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गुरुवार, 16 मार्च 2017

आज की रात...

काश, आज की रात
तुम आ जाते सपनों में मेरे
तो मैं जी लेती मनमाफिक जिंदगी
कभी वसंती हवा बन इठलाती
तो कभी बरखा बन बरस जाती
सीने पर तुम्हारे
छोटे से उस पल को ऐसे जीती
मानों जी ली पूरी जिंदगी
गीत सुनाती तुम्हें प्रेम के
और कहानी मधुर मिलन के
करती सोलह श्रृंगार और
तुम्हें रिझाती बन कर रति
कभी सीने से लगकर तुम्हें
सुनाती पीड़ा अकेली रातों की
आखों से जो अश्रु बहता
वो साक्ष्य बनता मेरी तड़प का
सांसें मेरी कहती तुमसे
बांधकर रखना मेरा लक्ष्य नहीं
हां, मैं देना चाहती हूं तुम्हें
अधरों से अपने प्रेम निशानी
आज की रात जो तुम आ जाते...
रजनीश आनंद
16-03-17

शनिवार, 21 जनवरी 2017

तुम्हारी महक...

मेरी जिंदगी में इस कदर शामिल हुआ तू
ना जाने कब मेरे लैपटॉप से बॉल पेन तक में
बिखर गयी तुम्हारी महक .
यूं तो किसी को मैं ऐसे ही नहीं देती यह हक
पर ना जानें कैसे मेरे मन ने मुझसे
पूछे बिना ही तुम्हें दे दिया यह अधिकार
मैंने मन का विरोध भी नहीं किया
क्योंकि एक सहमति, एक खुशी सी थी मस्तिष्क में
मन-मस्तिष्क ने स्वीकारा है तुम्हें संपूर्णता के साथ
तभी तो भोर होती है तुम्हारी मुस्कान के साथ
और रात तुम्हारे अपनेपन के साथ
किशोरवय का आकर्षण नहीं ये
सोची-समझी स्थिति है, ठहराव के साथ
प्रेम तुम्हारा, प्रेरणा मेरी जिंदगी का
जिसके दम पर पाना चाहती हूं
मैं अपने हिस्से का आकाश
और उस आकाश पर लिख देना चाहती हूं
तुम्हारा नाम, ताकि आजीवन बिखरी रहे
मेरे जीवन के हर कोने में तुम्हारी महक...

रजनीश आनंद
21-01-17

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

अब बहुत दिन हुए तुम्हें देखे...

सुनो ना प्रिये!!
अब बहुत दिन हुए तुम्हें देखे
इन नयनों की प्यास
सही नहीं जाती
मैं अधीर नहीं
लेकिन क्या करूं
इस मन का जिसमें
पनप उठी यह चाह है
यूं तो यह मन कभी
तुमसे अलग नहीं हो पाता
लेकिन कहता है मुझसे
वर्षों गये बीत
प्रिये की मधुर वाणी
नहीं पड़ी कानों में
नहीं समाई उन बांहों के घेरे में
जो देते हैं सुकून और
सुरक्षा का अहसास,
जानते हो इस बार
मैं नहीं करूंगी वो गलती
जिससे मैं वंचित रह जाऊं
तुम्हारे अनुपम प्रेम से
हां, देखो ना मैंने उतार दिया है
लाज का हर आवरण
अब नहीं आयेगा यह
हमारे प्रेम के बीच
वैसे भी इसकी जरूरत
नहीं अब हमारे बीच
क्योंकि तुम सांसें
और मैं शरीर हूं...

रजनीश आनंद
24-12-16

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

तुम्हारा आगोश

जिसमें गरमाहट है
तुम्हारे स्पर्श की
विश्वास है
हमारे प्रेम का
उम्मीद है
सुंदर भविष्य की
सपने हैं
हमारी खुशहाली के
उन्माद है
तुम्हारे चुंबन का
मादकता है
तुम्हारी नजरों की
शरारत है
तुम्हारी अंगुलियों की
भरोसा है
एक स्थायित्व का
जुड़ाव है
जीवन भर का
तब ही तो
जग में सबसे सुरक्षित है
तुम्हारा आगोश...

रजनीश आनंद
22-12-16

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

अमावस है, तो पूनम की रात भी है...

क्या है कविता का विज्ञान?
मैं नहीं जानती
मैं तो बस अपने भाव
संप्रेषित करती हूं तुमतक
जब भी सोचती हूं तुम्हें
एक टीस सी उठती है मन में
और पनपनता है प्रेमभाव
दिमाग में घुमड़ते हैं,कुछ शब्द
जिन्हें कलम के सहारे
कागज पर उतार देते हैं मेरे हाथ
अगर ये कविता है, तो फिर
कविता ही सही, लेकिन
मेरी कविता के हर शब्द में
लिखा है तुम्हारा नाम
बचपन में सहेलियों संग
खेला करती थी एक खेल
दोनों हथेलियों को जोड़
हाथ की लकीरों से
बनाती थी अर्द्धचंद्र
इस सोच के साथ
कि जिसके हाथ बनेगा
अर्द्धचंद्र, उसका प्रिय होगा
चांद सा सुंदर
तब से आज तक
तुम्हारे इंतजार में मैंने
रोज जोड़ा अपने
हथेलियों की लकीरों को
आकर देखो ना कितना
सुंदर चांद बनता है
मेरी हथेलियों में
बिलकुल तुम्हारी तरह
ओ ‘रजनीश’ के चांद
सुनो मेरी बात
जैसे तुम एक नाप में
नहीं दिखते कभी
वैसे ही, मेरे नसीब में है
तुम्हारा प्रेम, लेकिन अमावस है
अगर, तो पूर्णिमा की भी होती है एक रात
उस रात अपने मस्तक को रखकर
मेरे सीने पर तुम सुन लेना
क्या कहता है मेरा मन

रजनीश आनंद
10-12-16

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

अब विश्वास हो चला है...

जीवन में सबकुछ बुरा नहीं
जरूरत है अच्छाइयों से
पहचान बनाने की
बुराई के अंधकार को परे रख
अच्छाई के प्रकाश को
मैंने हथेलियों में समेट लिया है
और देखो ना, साथी के रूप में
नजर आये हो तुम
हृदय को मिला है सुकून
तुम्हारे होने के आभास मात्र से
जागी हैं नयी उम्मीदें,
नयी ऊर्जा से लबरेज हूं
हां, अब अकेली नहीं मैं
जीवनपथ पर संघर्ष तो करना है मुझे
किंतु अगर लड़खड़ाई मैं
तो तुम थाम लोगे मुझे
यह विश्वास अब हो चला है
क्योंकि तुम्हारे साथ होने का अहसास
अब मजबूत हो चला है...
रजनीश आनंद
07-12-16

बुधवार, 30 नवंबर 2016

एक बात बताओ तो प्रिये...

एक बात बताओ तो प्रिये
ऐसा क्यों होता है?
काले मेघ छाते हैं तो
वर्षा क्यों होती है?
मुझे तो ऐसा प्रतीत
होता है जब तुम
बांहों मे लेते हो
नयना मेरे खुशी से
बरबस बरस पड़ते हैं
अच्छा ये बताओ तो
बिजली जब चमक उठती है
तो बादल क्यों गरज उठते हैंं?
मुझे तो ऐसा भान होता है
जब तुम नजर भर देख लेते हो
तन मेरा चमक उठता है
और वो बादल नहींं गरजते
मेरी धड़कन है ,जो
सहसा तीव्र गति से धड़क उठती है
अच्छा ये बताओ तो तुम...
रजनीश आनंद
30-11-16

बुधवार, 23 नवंबर 2016

मैं तुम्हारी और तुम मेरे हो...

बहुत खराब हो तुम
मैं तुमसे तबतक ना बोलूंगी
जबतक तुम ना बोलो मुझसे
यह ठान मैं कर आयी तुमसे किनारा
सोचा, कुछ देर ले लेती हूं मीठी नींद
लेकिन पलकों को चूम जगा गये तुम
जागती आंखों में जो ख्वाब तैरे
उसमें तुम ही तुम थे
सोचा बाहर टहल लेती हूं
दरवाजे को खोला, तो सर्द हवा
टकराई मुझसे, जिसमें गरमाहट थी तुम्हारी
उस गरमाहट को ठुकरा मैं बैठ गयी
कागज काले करने, लेकिन ना जानें क्यों
तुम्हारे नाम के सिवा कुछ लिख ना पायी
खुद से हार कर जो मैंने बंद की आंखें
तो ढलक गये अश्रु, कहा दिल ने
तू किससे ना बोलने की जिद कर बैठी है
जिसके सांस लेने से आती है सांस तुझे
जिसकी उपस्थिति से होता है,
तुझे अपने अस्तित्व का एहसास
जिससे बोलकर है तेरे नयन वाचाल
अन्यथा हो जायेंगे मूक
सुनकर अपने दिल की बात
मैं भागकर समा गयी, तुम्हारी बांहों में
इस मिलन मेंं नयन जो बरसे, तो
मिट गये सारे शिकवे, एक ही बात शेष रही
कि मैं तुम्हारी और तुम मेरे हो...
रजनीश आनंद
23-11-16

बुधवार, 16 नवंबर 2016

मैं बन जाना चाहती हूं ...

प्रिये मन में है एक बात
बेसब्र हूं, तुमसे कहने को
ज्ञात है मुझे, सीमित है
हमदोनों के प्रारब्ध में मिलन
लेकिन कोई दुख नहीं
मैं हर दिन, हर पल
तुम्हारे लिए जीना चाहती हूं
इसलिए तो मैं बन जाना चाहती हूं,
सूर्योदय की लालिमा
ताकि अहले सुबह, जब जागो तुम
बसा लो उसके अनुपम सौंदर्य को अपनी आंखों में
मैं बन जाना चाहती हूं,
सरदी की धूप
जिसका ताप तुम्हें सुकून दे
तुमको कर दे ऊर्जा से ओतप्रोत
मैं बन जाना चाहती हूं
शीतल मंद वसंती हवा
ताकि जब बहाव हो मेरा, तो चूम लूं
तुम्हारे तन को और
तुम्हें हो मेरे आसपास होने का एहसास
मैं बन जाना चाहती हूं
तुम्हारे बागीचे की फूल
जिसे तुम प्रेमवश कभी-कभी दे दो अपना स्पर्शसुख
मैं बन जाना चाहती हूं
तुम्हारे आंगन की तुलसी
जिसे तुम मान दो और
मैं बनाया जाऊं तुम्हारे लिए शुभकारी
मैं बन जाता चाहती हूं
तुम्हारे आंगन की प्यारी गोरैया
जिसका आंगन में फुदकना, तुम्हें प्रिय हो
और जिसके घोंसले और अंडे को
तुम सहेजकर रखते हो
मैं बन जाना चाहती हूं,
चांद की नहीं, तुम्हारी चांदनी
जिसकी दूधिया रौशनी तुम्हारे मार्ग के हर तिमिर को दूर करे
और तुम सच कर सको अपने हर सपने को

रजनीश आनंद
17-11-16

रविवार, 13 नवंबर 2016

..ओ चांद सुनो

..ओ चांद सुनो,
मेरी एक बात
आज मेरे प्रिये ने
वो सबक कह दिया
जिसे सुनने को मेरे कर्ण
कब से तरस गये थे
उसने आज बताया
अपने प्रेम का रहस्य
उस क्षण लगा जैसे
जड़ हो गयी हूं मैं
परम सुख से हुआ साक्षात्कार
और नम हो गयीं पलकें
अश्रु सिर्फ दुख के नहीं
सुख के भी होते हैं साथी
मैंने कहा उससे थाम लो मुझे
ताकि इस सुख को महसूस कर लूं
जब उसने लिया मुझे
अपनी बांहों के घेरे में
तब मैं, मैं नहीं रही
सिर्फ वो रहा और हमारा प्रेम
उसके प्रेम की वर्षा से अभिभूत
मैं प्रेमलता बन कस गयी उससे
इस कसावट में मेरी आंखें,
अधमुंदी सी हो गयीं और
मैंने कहा, तुम्हारे प्रेम में
टीसता है तनमन
आजीवन बनी रहे यह टीस, यह कसावट
प्रेम इतना दो मुझे कि बेसुध हो जाऊं मैं
और तुम्हारी बांहों में तोड़ दूं
तनमन की हर लाज, हर दीवार
रजनीश आनंद
14-11-16

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

तुम्हारी इच्छा और मैं...

तुम्हें यह झूठ
प्रतीत हो सकता है
पर
सच कहती हूं मैं
मेरी हर इच्छा
तुमसे जुड़ी है
क्या तुम्हें भी कभी
ऐसा महसूस हुआ है?
जानते हो प्रिये जब
स्नान के बाद मैं
कपड़े पहनना चाहती हूं
तो
सहसा उस रंग के कपड़े तक
मेरे हाथ चले जाते हैं
जो तुम्हें प्रिय है
जब खुद को संवारने
आइने के सम्मुख होती हूं
तो वह सब कर बैठती हूं
जो है तुम्हारी पसंद
माथे पर लाल बिंदी
मैं बरबस लगा लेती हूं
क्यों?मुझे पता नहीं
पूरा दिन तुमसे बात करती हूं
समझना चाहती हूं तुम्हें
तुम्हारी पसंद-नापसंद
लेकिन आसान नहीं है
तुम्हें पढ़ पाना
क्योंकि विस्तृत है तुम्हारा व्यक्तित्व
फिर भी मैं इतना कह सकती हूं
बहुत प्रेम है तुमसे
बाकी चीजें मैं नहीं समझ पाती
रात नींद तो आती है
पर जागती रहती हूं मैं
यह सोच कि कब तुम्हें
मेरी चाह हो
और
तुम मुझसे कहो
आओ प्रिय उदात्त प्रेम के
सागर में हम डूब जायें
तब मैं समर्पित कर दूं
खुद को तुम्हारे लिए
गहरे प्रेम के उस क्षण में
मैं गहरी आवाज में
जो तुम्हें प्रिय है
सिर्फ लेना चाहती हूं
मैं तुम्हारा नाम
उस पल जब चंचल हो
तुम्हारा स्पर्श और
मादक हो हर ध्वनि
मैं बन जाना चाहती हूं
तुम्हारी इच्छा
और जी लेना चाहती हूं
तुम्हारे लिए बस
तुम्हारे लिए...

रजनीश आनंद
02-011-16

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

रिसता दर्द

तुमने कभी सोचा प्रिये?
क्या बितती है मुझपर
तुम्हारी चाह में
हर पल रिसता है
एक दर्द सीने में
मैं वर्णन नहीं कर सकती
उस एहसास का
देखो मेरी आंखों में
तुम्हें स्पष्ट दिखेगी
असीमित इंतजार की तड़प
और
जब तुम कसते हो
मुझे बांहों में तब,
जब वायु का प्रवेश भी
हो जाता है निषेध
मुझे मिलती है प्राणवायु
असीम ऊर्जा से परिपूर्ण
और मैं अपने अधरों से
लिख देती हूं तुम्हारे वक्ष पर
हमारी प्रेमकथा
और जब तुम अपनी अंगुलियां
फेरते हो मेरे केशों में तो
मैं जकड़ती जाती हूं तुम्हें
ताकि एक हो जायें हम
थोड़ी क्रूर होती पकड़
लेकिन सुखद
जब बेसुध सी हो जाती हूं मैं
तब अहसास होता है
मेरा जिस्म मेरा नहीं
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी चाह है
जिसका हर रिसता दर्द
मिटता है तुम्हारी बांहों में आकर

रजनीश आनंद
31-10-16