तुम्हें है बांहों में
जैसे तुम ना जाओ कभी
आ जाओ एक बार
कि ...

रजनीश आनंद
28-01-17

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

...जो चेहरे पर दिखता है मेरे

तुम्हारे आगोश में जो सुकून है
वो चेहरे पर दिखता है मेरे
वैसे तो लिया नहीं नाम मैंने
तुम्हारा उस तरह कभी
फिर भी रह-रह कर
जिक्र आ ही जाता है तुम्हारा.
जो अनोखापन है हमारे प्रेम में
वो मोहताज नहीं किसी का
बस तुम मेरी दुनिया
और मैं तुम्हारी हूं
इस तरह जीयें कि
मेरे हिस्से की सांसें तुम भर लो
और तुम्हारी धड़कन
मेरे सीने में महसूस हो
कोई बुरी नजर नहीं
लील सकती हमारे प्रेम को
क्योंकि हम मजबूती के साथ खड़े हैं
हाथों में हाथ डाले...
रजनीश आनंद
26-01-17

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

मादक रात

ओह कितनी मादक हो चली है ये रात
आकाश में मुदित चांद
और मैं अपने चांद की बांहों में
आकाश में तारे चमक रहे हैं,
धरती पर तुम्हारी आंखें
इन चमकीली आंखों में एक संकेत है
मेरे लिए, हां सिर्फ मेरे लिए
कि आलिंगनबद्ध हो जाऊं मैं तुमसे
चाहत तो मेरी भी यही है
पर मुझे मोह हो चला है तुम्हारी
आंखों की पुतलियों में देखने का
यह प्रेम का सागर है, जिसका जल
बुझा देता है मेरी हर प्यास
और चुपके से कहता है मुझसे
जिसे मैं साफ पढ़ रही हूं
कि
मैं दुनिया की सबसे सुंदर औरत हूं
और तुम मुझसे अथाह प्रेम करते हो

रजनीश आनंद
26-12-16

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

ऊंचाई का डर और मैं

मुझे ऊंचाई से डर लगता था
जब मैं देखती थी ऊपर से नीचे
एक खौफ समा जाता था
नहीं-नहीं मैं ऐसी जगह
नहीं जाना चाहती
जहां हो अकेलापन
हरियाली भी कम हो जाए
घटने लगे हवा
और महसूस हो घुटन
मैं नहीं जाना चाहती
मैं तो जीना चाहती थी
एक आम जिंदगी
एक नीड़ सपनों का
एक चिड़ा एक चिड़िया
लेकिन नहीं मेरे खाते में
तो ये भी नहीं
बस आंसू थे
जिन्हें पोंछना मुझे खुद था
सहसा किसी ने ऊपर से दी आवाज
मैं चल पड़ी ऊंचाई की ओर
हां , अब नहीं लगता मुझे
ऊंचाई से डर क्योंकि
मैंने शिखर से कर ली दोस्ती है
वहां कुछ बर्फ हैं जो पिघलेंगे
हरी घास दिखेगी
वो आयेगा जिसकी
प्रेरणा से मैं ऊंचाई तक पहुंची हूं
थाम कर उसका हाथ
ज्यों देखा मैंने नीचे
ऊंचाई से बहुत हसीन थी दुनिया
इतनी मनोरम होती है ऊंचाई
ये मैंने अब था जाना

रजनीश आनंद
24-12-16