क्यों ठूंठ बन गया हमारे रिश्ते का पौधा?
कभी जानने की कोशिश की तुमने?
याद करो वो दिन, जब बड़े उत्साह से
हमदोनों ने रोपा था अपने रिश्ते का बीज
रोज पानी से सींच कर मैंने उसे अंकुरित किया थ
तुम भी तो खुश थे उसके शैशव रूप को देखकर
उसकी हरी-हरी पत्तियां मन को लुभाती थीं
मैं तो अकसर उन पत्तियों को छूकर
जी लेती थी अपने रिश्ते की गहराई को
वह झाड़ का रूप ले चुका था, लेकिन
चाह थी मेरी कि वह बन जाये बरगद
ताकि भरी दुपहरी में उसकी छांव हमें शीतलता दे
और जब जी चाहे हम-तुम उसकी मजबूती से पा लें सहारा
लेकिन आह!! ये हो ना सका
बरगद का सपना, आंखों से आंसू बन बह गया
समय ने नहीं दिया हमें उस पेड़ को सींचने का मौका
और तुमने उठा दिया उस पौधे के अस्तित्व पर सवाल
मुझे लगा जैसे जीवन ही शेष नहीं बचा
लेकिन मैंने कसम खाई, नहीं-नही
मैं मरने नहीं दूंगी इस पौधे को
मैं सींचूगी इसे, बरगद बनाऊंगी
इसके फूल और फल को पुष्पित होने का पूरा मौका दूंगी
मैं जुटी रही अपने प्रयासों में
कोई दिन ऐसा नहीं गया जब
मैंने उस पौधे की थाह ना ली हो
जब मैं उसके पास जाती वो
निरीह नजरों से मुझे देखता भी था
उसे तुम्हारी तलाश थी, लेकिन
उसकी आस नहीं हुई पूरी
पौधा था तो कुछ फल भी आय
लेकिन वो फल भी नहीं बदल सके
इरादा तुम्हारा और विपरीत परिस्थितियों की मार में
अंतत: ठूंठ हो गया हमारे रिश्ते का पौधा
ना तो मेरे आंसू, ना निवेदन बचा सका इस पेड़ क
मैंने कारण बहुत जानने की कोशिश की
आखिर क्यों मृत हुआ यह पेड़
तो ज्ञात हुआ उसकी जड़ हो चुकी थी खोखल
फिर पौधा, पेड़ कैसे बनता?
अब जबकि कुछ भी नहीं है शेष
तुम्हें अचानक क्यों यह सवाल परेशान कर रहा है
कि क्यों मर गया वो पेड़?
अब पेड़ को बचाने के लिए
मेरे पास ना तो ऊर्जा बची ना आस
इसलिए ना पूछो ये सवाल
खुश रहो, क्योंकि मैं ये नहीं भूली कि
हमने साथ बोया था रिश्ते का बीज
भले ही बरगद ना बन पाया वो
लेकिन अफसोस नहीं मुझे इस बात का
जो हुआ वो अच्छे के लिए हुआ होगा
शायद हमारे रास्ते कभी एक ना थे
तभी तो ठूंठ हुए रिश्ते को देख
अब सिहरन भी नहीं होती मुझे...
रजनीश आनंद
01-03_17
बुधवार, 1 मार्च 2017
ठूंठ बना रिश्ता
शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017
उम्मीद
जीवन में क्या मायने हैं उम्मीद के?
यह सवाल मेरे लिए बेमानी था तब तक,
जब तक की मैंने नहीं थामा था दामन इसका
पर ज्योंही मैंने उम्मीद को आगोश में लिया
वह धंस सा गया मेरे सीने में
मैं पिघलती गयी उसके सीने से लगकर
और वह मेरी कमजोरी बनता गया
जकड़ लिया बिलकुल उसने मुझे
फिर शातिर खिलाड़ी की तरह उसने कुतरे मेरे पर
मैं झटपटाई, लेकिन कुछ कर ना पायी
उम्मीद ने तो कैद कर लिया था मुझे पिंजरे में
सपने टूटे, वास्तविकता सामने थी मेरे
उम्मीद का चेहरा क्रूर होता जा रहा था
मैं डरने लगी थी उससे और उसका आगोश
चुभने लगा था मुझे, तब समझ पा रही थी मैं
उम्मीद के टूटने का दर्द, हां अब भी स्मरण है
जब पहली बार टूटी थी उम्मीद
प्रतीत हुआ था चांदनी रात में
छा गया हो अमावस जैसे
बहे थे इतने आंसू कि पोंछने की
इच्छा ना रही थी शेष, लेकिन
अब मैं समझ गयी हूं
उम्मीद है , तो सकारात्मक अनुभूति
किंतु जो इसका गुलाम हुआ इसने
दोजख से बदतर कर दी उसकी जिंदगी
इसलिए प्रण किया है मैंने
उम्मीद से प्रेम तो करूंगी, लेकिन
नहीं बनने दूंगी उसे मेरा भाग्यविधाता
क्योंक नकारात्मकता से मुझे चिढ़ है
जीवन सुंदर है इसे एक उम्मीद पर कुर्बान क्यों करना?
रजनीश आनंद
24-02-17
बुधवार, 22 फ़रवरी 2017
...जिसपर लिखा था सबसे छुपाकर तुम्हारा नाम
मैं किताब को थाम कर बैठती हूं
तुम्हारे आसपास होने का एहसास
करा जाती हैं हवाएं.
कानों में चुपके से कहतीं हैं
सोना नहीं वो आयेगा
सजा ले सपने तू पलकों पे
सुन कर उसकी बात मैंने
लजाकर ज्यों किताब को भींचा
हैरान हो गयी मैं
किताब में धड़क रहा था तुम्हारा दिल
धड़कते दिल की बात समझने की
चाह में मैंने पलटा ज्यों किताब का पन्ना
तुम्हारी प्यारी आवाज कानों में गूंज गयी
जिसने किया मुझसे ये वादा
तुम हर पल साथ खड़े हो मेरे
देह या अदेह, स्वरूप कोई भी हो
तुमने थाम रखा है हाथ मेरा
तुम हर संघर्ष में हो साथ मेरे
पहाड़ से मजबूत इरादों के साथ
तुम्हारे वादे पर यकीन कर मैंने
किताब को चूम लिया
जिसपर लिख रखा था
सबसे छुपाकर मैंने नाम तुम्हारा...
रजनीश आनंद
23-02-17
जीवन की धुरी
घड़ी की सुइयों से जुड़ गया है
कुछ ऐसा नाता कि
कभी-कभी मालूम होता है
जैसे मैं खुद घड़ी की सुई
बन घूम रही हूं उसकी धुरी पर
सुबह के पांच बजते ही
घड़ी का अलार्म कानों में
कहता है बस , अब और नहीं
बिस्तर को नहीं है तुम्हारी जरूरत
उठो कि कई काम है तुम्हें निपटाने
ब्रश को हाथ में पकड़े-पकड़े
मैं कर लेती हूं कई प्लानिंग
घर-बाहर की जिम्मेदारियां निभाते
कभी-कभी महीनों बीत जाते हैं
खुद से बातें किये, सोचे हुए
लेकिन मैं खुश हूं, क्योंकि कायम है
मेरी पहचान, मैंने मिटने नहीं दिया है
उस अस्तित्व को जो मुझे कराता है
एहसास मेरे जिंदा होने का
जिसकी अपनी खुशियां हैं
और अपने फैसले भी, जिन्हें
मैं स्वयं गढ़ती हूं, अपने लिए...
रजनीश आनंद
22-02-17
सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
... रात की खामोशी कलरव में बदल गयी
यूं खामोश हुईं कि उसकी
आह तक नहीं पहुंच पा रही थी मुझतक
मैं तरस गयी थी उसकी एक हां सुनने को
लेकिन उसने इस कदर अलग किया था
खुद को मुझसे कि चाहकर भी
जकड़ ना पायी मैं उसे, खामोशी के साथ
आंखों में सारी रात गयी.
अहले सुबह जब मैंने खोला घर का दरवाजा
चांद को चमकते देखा आंगन में
एक उम्मीद सी जागी, लगा अभी बहुत कुछ है शेष
तभी फागुनी बयार ने हल्के से छुआ मुझे
जैसे दे गया हो किसी का संदेश
लेकिन मन को भरोसा ना हुआ
सुबह का अखबार हाथ में लिये
मैं चली आयी कमरे में
रोजमर्रा के काम तो निपटाती गयी मैं
लेकिन रात की खामोशी,
मन में वाचाल थी, जो अंदर से तोड़ रही थी मुझे
सुबह की पहली चाय की प्याली को उठा
ज्यों होंठों से लगाया, वो फीकी चाय
करा गयी मुझमें किसी की उपस्थिति
उस उपस्थिति को कस के जकड़ा मैंने
मन को समझाया, इंतजार कर सब ठीक होगा
मंजिल से दूर नहीं तू पास है बिलकुल
इस सकारात्मकता को मन में लिये
भारी कदमों से मैं चली थी आफिस की ओर
तभी मेरे फोन की घंटी कुछ यूं बजी
कि रात की खामोशी कलरव में बदल गयी
मन चहक उठा, नयन बरस गये
क्योंकि मजबूती के साथ खड़ी थी ‘जिंदगी’...
रजनीश आनंद
21-02-17
शनिवार, 18 फ़रवरी 2017
एक द्वंद्व सुबह-शाम
एक द्वंद्व सुबह -शाम,
चला मेरे मन में आज
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है?
आफिस की सीढ़यों को गिनते हुए
जब मैं पहुंची अपने कमरे तक
कई पुरानी यादें मेरीे मानसपटल पर छा गयीं
बचपन से आजतक टूटें कई सपने मेरे
टूटे हुए खिलौनों की कसक
अब भी हैै मन में बाकी
वे खिलौने पूछते हैं मुझसे
क्या जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं?
कंप्यूटर के की-बोर्ड को दिनभर खड़खड़ती मैं
खबरों को लिखती -सुधारती मैं
कहीं सदन में मारपीट, कहीं आतंकी हमला
किसी अभिनेत्री का यौन शोषण,
तो किसी नये खिलाड़ी का उद्भव
द्वंद्व फिर उभरा क्या जीवन में
कुछ भी स्थायी नहीं है?
बचपन की दहलीज लांघ
कुछ रिश्ते थे जोड़े मैंने
क्षण भर का साथ निभा पुख्ता कर गये
वे रिश्ते कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है
लोगों ने भी दिये सबूत,विश्वास दिलाया मुझे
लेकिन सारे दावों को नकारती
मैं खड़ी हूं अपने विश्वास के साथ कि
प्रेम स्थायी है और यह हमेशा रहेगा कायम
मेरे जीवन के बाद भी,
मेरे इस विश्वास को प्राप्त है
आशीष शिवालय का भी
खड़ी हूं तुम्हारे सामने मैं इस दावे के साथ
आजीवन कायम रहेगा
प्रेम मेरा और तुम्हारा
इस विश्वास को दिल में समेट
मैं चल पड़ी थी घर की ओर
दरवाजा जो मैंने खटखटाया
मेरी जिंदगी ने बांह पसार कर बुलाया
असमंजस में जो लिपट गयी सीने से उसके
धड़कनों की बेचैनी समझ
उसने पूछा क्या हुआ माँ?
सवाल पर उसके थिरक गयी
मुस्कान मेरे चेहरे पर
विश्वास हुआ मजबूत
जीवन में प्रेम हमेशा होता है स्थायी
तब ही तो वह बिन बोले
समझ लेता है दिल की बात
दिल ने मजबूती से कहा मुझसे
प्रेम मेरा-तुम्हारा सच्चा है, बाकी सब बेमानी...
रजनीश आनंद
18-02-17
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017
रेत की तरह फिसलती है जाती है जिंदगी...
मैं जितना सहेजना चाहती हूं
रेत की तरह फिसलती जाती है
मेरी हाथों से
ऐसा नहीं कि मुझे मोहब्बत नहीं जिंदगी से
लेकिन मुझसे हो जाती हैं कुछ गलतियां
भय और आशंका के बीच ऐसा महसूस होता है
मानो जिंदगी अनदेखी कर रही है मेरी
उपेक्षा की भावना घर कर जाती है
मैं जिंदगी को समझा नहीं पाती अपनी बातें
मैं चाहती हूं कि जिंदगी खुशनुमा हो
इस चाह में पकड़ना चाहती हूं
उसे प्रेम से
लेकिन उसे घुटन महसूस होती है
मैं तो बस उसके सीने से लगकर
कहना चाहती थी तुम साथ रहो मेरे
क्योंकि तुम बिन
सूरज की ऊष्मा नहीं होती महसूस
हवा की शीतलता, मन को नहीं देती शीतलता
जिंदगी का हर व्यंजन हो जाता है बेस्वाद
लेकिन शायद मेरा तरीका गलत है
तभी तो जिंदगी रूठ गयी है मुझसे
तो क्या दफन हो जायेंगे मेरे सारे ख्वाब
जो देखे हैं मैंने जिंदगी की आंखों में?
नहीं-नहीं ऐसा ना कर ‘ओ जिंदगी’!
गुजारिश है सुन लो मेरी बात
मैंने जो भी आरोप लगाये तुमपर
वह दुर्भावनावश नहीं हैं
बस इसके मूल में तुमसे प्रेम ही है
हां, लेकिन अब समझ गयी हूं मैं
जिंदगी को संवारने के लिए प्रेम काफी नहीं
कई और चीजें भी हैं, हुनर भी हैं
जो सिखा देगी जिंदगी मुझे...
रजनीश आनंद
18-02-17


