बुधवार, 21 दिसंबर 2016

तू जिसे आराध्य बना दें हमारा...

ना जाने ये क्या हुआ मुझे?
मेरा दिल धड़कता तो
मेरे सीने में है, लेकिन
हर बार धड़कने से पहले
तुम्हारा नाम लेता है
मैंने कहा इससे
कितना नाशुक्र है तू
इतने साल सहेजा मैंने
और तू मेरा ना हुआ
दिल ने ये कहा,
मुझसे क्या कहती है
जरा अपनी सांसों से पूछ
कि
हर बार आने से पहले
वे किसका नाम लेती हैं
अपनी नजरों से पूछ
किसकी छवि उभरती है उनमें
अपने तनबदन से पूछ
किसकी खुशबू बसी है
अरे हम पर इल्जाम लगाने वाली
जरा खुद से तो पूछ
क्या तू खुद की रही है
अरे हम तो तेरे भरोसे हैं
तू जिसे आराध्य बना दें हमारा
उसके नाम पर धड़कते हैं...

रजनीश आनंद
21-12-16

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

कैसा है प्रेम रंग?

कैसा है प्रेम रंग?
बताओ ना प्रिये
हरा, नीला लाल या फिर केसरिया
जानना चाहती हूं मैं
खुद को उस रंग में
रंगना चाहती हूं
सूरज और उसकी लालिमा को
जब देखती हूं
तो लगता है शायद
लाल है प्रेम रंग
तब ही तो सूर्योदय से
सूर्यास्त तक सूर्य
अलग नहीं होता उससे
लेकिन जब इस गगन को
देखती हूं धरती को अपनी बांहों में
समेटने के लिए झुका हुआ तो लगता है
नीला है प्रेम रंग
फिर जब गगन का आलिंगन पा
मादकता में डूबी हरी-भरी धरती को
देखती हूं तो प्रतीत होता है
हरा है प्रेम रंग
लेकिन जब तुम्हारी बांहों के घेरे में
खुद को बेसुध पाती हूं, तो भान होता है
तुम्हारे रंग में रंगा है प्रेम रंग
तो रंग दो ना प्रिये मुझे
अपने रंग में...

रजनीश आनंद
20-12-16


रविवार, 18 दिसंबर 2016

आओ कुछ हम बदलें


आओ कुछ हम बदलें
कपड़ों से ही नहीं, सोच से भी
कुछ प्रगतिशील हो जायें हम
इस पितृसत्तामक समाज के
कुछ सोच से टक्कर लें हम
आओ कुछ हम बदलें.
बलात्कार नहीं, जीवन का अंत
यह तो है बस एक घिनौना सच
जिसके लिए जिम्मेदार
सिर्फ और सिर्फ पुरुष दंभ है
आओ कुछ हम बदलें.
प्रगतिशीलता का ढोंग करते
इस समाज की दोयम सोच है
महिलाओं को लेकर, इसलिए जरूरत है
देह से इतर खुद को
 स्थापित करें हम
आओ कुछ हम बदलें.
स्त्री की इज्जत कोई
कांच का मर्तबान नहीं
जो बलात्कर की
एक ठोकर से टूट जाये
शीलभंग होने से अपवित्र
अगर औरत होती है, तो
वह पुरुष क्योंकर पवित्र होगा
जिसने जबरन किया यह कृत्य है
इस सोच को आत्मसात करें हम
आओ कुछ हम बदलें
तन पर जबरन कब्जा करने वालों को
रोकर नहीं, अट्टाहास करके दिखायें हम
बलात्कार के बाद भी शान से
जीकर दिखायें हम
आओ कुछ हम बदलें...

रजनीश आनंद
19-12-16

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

फिर दुविधा कैसी प्रिये?

तुम कहते हो
मैं पतवार,
तुम नाव हो
मैं प्रेरणा,
तुम कविता हो
मैं ख्वाब,
तुम नजरें हो
मैं सांसें
तुम शरीर हो
फिर दुविधा कैसी?
नि:संकोच कहो
जो हो मन में
औपचारिकता
बेमानी है
हमारे रिश्ते में
मुझे प्रेम है तुमसे
जो मोहताज नहीं
किसी औपचारिकता का
तुम्हारा दिया
अच्छा-बुरा सब
स्वीकार्य मुझे
जो तुम्हारा
सब मेरा है
तुम बिन अब
बेमानी यह जीवन है
तो आओ, संकोच ना करो
इस जीवन को जी लें हम

रजनीश आनंद
17-12-16

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

नदी की तिश्नगी

जब भी देखती हूं
नदी की तड़प
सागर से मिलने को
वह पहाड़ का सीना चीर
उदात्त प्रेमभाव में उफनती
आड़े-तिरछे मार्गों से गुजरती
बेकल बहती है
तिश्नगी है उसे
सागर की बांहों में समा जाने की
कई जगह पर बांधी भी जाती है वो
वेग प्रभावित होता है
किंतु रूकती नहीं
सागर से मिले बिना रूकना
यानी समाप्त हो जाना नदी का
लेकिन जब वो समा जाती है
अपने प्रियतम के आगोश में
जब विलीन हो जाती है वो
तब उसका अस्तित्व खोता नहीं
समाहित होता है सागर संग
तब मन में उठता है एक सवाल
क्या प्रेम परिभाषित हो सकता है?
रजनीश आनंद
16-12-2016

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

...और मेरा प्रेम परास्त होगा

इंतजार करती हूं तुम्हारा
हर पल तुममें खोकर
मन बाहर नहीं निकलना चाहता
इस प्रेमव्यूह को भेदकर
रचियता तुम इस प्रेमव्यूह के
जिसमें उलझी हूं मैं
क्या करूं जो हर सांस
आने से पहले लेती 
तुम्हारा नाम है
निहत्थे किया प्रवेश मैंने
इस व्यूह रचना के अंदर
बस तुम्हारे नाम की तलवार ही
मेरा एकमात्र सहारा है
भरोसा है, मुझे अपनी तलवार पर
यह मुझे विजयश्री दिलवाएगी
देखना तुम उस दिन
प्रेम मेरा अमर होगा
हार मेरी तब है जब तुम,
ठुकराओ प्रेम निवेदन
लेकिन अडिग है विश्वास 
मेरा अपने पावन प्रेम पर
तुम बांहों में भरने मुझे 
खुद चलकर आओगे
जो ये ना कर पायी मैं
शस्त्र डाल दूंगी उस दिन
मेरा प्रेम परास्त होगा
और नश्वर मेरा तनमन...

रजनीश आनंद
11-12 16

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

अमावस है, तो पूनम की रात भी है...

क्या है कविता का विज्ञान?
मैं नहीं जानती
मैं तो बस अपने भाव
संप्रेषित करती हूं तुमतक
जब भी सोचती हूं तुम्हें
एक टीस सी उठती है मन में
और पनपनता है प्रेमभाव
दिमाग में घुमड़ते हैं,कुछ शब्द
जिन्हें कलम के सहारे
कागज पर उतार देते हैं मेरे हाथ
अगर ये कविता है, तो फिर
कविता ही सही, लेकिन
मेरी कविता के हर शब्द में
लिखा है तुम्हारा नाम
बचपन में सहेलियों संग
खेला करती थी एक खेल
दोनों हथेलियों को जोड़
हाथ की लकीरों से
बनाती थी अर्द्धचंद्र
इस सोच के साथ
कि जिसके हाथ बनेगा
अर्द्धचंद्र, उसका प्रिय होगा
चांद सा सुंदर
तब से आज तक
तुम्हारे इंतजार में मैंने
रोज जोड़ा अपने
हथेलियों की लकीरों को
आकर देखो ना कितना
सुंदर चांद बनता है
मेरी हथेलियों में
बिलकुल तुम्हारी तरह
ओ ‘रजनीश’ के चांद
सुनो मेरी बात
जैसे तुम एक नाप में
नहीं दिखते कभी
वैसे ही, मेरे नसीब में है
तुम्हारा प्रेम, लेकिन अमावस है
अगर, तो पूर्णिमा की भी होती है एक रात
उस रात अपने मस्तक को रखकर
मेरे सीने पर तुम सुन लेना
क्या कहता है मेरा मन

रजनीश आनंद
10-12-16