रविवार, 25 अगस्त 2019

स्वाभाविकता

मैंने गढ़ा नहीं कुछ भी
जो भी है सब स्वाभाविक है
रोटी को बेलती हूं चकले पर
कोशिश नहीं करती कि गोल ही बने
फुलाती हूं तो कभी-कभी नहीं भी फूलते
नरमाई कम हो जाती है
अरहर की दाल उलाती हूं
स्वाद के लिए, सौंधेपन के लिए
कभी-कभी जल भी जाती है
रसोई की व्यस्तता में
पर फेंकती नहीं मैं
घी का छौंका लगाती हूं जीरे के साथ
बैंगन-बड़ी की सब्जी बहुत पसंद है
पर अक्सर बैंगन में कीड़े निकल आते हैं
तो क्या? पूरा बैंगन नहीं फेंकती
कीड़े को फेंकती हूं पहले,  फिर सड़ चुके हिस्से को
सहेजती हूं दूध की मलाई
जो अब कम पड़ती है दूध में
दूध वाले भाई साहब पानी ज्यादा डाल देते हैं
मैंने कहा भी दिया है,  पानी ही डालें
फर्जी दूध का खेल स्वीकार्य नहीं होगा
मैं प्रेम के बदले प्रेम ही देती हूं
लेकिन पता नहीं क्यों
खो गयी मेरी स्वाभाविकता...

रजनीश आनंद

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

दीवार पर पड़ी कील

दीवार पर ठोंकी एक कील
कपड़े और मच्छर दानी के लिए
तो कुछ दिन में व्यवस्थित सी हो गयी
जिंदगी और अस्त-व्यस्त सा दिखने वाला कमरा
धीरे-धीरे बढ़ने लगी निर्भरता कील पर
कभी सब्जी का थैला,  कभी घर की चाबी
लेकिन कील ने कभी सेवा देने से इनकार नहीं किया
अनामिका अंगुली के बराबर भी ना थी कील
लेकिन उम्मीदें हजारों थी उससे
हैंडबैग,  पापा की छड़ी सब टंगते थे उसपर
पर उस रोज,  जब भींगे कपड़ों की रस्सी टांग दी गयी
तो सर्रर से निकल आयी थी कील दीवार से
और मेरे हाथों में पड़ा शव मेरे नापाक उम्मीदों का...

रजनीश आनंद

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

#SushmaSwaraj : भारतीय राजनीति की ओजस्वी वक्ता, जिनके सामने भाषण देने में आडवाणी भी घबराते थे...



भारतीय राजनीति की ओजस्वी वक्ता और भाजपा की दिग्गज नेता सुषमा स्वराज का मंगलवार देर रात निधन हो गया. उन्हें हृदयाघात होने के बाद एम्स में भरती कराया गया था जहां उनकी मौत हो गयी. आज दिल्ली के लोधी स्थित शवदाह गृह में उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा. इससे पहले अंतिम दर्शन के लिए सुबह 11 बजे से उनके आवास पर और फिर 12 बजे से भाजपा मुख्यालय में उनके पार्थिव शरीर को रखा जायेगा. पीएम मोदी ने उनके निधन पर ट्‌वीट करके कहा, यह मेरे लिए निजी क्षति है.

जब आडवाणी ने कहा था अब मैं क्या बोलूंगा
सुषमा स्वराज की पहचान एक तेजस्वी वक्ता के रूप में थी. एक बार भाजपा के एक कार्यक्रम में जब मंच पर लालकृष्ण आडवाणी को सुषमा स्वराज से पहले भाषण देने के लिए बुलाया गया था, तो उन्होंने कहा था, आपलोगों ने अच्छा किया कि मुझे पहले बुला लिया, वरना सुषमा के बाद मुझे बुलाते तो मुझे कौन सुनता. उन्होंने उस वक्त यह भी कहा था कि अक्सर मुझे वाजपेयी जी के बोलने के बाद मौका दिया जाता था, तब भी मैं यह कहता था कि मुझे पहले बोलने दे दीजिए, अन्यथा मुझे उनके बाद कौन सुनेगा.

विदेश मंत्री के रूप में बनायी अनोखी पहचान
सुषमा स्वराज नरेंद्र मोदी सरकार में विदेश मंत्री रहीं और अपने कार्यों से अनूठी पहचान बनायी. उन्होंने जहां कूटनीतिक निर्णयों से देश की छवि स्थापित की वहीं एक ट्‌वीट में देशवासियों को मदद पहु़ंचाकर मिसाल कायम की. उन्होंने विदेश में फंसे कई लोगों को अपने व्यक्तिगत पहल से वापस लाया और सबके लिए ममतामयी मां की तरह बन गयीं.

सात बार सांसद और तीन बार विधायक रहीं थीं सुषमा स्वराज
14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला शहर में जन्मीं सुषमा स्वराज सात बार सांसद और 3 बार विधायक रही थीं. 1977 में जब वह 25 साल की थीं तब वह भारत की सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बनी थीं. 1998 में वह दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थीं. पेशे से वकील सुषमा स्वराज ने अंबाला के एसडी कॉलेज और पंजाव विश्वविद्यालय के कानून विभाग से पढ़ाई की थी. अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत इन्होंने 1970 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी. वह 1977 में अंबाला छावनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक के रूप में चुनाव जीती थीं और  चौधरी देवी लाल की सरकार में श्रम मंत्री बनीं थीं और 25 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाया था.  1990 में सुषमा स्वराज राज्यसभा की सदस्य चुनी गईं और 1996 में लोकसभा चुनावों में वे दक्षिण दिल्ली से 11वीं लोकसभा के लिए सांसद चुनी गयीं. सुषमा स्वराज को 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे सूचना और प्रसारण मंत्री बनी थीं. सन 1998 में सुषमा स्वराज 12वीं लोकसभा के लिए दोबारा दक्षिणी दिल्ली से चुनी गईं। 2014 में 16वीं लोकसभा में सुषमा स्वराज विदिशा से जीतकर आयीं थीं.

पारंपरिक रस्मों को भी निभाती थीं
सुषमा स्वराज ने अपने पुराने साथी और सुप्रीम कोर्ट के वकील स्वराज कौशल से 1975 में साथी की थी, उनकी एक बेटी है, बांसुरी. सुषमा स्वराज चाहे जिस भी पद पर रहीं वो वे पारंपरिक तरीके से करवा चौथ मनाना नहीं भूलती थीं. इस मौके पर मीडिया में उनकी कई तसवीरें भी आती थीं, जिसमें वे हाथों में मेहंदी, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और मांग में सिंदूर लगाकर चुनरी ओढ़कर पूजा करती थीं.

रविवार, 4 अगस्त 2019

महात्मा गांधी की झारखंड यात्रा किताब का परिचय

रांची के पत्रकारिता जगत में कुछ नाम ऐसे हैं,  जिनके बारे में यह कहा सकता है कि वे पाठशाला हैं, जिनमें हरिवंश सर,  बलवीर सर और अनुज सिन्हा सर का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। आज अनुज सर की चार किताबों का विमोचन रांची के आर्यभट्ट सभागार में हुआ। मुझे भी कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला।  अनुज सर की जिन चार किताबों का विमोचन हुआ उनमें से तीन आलेखों का संकलन है और एक किताब गांधी जी पर लिखी गयी है जिसे मैं वहाँ से खरीद कर लायी। 

प्रभात प्रकाशन ने तीन सौ की किताब दो सौ में दे दी,  तो लगा अच्छा सौदा है। जैसा कि अनुज सर और हरिवंश सर ने अपने संबोधन में बताया था कि यह किताब एक दस्तावेज है तो इतिहास की विद्यार्थी होने के कारण मेरी रुचि किताब के प्रति बहुत बढ़ गयी थी।  जैसा कि किताब के नाम से स्पष्ट है 'महात्मा गांधी की झारखंड यात्रा' यह एक ऐतिहासिक किताब है। इस किताब की भूमिका हरिवंश सर ने लिखी ही और बहुत ही बेहतरीन ढंग से उन्होंने किताब के विषय और उसके महत्व को समझाया है। 

उन्होंने बताया है कि पिछले तीन साल यानी 2016-19के बीच महात्मा गांधी की खूब चर्चा हो रही हैं।  पहले चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मनाया गया, फिर 2018 में गांधी की 150वीं मनाने की शुरुआत हुई जो जारी है। इस दौरान देश और विदेश में गांधी पर काफी कुछ लिखा जा रहा है। शोध हो रहे हैं,  चंपारण आंदोलन की खूब चर्चा हुई लेकिन इस आंदोलन से रांची का या यूं कहें कि झारखंड का जो संबंध है,  वह मिसिंग था। उसपर कोई लिख नहीं रहा था ऐसे में अनुज सर की यह किताब सामने आयी है जिसने इस अनछुए अनकहे विषय को पकड़ा,  जिसपर काफी कम लिखा गया है और जिसपर लिखना कितना कठिन है तह खुद अनुज सर ने प्रस्तावना में बताया है।

किताब 15 चैप्टर में बंटी है और गांधी जी जहाँ जहाँ गये और किससे कब मिले,  कहाँ भाषण दिया।  किसे पत्र लिखा सबका जिक्र है।  महात्मा गांधी के पत्र को हूबहू किताब में स्थान दिया गया है। सबसे पहले महात्मा 1917 में रांची आये थे और उन्होंने मुख्य सचिव को पत्र लिखा था।  ऐसे कई बेशकीमती उद्धरण भी किताब में हैं जो सहजता से नहीं मिलते।

गांधी के रामगढ़ और रांची आने के बारे में तो मुझे जान आरी थी लेकिन देवघर में उनपर हमला।  कस्तूरबा का रांची आना,  झरिया में सभा,  कतरास में सभा।  रांची में उनका बीमार होना सहित कई जानकारियां बिलकुल नयी थी।
घर पर कई काम भी थे लेकिन आज इस किताब को निपटाने का सोच रखा था और अपने पढ़ाकू  मित्र से प्रेरणा लेते हुए मैंने किताब को आज ही निपटाने का सोच रखा था।  157 पेज की किताब है तो रात के  11.30 तक निपट गयी।  अंग्रेजी होती तो थोड़ा ज्यादा टाइम लगता पर हिंदी है इसलिए पढ़ती चली गयी।

जैसा कि पहले ही स्पष्ट है यह किताब दस्तावेज है,  विश्लेषण या आकलन नहीं है।  इसमें तथ्य भरपूर मात्रा में हैं जो जिजीविषा को शांत करते हैं और जिज्ञासु लोगों को भरपेट मानसिक भोजन भी उपलब्ध कराते हैं।

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

जूठे बरतन

किचन में सिंक तक भरे जूठे बरतन,
देख, कभी- कभी घबरा जाती हूं मैं
फिर आश्वासन देती हूं खुद को
नहीं बहुत थकान नहीं होगी, ज्यादा नहीं है
बेतरतीब ढंग से रखे हैं बस
फिर धीमे से नल खोल मैं पहले
कप-प्लेट और वैसे बरतनों को मांजकर
और धोकर, हटाती हूं, भ्रम बनाये रखना चाहती हूं
कम बरतनों का, फिर थाली और गिलास
कुकर और तेल से चिपचिपी काली हो चुकी कढ़ाई को
तो बस तिरछे नजर से देखा ही है,  हाथ नहीं लगाया
लेकिन एक दो तीन,  चार और थालियों को गिनना छोड़
मैं व्यस्त हूं मांजने और धोने की प्रक्रिया में
बीच-बीच में पानी सिंक के छलनी से निकलता नहीं
तब मैं तन्मयता से साफ करती हूं उसे ताकी पानी जमे ना
सिंक से बाहर ना आये,  फिर सूंऊऊऊ की ध्वनि और
सारा पानी सिंक से बाहर, अनाज, सब्जी,  रोटी के टुकड़े
जो बाधा बने तो मेरे बरतन धोने की क्रिया में सब को
निकाल कूड़ेदान में डाल दिया है मैंने,  ना जाने क्यों
मजा सा आने लगा है इस द्वंद्व में, जिंदगी की जंग सा
जब भी डूबने का एहसास हुआ, खूब हाथ पैर मारा
और अंततः खाली सिंक सी साफ जिंदगी,  जद्दोजहद के बीच
हर बरतन एक पड़ाव जिंदगी का, उसे मांजना-धोना
जीवन जीने की कोशिश,  कठिन परिस्थितियां, 
जैसे तेल में जली कढ़ाई, और उसे साफ करना,  मेरा संघर्ष
जैसे-जैसे कालिख हटती है कढ़ाई निखरती है
और मजा आता है, जीने का,  थकान से परे,
मेरे चेहरे पर खुशी है,  संघर्ष के पलों को जीतने की...

रजनीश आनंद

सोमवार, 29 जुलाई 2019

पुरी यात्रा संस्मरण-1 : छोटा सा शहर, जहां पहुंचते ही गूंजता है जय जगन्नाथ का स्वर, होटलों की है भरमार

पत्रकारिता जगत में डेस्क पर काम करने वाले जब छुट्‌टी पर अपने शहर से कहीं बाहर जाते हैं, तो उनके लिए वह पल बहुत खास होता है. खबरों में जीने की आदत से निकलकर कुछ दिन उससे इतर जिंदगी बहुत रास आती है, तो हमने भी तय किया कि कहीं एक-दो दिन की छुट्टी मार लेते हैं और देखते हैं कि राजनीति, क्राइम और आंकड़ों से इतर जिंदगी कैसे दिखती है. बस इसी चाह में मैं अपने बच्चों और बहन के साथ पुरी की यात्रा पर निकली.

पुरी जाने का हमारा कोई धार्मिक कारण नहीं था, बस रांची से पास में है, ट्रेन की कनेक्टविटी सही है और सबसे बड़ी बात कि वहां समुद्र है. हालांकि दूरी बहुत कम भी नहीं है, झारखंड-बिहार के लोगों की तरह कहें, तो यह पटना की तरह बगल में नहीं है भाई-689 किलोमीटर की दूरी है. यह बात अलग है कि शाम को चार बजे की ट्रेन पकड़ो तो अगले दिन सुबह सुबह पुरी में. प्लान तो बन गया पुरी जाने का लेकिन असल समस्या यह थी कि जाने के लिए पैसे कम थे. एसी थ्री का टिकट बनाना और हम पांच जने थे. बच्चे बड़े हो गये हैं, तो उनका टिकट भी लेना होगा, सो इस चक्कर में हमने सोचा कि क्यों ना स्लीपर में चला जाये. वैसे भी मार्च का महीना है बहुत गरमी नहीं लगेगी सो टिकट बना लिया. चार टिकट लिया, क्योंकि मेरा छोटा भतीजा अकेले सोता नहीं बर्थ से गिरने की आशंका बनी रहती है.

खैर हम टाइम से स्टेशन पहुंच गये. ट्रेन लगी हुई थी. हिंदी, अंग्रेजी और उड़िया में तपस्विनी एक्सप्रेस लिखा था. उड़िया पढ़ना नहीं आता, पर इतनी तो समझ तो सबके पास है कि क्या लिखा हो सकता है. वैसे भी लिपी की रूपरेखा से स्पष्ट है कि यह उड़िया भाषा है. नीचे की सीट हमारी नहीं थी, लेकिन एक ही जगह चार सीट हमारी थी सो हम जम गये बर्थ पर. आखिर किसी जमाने में ट्रेन अपने बाबूजी की हुआ करती थी और वह फीलिंग जोर मार ही देती है, जब भी स्टेशन और ट्रेन को देखती हूं, वह भी हटिया स्टेशन पर तो कुछ कहना ही नहीं है.  कुछ देर में एक साहब आये, अपना बर्थ नंबर ढूंढा और मेरी बहन से कहा, मेरी सीट है. असल में हमारा बच्चा विंडो सीट पर बैठा था. मेरी बहन ने बच्चे को वहां से हटने के लिए कहा. साहब हमें ऐसे देख रहे थे, जैसे हम कुछ अलग प्रजाति के हों और वे इंसान हैं. खैर हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दिये.

अब भी कुछ मिनट ही हुए थे कि साहब ने समान रखने वाले टेबल पर अपनी किताबें रखना शुरू किया. एक नहीं कई, फिर पानी का बोतल भी मानो वहां पर की छह की छह सीटें उनकी ही हैं. मेरी बहन ने मेरी ओर शिकायत भरे लहजे में देखा मैंने भी उसे चुप रहने का इशारा किया, तब तक भैया-भाभी आ गये पानी की बोतल और कुछ खाने का सामान लेकर. मेरी बहन को मौका मिल गया, उसने भी ट्रेन वाले भाई-साहब के अंदाज में सारा सामान उस टेबल पर लबालब कर दिया, जो जगह बची थी. उसके इस अंदाज पर भाईसाहब ने खिसिया कर हमारी ओर देखा. कुछ देर में ट्रेन खुल गयी और नीचेे की दोनों बर्थ के पैसेंजर भी आ गये. मतलब सीट फुल. छह लोगों की सीट और हम सात थे. हिचकोले खाती हुई ट्रेन आगे बढ़ी तो मन प्रसन्न हो गया.

रांची से राउरकेला का सफर तीन-साढ़े तीन घंटे का और इस दौरान जो खास चीज देखने को मिलती है, वह स्थानीय फलों का ट्रेन में बिकना. पपीता और बेर का मौसम था इसलिए कई महिलाएं ट्रेन में पपीता बेच रही थीं. महिलाएं जितना इस रूट में सामान बेचने का काम करती हैं, वैसे कहीं और देखने को शायद ना मिले. झारखंड की मेहनती महिलाएं. यहां जामुन, आम, केंद और बेर जैसे जंगली फल देखने को खूब मिलते हैं. दस-दस रूपये में लीजिए मन भर खाइए. साथ में कुछ 18-20 साल की लड़कियां मूंगफली भी बेच रही थीं, वैसे भी हम तय करके चले थे कि आनंद मनाना है और जो कुछ भी बेचने को आये उसे खाना है, हाइजिन गया तेल लेने. सो जो कुछ भी आता, बच्चे आंखों में संवाद करते और फिर आंटी ये कितने का दे दीजिए. अपन तो बस पैसे देने वाले थे. मैं और मेरी बहन ने खूब चेंज लिया था. वैसे भी इन दिनों सिक्के खूब हैं मार्केट में तो चेंज की कोई दिक्कत नहीं है. ट्रेन को गंदा करना हमने कभी नहीं सीखा इसलिए पूरा कूड़ा जमाकर करके डस्टबिन में डाला हालांकि आदतन लेोग गंदा करते हैं तो वे कर रहे थे और हमारे बच्चे सवाल कि वे ऐसे कचरा क्यों फेंक रहे हैं, वगैरह-वगैरह. मैंने आंख दिखाकर उन्हें चुप कराया.

किताब वाले भाईसाहब को काफी दिक्कत महसूस हो रही थी, क्योंकि बच्चे इधर-उधर करते और हल्ला भी. उनकी चेहरे-मोहरे से स्पष्ट था कि वे उड़िया आदमी हैं. जो भी बोलते बड़ा कठोर होता और हमारे बच्चों को ऐसे घूर रहे थे मानो मौका मिले तो चपत लगा दें. लेकिन हम भी कम नहीं है तैयार ही बैठे थे, बोलिए तो जनाब जरा कुछ अभी बताती हूं कि हम किस मिट्टी के हैं. खैर उन्होंने सरेंडर कर दिया और मुझसे कहा, अभी आपलोगों को सोना है क्या मैं ऊपर वाली सीट पर जाना चाहता हूं, मैंने कहा जाइए. वे ऊपर जाकर शांति से थे और हम विंडो सीट पाकर. अपना झारखंड उसकी धरती, जंगल, पहाड़ी जानवर देखते हम आगे बढ़ रहे थे. कभी खाने को कुछ आता और हम उसे ले लेते कभी ऊंघते कभी बच्चों को ताकीद करते हाथ बाहर नहीं नुिकालो. वगैरह-वगैरह. स्मार्टफोन का जमाना है, तो कभी काॅल आया तो कभी मैसेज. हम सुकून में थे, इस अहसास से की हम घूमने जा रहे हैं.

रात होते ही चांद हमारा पीछा करने लगा, ट्रेन की खिड़की से झांकता अपनी रौशनी बिखेरता, थोड़ा बतिया भी लिये हम उससे. फिर किसी की कही ये बात याद आयी कि जिस चांद को मामा कहते हम सब बड़े हुए वह पता नहीं युवावस्था में प्रिये या प्रेयसी कैसे हो जाता है? पता नहीं हंसी भी आयी, पर बात में दम है इससे इनकार नहीं किया जाता सकता. सुबह ट्रेन छह ही पुरी पहुंच गयी, कोई सात सवा सात बज रहा होगा.
स्टेशन पर कदम रखते ही ज्ञात हो गया कि आप जगन्नाथ नगरी में हैं, जहां अभिवादन का स्वर जय जगन्नाथ से शुरू होता है. ट्रेन से उतरते ही होटल के एजेंट, आटो वालेे टैक्सी वालेे और गाइड आपके साथ हो लेेगे. टूरिक्ट प्लेेस दिखाने की गारंटी महाप्रसाद की गारंटी और भगवानग जगन्नाथ के दर्शन की गारंटी वे देते हैं. हाथ में तसवीर लिये वे उड़िया-हिंदी में अपनी बात समझाते हैं. स्टेशन पर भी लेिखा है भगवान जगन्नाथ की नगरी में स्वागत है. कहने का आशय यह है कि पुरी की एक ही पहचान है भगवान जगन्नाथ की नगरी. लेेकिन इस नगरी में वैभव नजर नहीं आता है.  हम रांची से ही होटल की बुकिंग करके चले थे, इसलिए आटो वालों के आग्रह पर चल दिये उनके साथ.


 कोई सौ-दो सौ मीटर गये होंगे कि एक बाइक वाले से आटो की टक्कर हो गयी. बाइक पर दो लोग सवार थे उड़िया में पिल पड़े आटो वाले के ऊपर. आटो वालों कुछ सफाई दे रहा था मानो उसकी गलती नहीं थी. वह बहुत बोल रहा था इसलिए ठीक से बता समझ नहीं आ रही थी पर इतना समझ गयी कि वह कह रहा कि मैं तो सही ही मोड़ रहा था आप बीच में आ गये, पर बाइक सवार मान नहीं रहे थे. कोफ्त हो रही थी क्योंकि हमें होटल जाने की जल्दी थी पर वे दोनों आपस में भिड़े हुए थे मैं आटो वाले से जल्दी चलने के कहने ही जा रही थी कि मेरा छोट भतीजा बोल पड़ा -हे भगवान कैसी जगह पर आये हैं, जहां लड़ाई भी अलग भाषा में हो रही है. उसकी बात सुनकर हंसी पर कंट्रोल ही नहीं रहा और हम सब हंस पड़े हमारी हंसी से शायद आटो वाले को कुछ राहत हुई और वह बहस छोड़ चल पड़ा. पुरी की मुख्य सड़क से होकर जा रहे थे. जिलाधिकारी का कार्यालय दिखा. सुबह का समय था सड़कें पूरी खाली कुछ आटो और दुपहिया दिख रहे थे, जो यह बता रहे थे कि आबादी कम है इसलिए ट्रैफिक जाम की समस्या नहीं मिलेगी. कारें बहुत कम दिख रही थीं, जो इस बात को मजबूती दे रही थीं कि ओडशा देश के गरीब राज्यों में से एक है. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के होर्डिंग दिखे जिसपर उड़िया में कुछ लिखा था, पढ़ने की आदत तो है पर इस लिपी से अनजान थी तो यह समझ लिया कि किसी सरकारी कार्यक्रम का प्रचार होगा. हां एक बात देखने को मिली जो रांची जैसे शहर में नहीं दिखती वह थी होटलों की बहुतायत. हर रास्ते पर होटल और टूरिस्ट को लुभाने के लिए मैसेज. साथ ही हर चौक-चौराहे पर भगवान जगन्नाथ का मंदिर. छोटे से छोटे मंदिर में भी कलेिंग शैली की स्थापत्य कला नजर आती है. हमने  ‘शीबिच’ के करीब होटल बुक किया था, स्टेशन से महज 15-20 मिनट में हम होटल में थे. बाहर से तो आम होटल की तरह ही था, लेेकिन कमरा सुंदर आकर्षक. एसी रूम था इसलिए राहत महसूस हुई, क्योंकि उतनी सुबह भी पुरी में अजीब सी चिपचिपी गरमी, जिसकी आदत रांची के लोगों को नहीं है. बच्चे बेचैन थे समुद्र को देखने के लेिए तो बस अब बारी थी फ्रेश होकर रूम से निकलने की.  धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो हम हिंदुओं के चार धामों में से पुरी धाम में थे, इसके अतिरिक्त अन्य धाम हैं बद्रीनाथ, द्वारिका और रामेश्वरम.

सोमवार, 8 जुलाई 2019

प्राथमिकता बदलो

मैं बेचैन रहती हूं तबतक
जबतक,  नहीं लिख लेती
कोई आलेख, कविता
डरती हूं, कलम निकालते
अकसर मैंने पाया जब नहीं होता
सृजन कोई मेरी कलम से
वह आंखें तरेरती है
उलाहना भी देती है
मैं चाहे जितनी से
बंद कर लूं अपने कान
स्पष्ट आवाज आती है
मेरी डायरी के साथ चिपकी
मेरी कलम नजर रखती है
मेरे उन पलों पर,  जब मैं
करती हूं कोताही, बनाती हूं बहाने
चौबीस घंटे तो सबके लिए है,
गालिब शेक्सपियर,  महादेवी
इन्हीं घंटों में पनपे, उन्होंने तो नहीं गिने घंटे
रचना के लिए समय, नहीं समर्पण चाहिए
कलम कहती है होकर वाचाल
प्राथमिकता बदलो, यह दुनिया बहुत हसीन है...

रजनीश आनंद