गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ख्वाहिश


ख्वाहिश तो ना की थी कभी

कि पा लूं तुमको, लेकिन

कुछ यूं आये तुम जीवन मेंं

सारी ख्वाहिशें खारिज हो गयीं

बस एक ही तमन्ना है बाकी

मोहब्बत जो पा लूं तुम्हारी

दामन में सज जायेंगे खुशियों के सितारे

इल्तिजा है तो बस इतनी सी

एक दिन के लिए ही सही,

 बना लो मलिका ए जिगर अपनी

महसूस होगा कुछ यूं मूझे जैसे

जन्नत में बीत गयी जिंदगी मेरी...

रजनीश आनंद
16-02-17

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

साथ हो गंतव्य तक...

जिंदगी की गाड़ी चलती है
जंगल, पहाड़, खेत, नदियां
साथी मुसाफिर गुजरते हैं
कोई अपना सा लगता है
कोई हंसाता है, कोई रुलाता है
कोई छल करता है
कोई  विश्वास करना सिखाता है
लेकिन कोई ऐसा भी होता है
जिसके जाने से सीट खाली सी लगती है
भले ही वह स्टेशन पर
पानी की बोतलें लेने गया हो
लेकिन बेचैन होता है मन
कहता है, कहां रह गये तुम
गाड़ी चल पड़ेगी, नहीं पीना
पानी मुझे, बस तुम आ जाओ
तुम छूट गये, तो
नीरस, निरुद्देश्य
हो जायेगा सफर
तुम हो साथ, तो लंबा सफर थकाता नहीं
बैठे-बैठे अकड़ता नहीं बदन
तुम्हारे कांधे पर सिर रखकर
झपकी ले लेती हूं, तो मिट जाती है थकान
ठंड लगती है, तो तुम
ढंक देते हो चादर मुझे
जिसमें गरमाहट है तुम्हारे प्रेम की
और हां तुम्हारे साथ मूंगफली बहुत भाती है
तो आओ ना साथ जी लें यह सफर
जीवन के अंतिम स्टेशन पर
हम होंगे साथ गंतव्य तक...
रजनीश आनंद
14-02-17

भूख

रसोई के खाली डिब्बों को
टटोलती-खंगालती मैं
कि मिल जाए दो मुट्ठी
अनाज के दाने,ताकि
मिटा सकूं भूख की आग
जो भड़क रही थी तुम्हारे बच्चे की पेट में
हर खाली डिब्बे का ढक्कन खोलते ही
मेरे अंदर भी बन रही थी एक रिक्तता
रिस रहा था एक दर्द अपनी अपूर्णता का
क्या भूख को बस में करना संभव नहीं?
क्या मैं इतनी बेबस हो गयी हूं
भूख के साथ जंग में मैं
हथियार डालना नहीं चाहती थी
मिले ज्योंही अनाज के दाने
मैं भागी उसे सिझाने
उम्मीद के चूल्हे पर
चढ़ा दी जोश की हांड़ी
चावल तो एक मुट्ठी ही मिली थी
लेकिन कुछ कोमल पत्तों को
चावल के साथ उबाल बना लिया था 
भूख शांत करने योग्य खाद्य
जिसकी मदद से तुम्हारे बच्चे की
भूख तो शांत कर दी थी मैंने
लेकिन तुम्हारी ना कर पायी
क्योंकि वो भूख पेट की ना थी
उसे तो चाहिए था मेरा मांसल तन
उसे कोई सरोकार ना था मेरी जद्दोहद से
मेरी ना सुनकर तुम्हारे चेहरे पर
उभरे थे तिरस्कार के भाव
जिसे झेलना बनती जा रही थी मेरी नियति
क्योंकि मैं एक औरत हूं
जिसका कर्तव्य ही है भूख मिटाना
फिर चाहे वो भूख किसी भी प्रकृति की हो
लेकिन बस अब और नहीं
मैं नहीं बनने दूंगी, इसे अपनी नियति
क्योंकि जीने का, हंसने का
हक मैं खोना नहीं चाहती...

रजनीश आनंद
13-02-17

पर ना भूलना मेरे प्रेम को...

कोई मजबूरी नहीं तुम्हारा प्रेम
जिसे छुपाती फिरूं मैं
यह गर्व का विषय है
जो स्पष्ट दिखता है
मेरे चेहरे पर
जब पुकारते हो तुम मुझे
तो दमक उठता है चेहरा मेरा
जैसे चांद के आने से इठलाती है रात
तुम्हारी महक में इस कदर सराबोर हूं
जैसे उपवन में मंडराती कोई तितली
मेरे नयनों में सजते हैं सपने तब
जब शिद्दत से कहते हो तुम
हां, मुझे तुमसे प्रेम है,
मेरे सीने में हमेशा जीवित रहेगा यह प्रेम
बस इतनी सी है गुजारिश
चाहे तो भूल जाना मुझे
पर ना भूलना मेरे प्रेम को,
इसकी खुशबू को
ताकि मुझे हमेशा महसूस हो
तुम आसपास हो मेरे...

रजनीश आनंद
13-02-17

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

एक उम्मीद है...


खामोश सी जिंदगी में
एक उम्मीद है इस बात की
अभी कोई अपना सा आकर
पूछेगा हाल मेरा, थाम कर हाथ मेरा
कहेगा चलो कुछ देर जी लें हम-तुम
शहर की सड़कों पर चलें हम बेपरवाह
चेहरे पर बिखरते बालों को
समेटकर कहे, वो खुले बालों में
सुंदर दिखती हो तुम.
किसी महंगे से मॉल के शोकेस में लगी
सुंदर साड़ी को दिखाकर उसे
मैं कहूं उससे ये वाली चाहिए मुझे
और वो मुस्कुरा कहे, हां जरूर
मैं लेकर दूंगा तुम्हें
उसकी यही बात सुकून दे जायेगी
साड़ी तो बस बहाना है
उसके दिल में अपने लिए
जगह तलाशना चाहती हूं मैं...

रजनीश आनंद
04-02-17

मैं नहीं छिनने दूंगी अपनी पहचान...


ए सुनो पितृसत्तामक समाज
मैं तुमसे पूछना चाहती हूं एक सवाल?
क्यों मेरी पहचान छिनना चाहते हो तुम?
मैंने तो तुमसे कभी नहीं कहा
भूल जाओ, अपनी जड़ों को
मां-बाप, परिजनों को
उन गलियों को जहां हम जीते हैं
अपना बचपन, जहां होती है जिंदगी जवां
कैसे भूलूं मैं मां की लोरियों को
पापा के लाड़ को,
भैया-दीदी, दोस्तों के साथ की मस्ती को
मैं तो अपनी जड़ों से बिछड़कर
लहलहाती हूं तुम्हारे आंगन में
हां सही है मेरा नाम जुड़ा है तुमसे
संग कटेंगे अब जीवन के शेष अध्याय
लेकिन इसके माने ये तो नहीं
कि तुमसे जुड़ते ही जीवन की किताब के
मिट गये सारे पुराने पन्ने.
इस समाज ने हमेशा छिनी औरतों से उसकी पहचान
लेकिन मैं अपनी मां की तरह
नहीं करूंगी त्याग, नहीं फटने दूंगी
अपने जीवन से प्रारंभिक पन्नों को
तुम मेरे जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय हो
किंतु मेरी बुनियाद प्रारंभिक पन्ने हैं
उन पन्नों के बिना गिर जायेगी
मेरी जीवनरूपी इमारत
इसलिए मैं सफल नहीं होने दूंगी
इस साजिश को,
मैं तुम्हारे साथ हूं खड़ी
लेकिन तब ही, जब तुम
स्वीकारो मेरी पहचान को
क्योंकि मैंने तो तुमसे
कभी नहीं छिनी तुम्हारी पहचान...
रजनीश आनंद
04-02-17

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

जीवन पारदर्शी क्यों नहीं?

जब भी कांच के गिलास में
निर्मल-स्वच्छ पानी को देखती हूं
सोचती हूं जीवन ऐसा क्यों नहीं?
सब कुछ स्पष्ट, पारदर्शी, लुभावना
कि तड़प उठूं उस पानी के लिए
क्यों जीवन के गिलास में काई जमी है?
पानी में पनप चुके हैं कई जीवाणु
मेरा-तुम्हारा,अभिमान-स्वाभिमान की जंग में
जब फूट गया जीवन का गिलास
मैं चुपचाप समेटती रही, कांच के टुकड़ों को
इस उम्मीद के साथ कि अबकी जब
कांच पिघलेगा और बनेगा कोई नया गिलास
तो उसमें काई नहीं जमेगी
वह होगा साफ, स्वच्छ और पारदर्शी
क्योंकि जिंदगी की कलाई
मैंने अबतक बड़ी उम्मीद से थाम रखी है...

रजनीश आनंद
02-02-17