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बुधवार, 6 दिसंबर 2017

उम्मीदों का हाँर्लिक्स

जब गिलास में डालकर
दो चम्मच हाँर्लिक्स
मैं घोलती हूं तो
घोलती हूं जिंदगी में उम्मीदें
मैं दूध में नहींं, पानी में घोलती हूं
ताकि उम्मीदें खालिस रहें
उनपर ना पड़े कोई रंग
कभी -कभी अत्यधिक उम्मीदें भी
बन जाती हैं गले का फांस
इसलिए तो पारदर्शिता पसंद है
मुझे उम्मीदों की
वैसे भी औरतें कम में सुकून पा जाती हैं
पर औरतों की उम्मीदें सतही नहीं होती ं
एक गहरापन लिये होती हैं
मैंने तो कइयों को देखा
एक आलिंगन, एक चुंबन को
जीवन मान जीते
मै रोज घोलती हूं दो चम्मच हाँर्लिक्स
ताकि कभी तो रूमानियत के
एहसास के साथ, चाँकलेट फ्लेवर लिये
आओ तुम और मेरे जिह्वा पर धर दो
उम्मीदों की गरमाहट, जो घुल जाये बिलकुल
उम्मीदों का शहद बनकर....

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

रात की खामोशी...

रात की खामोशी में
प्रेम से  उस क्षण
साक्षात्कार होता है
जब पुकारते हो तुम
लेकर प्यार वाला नाम
भींग जाती हूं मैं तुममें
जैसे जमीन ओस से
हर सुबह घर के बागीचे से
सहेजती हूं बिखरे ओस
उस पल की याद में
जब सीने में तुम्हारी
दुबकी थी मैं और
प्रेम मुखरित था...

रजनीश आनंद
04-12-17

बुधवार, 22 नवंबर 2017

रेखाओं की नियति

सिर्फ लाभ-हानि का
गणित नहीं रिश्ते
यह मैंंने तब जाना जब
ब्रेकैट के ब्रेकैट तोड़कर भी
मैं सुलझा ना पायी
जीवन का सिंपलीफिकेशन
उलझा था जीवन
अंकगणित के खेल में
सहसा एक अनोखा फार्मूला
बन खींंच गये तुम मन में
एक रेखा की भांति
जो अनंत है दोनों छोर पर
हां , जानती हूं मैं
रेखाओं की नियति
नहीं है मिलन, पर
साथ रहने का सुकून है
और पतली दिखने वाली
रेखा की गहराई में है सिर्फ प्रेम...

रजनीश आनंद
22-11-17

शनिवार, 11 नवंबर 2017

स्वेटर

हो चुकी ठंड की शुरुआत
पंछी की भांति नीड़ की ओर
लौटते हुए शाम को महसूसा
जब टकराया एक सर्द झोंका
दिल ने कहा मुझसे सिकुड़े तुम
मन ने एक सपना बुना, क्यों ना
बुन लूं मैं तुम्हारे लिए एक स्वेटर
नीले रंग का, सफेद बाँर्डर वाला
सच बहुत फबेगा तुम पर
नीले आकाश की तरह तुम
ऊन के लच्छों से गोले
बनाते-बनाते प्रेम की ऊष्मा
बन गयी गरमाहट की वजह
सलाइयों पर चढ़ा फंदा
मैं बुनती हूं ख्वाब, तुम संग
कभी उलझ भी जाते हैं फंदे
तब सुलझाते वक्त देती हूं उलाहना
आंखें मटकाकर मैं, पर
डूब कर कभी देखो तो इनमें
उलाहनों में शिकायत नहींं, प्रेम है
फंदों पर फंदा चढ़ाती मैं
पूरा कर देती हूं मैं सपनों का स्वेटर
इस उम्मीद में कि तुम कहोगे कभी
प्रिये, बहुत सुंदर बुना यह स्वेटर
लाओ पहना दो मुझे...

रजनीश आनंद
11-11-17




शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

प्रेम की फुलकियां

ना तो मेहंदी रचाई
ना महावर लगाया
मैंने उसके नाम का
पर, यह सच है मेरे ईश्वर
हर सांस में उसका नाम लिया
और इतना जरूर किया
कि जब भी उसे चूम लेने
का दिल चाहा
उसकी बातों की सीढ़ी पर सवार मैं
आकाश में टंगे चांद को
दोनों हाथों से थाम, उतार लायी
भर कर उसे बांहों में
सुकून से खूब रोई भी
उसके सीने की सुगंध घुली है उसमें
अपने वक्ष के बीच रख चांद को
खूब बतियायी भी मैं
उसकी आंखों में है
वही चमक जो दिखती है
मेरे प्रिये की आंखों में
सहसा लगता है भूखा है वो
तो चूल्हे पर चढ़ा प्रेम का तवा
मैं बनाती हूं प्रेम की  फुलकियां
अपने हाथों से खिलाती भी हूं
प्रेम की रोटी चांद को
और चांद मुस्कुरा कर देखता है
बस उसकी चांदनी बिखरती जाती
और मुझे समेटती जाती है खुद में....

रजनीश आनंद
03-11-17

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

मैं रोती हूं तुम्हारे लिये...

मैं रोती हूं तुम्हारे लिये
पूरे तड़प के साथ
जब तुम नहींं आते
क्योंकि इंतजार में तुम्हारे
बिखेर कर रखा था
जुल्फों को,ताकि तुम
संवार दो इन्हें और
मेरे हाथों को थाम
कह दो, मैं हमेशा
संग तुम्हारे, लेकिन
जब बिखरे केश मैं
खुद से संवारती हूं
तब आंसू बरसते हैं
कानों में गूंजती है
तुम्हारी आवाज
समय पर बस नहीं तुम्हारा
वह तुम्हें भगा रहा
पर तुम आओगे जरूर
तब आंखें मींचकर
मैं खुद को भरोसा दिलाती हूं
हम साथ होंगे, तब हाथों में हाथ होगा
बस मौन और प्रेम संग होगा
तब आंंखों से लगातार बरसते हैं
आंसू, विरह के नहीं ,मिलन के रोमांच के
तभी तो तुम्हारे लिए
रोना भी खुशी से भरपूर होता है...

रजनीश आनंद
26-10-17

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

मैं तुम्हें याद नहीं करती

मैं तुम्हें याद नहीं करती
जीती हूं हर पल हर क्षण
जैसे नदी के किनारे नीर को
अंधियारा रात को
चांदनी चांद को.
तो यह सोच गमगीन
ना होना की तू
यादों में शामिल है मेरे
क्योंकि मैं याद नहीं करती तुम्हें
जीती हूं हर पल....
ए सुनो तुम्हें मैं बताऊं एक बात
अलसाई सुबह में कड़क चाय तुम
मुरझाये चेहरे पर गहरा चुंबन तुम
उदासी के पलों में मुस्कान तुम
बेबसी में एकमात्र सहारा तुम
क्योंंकि मैं याद नहीं करती तुम्हें
जीती हूं हर पल हर क्षण...

रजनीश आनंद
24-10-17

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

एहसासों की वो शाम...

तुम साथ नहीं आज
पर एहसासों की वो
शाम साथ है मेरे
जब मेरा सूखा मन
गीला हुआ था तुमसे
याद है वो रूमाल?
जिसमें पोंछा था हाथ
उसे यूं ही रखा है अबतक
तुम्हारी खुशबू के साथ
वो साड़ी भी सहेजा है
जिसके आंचल पर
जीवंत हैं अंगुलियां तुम्हारी
अपनी आंंखों में कैद किया
मुखड़ा तुम्हारा, ताकि
आंखों ही आंखों में दे दूं
बनावटी,प्रेमजड़ित उलाहना
तुम्हारी मुस्कान को होंठों से
सटाकर जज्ब किया है
अपने होंठों पर ताकि
वही, हां बिल्कुल वैसे ही
मुस्कान थिरके मेरे होठों पर
जानते हो तुम,यह तमाम
पूंजी हैं मेरी, और मैं सबसे
धनवान इस धरती पर...

रजनीश आनंद
21-10-17

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

इतराकर चलने को जी चाहता है...

ना आज चांदनी रात
ना मैं चौदहवीं का चांद
ना हाथों में हाथ किसी का
ना पैरों में सोने की पाजेब
फिर भी ना जानें क्यों
आज इतराकर चलने को
जी मचल रहा है ...
ना पीने की लत, ना पी रखी है
ना लगा सोलहवां साल
ना कसीदे पढ़ें किसी ने
ना छुटपन की सखी मिली
फिर भी ना जानें क्यों
आज इतराकर चलने को जी...
हां, एक बात हुई अनहोनी सी
असर उसका तो नहीं है?
हां, मेरी रूह तक पहुंचे तुम
कानों में घुली तुम्हारी हंसी
आंखों में बसा साथ तुम्हारा
तनमन में अपनापन तुम्हारा
तभी तो आज इतराकर
चलने को जी मचल रहा
और मैं बेफ्रिक तुम्हारी ऊर्जा से भरपूर
अमावस की रात को पूनम बनाती
बिना तुम्हारे, फिर भी साथ तुम्हारे
तुम से लिपटती तुममें सिमटती
तब तो आज इतराकर चलने को
जी मचल रहा मेरा हर पल हर दिन...

रजनीश आनंद
18-10-17

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

चुंबन का प्रति उत्तर

आकाश में जितने
तारे टिमटिमाते हैं
सब चुंबन हैं मेरे
जिन्हें उछाल फेंका है
मैंने तुम्हारे लिए
वो तुम तक पहुंचे या नहीं
यह सोच बेचैन होती हूं
रोती भी हूं घंटों
लेकिन सुबह जब
बागीचे की घास पर
बिखरी होती हैं ओस की बूंदें
तो लगता है जैसे
मिल गया हो चुंबन का प्रति उत्तर...

रजनीश आनंद
08-10-17

शनिवार, 9 सितंबर 2017

हंसी तुम्हारी सुंदर रंग...

चांदनी रात में
दूर पहाड़ी पर
अकेले बैठ तुम
बुनते हो सपना
भविष्य का मीठा
देखा मैंने आकाश
चादर को सजे
गुलाब, गेंदा,पलाश से
चमकीले मानों ऐसे
जैसे ध्रवतारा.
लेकिन मैं खिंचना
चाहती हूं खाका
हमारे भविष्य का
अहा! बताऊं प्रिये कैसे?
तुम्हारी पीठ होगी कैनवास
हंसी तुम्हारी सुंदर रंग
बातें तुम्हारी बनेंगी ' स्पार्कल'
मेरे होंठ बनेगे इंतज़ार
देखो ना प्रिये ,पीठ पर
तुम्हारे उतर आया है
चांदनी रात का आकाश...
रजनीश आनंद
09-14-17

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

आंसुओं का कटोरा

जब उस रात
नाराज हो तुम
चले गये थे झटक
दामन मेरा
मैं तकिये में मुंह
छिपा रोई नहीं
आंसुओं को कटोरे में
समेट उछाल दिया
आसमान की ओर
देखा मैंने
आंसुओं की हर बूंद
चिपक गयी सितारों से
और हर सितारे की चमक से
झड़ रहीं थीं तुम्हारी मीठी बातें
मैं भागकर गयी बाहर
और जमा किया
उन बातों को एक बाल्टी में
पूनम की रात थी
तुम नहीं पर चांद
मुस्कुराया मुझे देख
मैंने उसके सामने ही
बातों की बाल्टी से
एक-एक मग प्यार के
निकाल खुद को नहला
दिया उस मीठे जल से
चमक उठा मेरा बदन
क्योंकि लिपटा था
वह तुम्हारी मीठी बातों
के आलिंगन में सिर से पैर तक...

रजनीश आनंद
05-09-17



गुरुवार, 31 अगस्त 2017

मन इमरोज हुआ जाता है...

चाह तो बहुत थी, लेकिन
जिंदगी ने नहीं कराई
भेंट किसी इमरोज से
तो सहसा मन इमरोज
सा हुआ जाता है
जानती हूंं सहज नहीं
इमरोज  हो जाना
लेकिन अब मन बस में कहां
वो तो अमृता का हुआ
इसलिए मन इमरोज हुआ जाता है
तुम्हें मुझसे प्रेम ना सही
मुझे तो तुमसे है बेपनाह
तभी तो जब तुम करते हो
चर्चा मेरे सामने साहिर की
तो मन इमरोज हुआ जाता है
तुम रचते नहीं मेरे लिए प्रेमकविता
तो क्या फर्क मुझे इससे
तुम्हारी हर प्रेमकविता की
पहली पाठक मैं ही तो हूं
तभी तो मन इमरोज हुआ जाता है
जब सफलता गले लगाती तुम्हें
और चूम लेती है , पेशानी तुम्हारी
तो बेपरवाही से तुम हाथ खींचकर
मेरा कराते हो एहसास मुझे उस गरमाहट का
तब ना चाहते हुए भी मन इमरोज हुआ जाता है
आज हमारा साथ दो
इंसानों के देह का होगा
पर जब मैं जाऊंगी इस लोक से
मेरी कोख में पनप चुका होगा
हमारा रूहानी रिश्ता
इसलिए मन इमरोज हुआ जाता है...
रजनीश आनंद
31-08-17

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

अंगुलियों की थिरकन

निपटा तो रही थी मैं
प्रतिदिन के काम, पर
ना जाने कैसे की- बोर्ड
पर मेरी अंगुलियां थिरक गयीं
तुम्हारे नाम के साथ और फिर
हुआ क्या? मैं जान नहीं पायी
एक अजीब सी सिहरन
आंखों से होकर रूह तक
पसर गयी, रात की तरह नहींं,
अहले सुबह की तरह,
नयी उम्मीद के साथ
मैं जानती थी तुम नहीं,
सिर्फ एहसास है तुम्हारा
लेकिन इतनी जीवंतता, कि
जैसे मेरे होंठों ने पी लिया हो
प्रेमरस तुम्हारी उपस्थिति का...
रजनीश आनंद
29-08-17

रविवार, 20 अगस्त 2017

तरल हुआ तन-मन

जानते हो प्रिये
जब तुम्हारी आंखों में
झांकते हैं मेरे नयन
तो बेकल हृदय
आंखों में टंगें
प्रेम को देख
त्याज देना चाहता है
तन के सारे वस्त्र
और पहन लेना चाहता है
प्रेमवस्त्र तुम्हारा
जो बिलकुल मेरे नाप का
मालूम होता है,
मेरे कानों में रह-रह गूंजती है
तुम्हारी पुकार और
तन-बदन तरल हो
सिमट जाना चाहता है
तुममें बिलकुल तुम्हारी
जान की तरह...
रजनीश आनंद
20-08-17