रविवार, 27 नवंबर 2016

प्रेमवृक्ष

प्रेम में जायज है इंतजार
तबतक,जबतक प्रिये आकर
ना भर ले बांहों में
निसंदेह अधीर होता है मन
अश्रु भी बहते हैं,लेकिन
एकत्र कर आंसुओं को
मैंने सींचा है अपना प्रेमवृक्ष
देखो ना प्रिये ह लहलहा रहा है
कुछ दिन में फूल और फिर फल आयेंगे
फिर कोई चिड़िया आकर
अपना नीड़ बना जायेगी
इसे बूढ़ा बरगद होते देखना है हमें
और हां जब तुम आओगे ना
तो अपने प्रेम की वर्षा कर
भींगा जाना इसे ताकि
अमर हो जाये यह प्रेमवृक्ष
रजनीश आनंद
27-11-16

शनिवार, 26 नवंबर 2016

हर्षित है तन, पुलकित मन

तुम मेरे जीवन में
नयी शुरुआत
नहीं , तुम तो
मेरे तमाम सत्कर्मों का फल हो
तभी तो पाकर तुम्हें
सार्थक हुआ जीवन है
ओ प्रिये सुनो
हर्षित है मन
पुलकित तन
हृदय में मधुर पीड़ा
जी चाहता है
पंछी बन उड़ चलूं
जहां है देश तुम्हारा
नदी, पहाड़,पठार लांघ
पंख तब तक ना थकें
जब तक देख ना लूं तुम्हें
और फिर तुम्हारे बांहों की
गरमाहट हो मेरा ईनाम
और कुछ चाह तो शेष नहीं अब...
रजनीश आनंद
26-11-16

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

सपने...

जानते हो प्रिये
जब रसोई में मैं
रोटियों को गोलाई
में विस्तार देती हूं
तो भान होता है
जैसे अपने सपनों को
मूर्त रूप दे रही हूं
और तुम,मुझे
उस तवे की भांति लगते हो
जो मेरे सपनों को साकार करने
के लिए खुद आग की तपिश में
जल रहा है, मेरे सपनों को
स्वादिष्ट रोटी बनाने के लिए
यूं दिन-रात ना जलो प्रिय
कुछ मुझे भी मौका दो जलने का
क्योंकि प्रेम तो हमदोनों ने किया है
और यह सपना हमदोनों का है,है ना?
रजनीश आनंद
25-11-16

बुधवार, 23 नवंबर 2016

मैं तुम्हारी और तुम मेरे हो...

बहुत खराब हो तुम
मैं तुमसे तबतक ना बोलूंगी
जबतक तुम ना बोलो मुझसे
यह ठान मैं कर आयी तुमसे किनारा
सोचा, कुछ देर ले लेती हूं मीठी नींद
लेकिन पलकों को चूम जगा गये तुम
जागती आंखों में जो ख्वाब तैरे
उसमें तुम ही तुम थे
सोचा बाहर टहल लेती हूं
दरवाजे को खोला, तो सर्द हवा
टकराई मुझसे, जिसमें गरमाहट थी तुम्हारी
उस गरमाहट को ठुकरा मैं बैठ गयी
कागज काले करने, लेकिन ना जानें क्यों
तुम्हारे नाम के सिवा कुछ लिख ना पायी
खुद से हार कर जो मैंने बंद की आंखें
तो ढलक गये अश्रु, कहा दिल ने
तू किससे ना बोलने की जिद कर बैठी है
जिसके सांस लेने से आती है सांस तुझे
जिसकी उपस्थिति से होता है,
तुझे अपने अस्तित्व का एहसास
जिससे बोलकर है तेरे नयन वाचाल
अन्यथा हो जायेंगे मूक
सुनकर अपने दिल की बात
मैं भागकर समा गयी, तुम्हारी बांहों में
इस मिलन मेंं नयन जो बरसे, तो
मिट गये सारे शिकवे, एक ही बात शेष रही
कि मैं तुम्हारी और तुम मेरे हो...
रजनीश आनंद
23-11-16

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

प्रेम का गुल्लक

ए सुनो ना प्रिये,तुम्हें कुछ बताना है
मैं कुछ दिन पहले बाजार गयी थी
वहां एक मिट्टी के छोटे गुल्लक
पर टिक गयी मेरी नजरें
बिलकुल गोल, ना ओर ना छोर
हमारे प्रेम की भांति.
उसे देखते ही अजीब से आकर्षण हुआ
मैंने लपक लिया उसे ताकि
कोई और ना उठा ले उसे
बड़ा सुकून मिला उसे स्पर्श करके
मैं हर दिन उस गुल्लक में
अपने इंतजार का, तुम्हारे लिए अपने तड़प का
एक-एक सिक्का गिराती हूं
जब वो सिक्का गुल्लक की दीवारों से टकराता है
और फूटती है एक ध्वनि, तो प्रतीत होता है
मानो तुमने सुन ली मेरी बात
कल जब मैंने उसे हाथों में उठाया
तो गुल्लक के अंदर से आयी आवाज
सुनो प्रिये तुम अकेली नहीं तड़प रही
मैं भी तो तुम्हारे लिए तड़पता हूं
यकीन है मुझे जिस दिन यह गुल्लक पूरा भर जायेगा
उस दिन तुम आ जाओगे मेरे सामने और
कहोगे मुझसे आओ इंतजार को अभिसार में बदल दें.

रजनीश आनंद
22-11-16

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

क्योंकि एक उम्मीद काफी है जिंदगी के लिए...

क्या तुम्हारे होने का एहसास मात्र
मुझे जिंदगी को जी लेने के लिए प्रेरित करता है?
यह सवाल मेरे मन में कुलबुला रहा है
बेनूर ना सही, लेकिन नाउम्मीद सी
जरूर हो गयी थी जिंदगी
सुबह भी होती थी, शाम भी और रात भी
लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता
जैसी हो गयी थी मैं
होली भी आयी और दीवाली भी
पकवान भी बने बने और गुलाल भी उड़े
मैं मुस्कुराई भी और नये कपड़े भी पहने
लेकिन मुस्कान के पीछे छिपी
मेरी भींगी पलकों को किसी ने देखा नहीं
ना किसी ने मेरी मुस्कान देख कहा
यूं ही बनाये रखना इसे
ना किसी ने यह कहा
कि नीला रंग तुम पर बहुत फबता है
लेकिन अचानक जीवन के एक मोड़ पर मिले तुम
पता नहीं क्यों और कैसे मैं जुड़ती गयी तुमसे
मेरी जिंदगी में एक उम्मीद बनकर आये तुम
और मैंने ये जाना कि
एक उम्मीद काफी है जिंदगी जीने के लिए
रजनीश आनंद
18-11-16

बुधवार, 16 नवंबर 2016

मैं बन जाना चाहती हूं ...

प्रिये मन में है एक बात
बेसब्र हूं, तुमसे कहने को
ज्ञात है मुझे, सीमित है
हमदोनों के प्रारब्ध में मिलन
लेकिन कोई दुख नहीं
मैं हर दिन, हर पल
तुम्हारे लिए जीना चाहती हूं
इसलिए तो मैं बन जाना चाहती हूं,
सूर्योदय की लालिमा
ताकि अहले सुबह, जब जागो तुम
बसा लो उसके अनुपम सौंदर्य को अपनी आंखों में
मैं बन जाना चाहती हूं,
सरदी की धूप
जिसका ताप तुम्हें सुकून दे
तुमको कर दे ऊर्जा से ओतप्रोत
मैं बन जाना चाहती हूं
शीतल मंद वसंती हवा
ताकि जब बहाव हो मेरा, तो चूम लूं
तुम्हारे तन को और
तुम्हें हो मेरे आसपास होने का एहसास
मैं बन जाना चाहती हूं
तुम्हारे बागीचे की फूल
जिसे तुम प्रेमवश कभी-कभी दे दो अपना स्पर्शसुख
मैं बन जाना चाहती हूं
तुम्हारे आंगन की तुलसी
जिसे तुम मान दो और
मैं बनाया जाऊं तुम्हारे लिए शुभकारी
मैं बन जाता चाहती हूं
तुम्हारे आंगन की प्यारी गोरैया
जिसका आंगन में फुदकना, तुम्हें प्रिय हो
और जिसके घोंसले और अंडे को
तुम सहेजकर रखते हो
मैं बन जाना चाहती हूं,
चांद की नहीं, तुम्हारी चांदनी
जिसकी दूधिया रौशनी तुम्हारे मार्ग के हर तिमिर को दूर करे
और तुम सच कर सको अपने हर सपने को

रजनीश आनंद
17-11-16