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शनिवार, 11 जून 2016

क्या यह सपना होगा सच?

क्या मेरा रोम-रोम जी पायेगा तुम्हें?
सुबह से शाम तक खोई रहती हूं तुम में
भीड़ में अकेला कर दिया है तुमने
लेकिन मादक है यह अकेलापन
क्योंकि नस-नस में मौजूद हो तुम
चाह तो है कि इस मिट्टी के शरीर के
कण-कण को तृप्त कर दो तुम
ताकि तन-मन पर हो सिर्फ छाप तुम्हारी
जब पाकर प्रेम तुम्हारा
तेज हो जाये सांसें मेरी और फिर
कसती जायें बांहें तुम्हारी और
फिर बेसुध होकर पड़ी रहूं तुम्हारी बांहों में
तब हम दोनों हों बिलकुल मौन
जानते हो प्रिये
ऐसा अहसास होता है मुझे
जैसे तुम्हारी बांहें सिर्फ मुझे ही आगोश में लेने के लिए हैं
और वह सिर्फ मैं ही हूं जिसे मिल सकता है तुम्हारा प्रेम
क्या यह सपना होगा सच?
रजनीश आनंद
11-06-16

गुरुवार, 2 जून 2016

इतनी बेसब्री क्यों है?

तुमसे मिलने की इतनी बेसब्री क्यों है?
तन-मन में मेरे यह बेकशी सी क्यों है
हर आहट चौंका जाती क्यों है
हर बुलाहट अपनी सी लगती क्यों है
यूं तो श्रृंगार नहीं है प्रिये मुझे
लेकिन रह-रह आईना देखती क्यों हूं
तू सपना है या सच नहीं जानती मैं
फिर भी अपना सा लगता क्यों है
नहीं है तेरे स्पर्श से पहचान मेरी
फिर भी क्यों तेरे स्पर्श से तन-मन भीगा सा है
आह,
जबकि नहीं हो तुम सामने मेरे
फिर क्यों आसपास तेरे बदन की खुशबू सी है
जानती हूं मैं तू नहीं हो सकता मेरा
फिर भी कुछ पल अपने नाम करने की जिद सी क्यों है?

रजनीश आनंद
2-06-16

मंगलवार, 3 मई 2016

मुझे है विरह से प्रेम...

ध्यान रखना तुम, मैं प्रेयसी तुम्हारी, तुम मेरे प्रिये हो
प्रेम में हमारे है ना कोई शर्त ना कोई बाध्यता
है तो बस प्रेम और समर्पण का वादा
जब भी हम साथ हों,टूट कर करें प्रेम बस प्रेम
विरह भी पस्त हो जायेगा, सम्मुख हमारे
मुझे है भरोसा एक दिन ऐसा भी आयेगा
जब हमारे मिलन की बेला में नतमस्तक वो खड़ा होगा
लेकिन सुनो ना प्रिये, तुम्हारे प्रेम में डूबकर
हो गया है विरह से मेरा अटूट नाता
जब तुम दूर होते हो, तब वही एकमात्र सखा होता है मेरा
विरह की आग ज्यों-ज्यों तड़पाती है
तुम्हारे प्रति बढ़ता ही जाता है प्रेम मेरा
जाने कब विरह में जलकर मैं बन गयी तुम्हारी मीरा
इसलिए आओ ना प्रिये इस विरह की बेला में भी
हम डूब जायें इस कदर प्रेम रस में
कि विरह को भी हो जाये हमारे प्रेम से अगाध प्रेम
 रजनीश आनंद
02-05-16   

सोमवार, 2 मई 2016

...शेष सब झूठ, सब झूठ


प्रिये ना जानें क्यों मध्यरात्रि को अचानक लगा मुझे
 जैसे तुमने लगायी हो आवाज, बुलाया हो अपने पास
चौंक कर अधीरता में, झांका ज्यों झरोखे से मैंने
सन्नाटे के अलावा कुछ आया नहीं नजर
तभी हुआ एहसास जैसे तुमने फिर पुकारा मुझे
इस बार तो मैं खुद को रोक नहीं पायी,
क्योंकि ए सुनो प्रिये कहकर लगायी थी आवाज तुमने
खोल द्वार की कुंडी निकल आयी मैं देहरी से बाहर
तुम्हारा मुख तो नहीं दिखा मुझे
लेकिन आसमान में चांद मुस्कुरा रहा था
मैंने पूछा तू क्यों हंस रहा है?
क्या एक विरह में जलती प्रेयसी का उपहास कर रहा है
उसने कहा, नहीं मैं तो  गवाह हूं तुम दोनों के प्रेम का
जानता हूूं, मैं कि अपने प्रिये से मिलने को आतुर है तू
चांद ने बांहे फैलाकर जब मुझे अपने आगोश में लिया
तो उसके सीने से लगकर हुआ मुझे एहसास
अब तक तो अपने प्रिये से ही कर रही थी मैं दिल की बात
चांद सा मुख उसका देख मुझे हुआ उसके आसमान में होने का भ्रम
रात के सन्नाटे में जब मैं रहूं प्रिये की मजबूत बांहों में
तब क्या मैं जल सकती हूं विरह की आग में
चूम कर अधरों को मेरे
सांवरे ने कहा था, मेरी हो तुम और मैं तुम्हारा
शेष सब झूठ-सब झूठ...
रजनीश आनंद
02-05-16 




बुधवार, 20 अप्रैल 2016

किताब, मैं और प्रिये

हे भगवान, आज मुझे अपने सजीव होने पर दुख होता है
तुम तो कहते हो, मनुष्य योनि उत्कृष्ट है,फिर ऐसा कैसे हुआ?
मैं तुमसे जानना चाहती हूं, मुझसे अच्छी तो उस किताब की किस्मत कैसे?
जो हमेशा प्रिये के हाथों में होती है, उसके पन्नों को उलटते-पलटते
हमेशा उसे मेरे प्रिये का स्पर्श सुख नसीब होता है
वह हर वक्त उसे निहारता है
उसे सीने से लगाकर सो भी जाता है वो
उसपर भी उसका जी नहीं भरता, तो
जब वह साथ नहीं होती, तो उसकी चर्चाएं करता है
और मुझे देखो तुम, हमेशा प्रिये के साथ के लिए तरसती हूं
जब मैं कहती हूं ...क्या सुंदर नहीं मैं?
तो वो कहता है, तुम मुझे पसंद हो, अच्छी लगती हो
समझदार हो, इसलिए सुंदर भी लगती हो
फिर क्यों जब मैं पास जाना चाहती हूं, तो
वो कहता है अभी किताब है मेरे पास
हे भगवान, इंसान से अच्छी तो मैं किताब होती
हे प्रभु तुम्हारी माया क्या मुझे किताब बना सकती है?
लेकिन, भगवान इसमें उस बेचारी किताब का क्या दोष
मैं तो बेमतलब ही उसे भला-बुरा सुना रही हूं
ए किताब आ लग जा गले से मेरे
तू पहला प्यार है मेरे प्रियतम की
जब मिलेंगे तेरे मेरे अंग, तो शायद
तेरी खुशबू कुछ समा जाये, मेरे शरीर में
और इसी बहाने शायद मुझे मिल जाये मेरे प्रिये का साथ
और कुछ पल उसके वक्ष में मुंह छुपाकर, प्रेमरस में डूबकर बेसुध हो जाऊं मैं.

रजनीश आनंद
21-04-16

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

ऐसा नहीं है प्रिये कि ...

गूगल साभार
ऐसा नहीं है प्रिये कि 
स्वार्थी है मेरा प्रेम
तुम कर्तव्य पथ पर हो अग्रसर
जानती हूं मैं, लेकिन
कैसे रोकूं उस उद्‌वेग को
जो तुम बिन कर देता है
तन-मन व्याकुल, फिर
चाहत होती है मात्र इतनी
तुम आवाज लगा बुला लो मुझे
गूंथ लो अपनी बाहों में
काश कि तुम्हारे कर्तव्य पथ पर
बन साथी मैं चल पाती
तुम्हारा प्रेम ना सही
साथ मुझे तो मिल जाता
चाह तो यही है मेरी कि
चूमो तो सफलता का शिखर
हां, थोड़ा सा स्वार्थी है मेरा प्रेम
जो यह चाहता है, शिखर पर
जब हो थकान तुम्हें
लगाना आवाज मुझे
क्षण भर में भागी चली आऊंगी मैं
तब भींच लेना तुम बांहों में मुझे
और अहसास करा देना कि
खास हूं मैं तुम्हारे लिए
ऐसा नहीं है प्रिये...
रजनीश आनंद
05-04-2016