ये क्या हुआ मुझे प्रिये?
क्यों चांद इशारे करता है
क्यों बादल लिपटना चाहता है
क्यों पवन चूमकर जाता है
क्यों पुष्प सजाना चाहता है
ये क्या हुआ मुझे प्रिये
क्यों चांदनी छेड़ कर है
क्यों बिजली सिहरन बन जाती है
क्यों हवा मदहोश हुई जाती है
क्यों कली देख शरमाती है
ये क्या हुआ मुझे प्रिये
क्यों आईना देख लजाती हूं
क्यों चेहरा मेरा दमकता है
क्यों बिन बोले कुछ सुन लेती हूं
क्यों किसी की चाह में तड़पती हूं
ये क्या हुआ मुझे?
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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016
क्यों चांद इशारे करता है...
सोमवार, 28 नवंबर 2016
सपने तो मैं देखूंगी...
ये क्या है जो मेरे सीने में
धंस सा गया है
तिल-तिल रिसता है दर्द
मेरे आंखों से अश्रु बनकर
जब भी देखती हूं
नर-मादा जोड़ियों को
घोंसले के लिए बिनते तिनका
होता है अहसास एक अधूरेपन का
बिन घोंसले के होने का
कोशिश तो मैंने भी की थी
तिनका -तिनका बीनकर
नीड़ के निर्माण की
लेकिन बिखर गया सबकुछ
और कहा गया मुझसे नहीं है मुझे
सपने देखने की आजादी
नहीं मिली रोने की भी इजाजत
तो ठहाकों में बदल दिया
मैंने अपने आंसुओं को
और किया निर्णय सपने
तो मैं देखूंगी, सच भी करूंगी.
रजनीश आनंद
28-11-16
धंस सा गया है
तिल-तिल रिसता है दर्द
मेरे आंखों से अश्रु बनकर
जब भी देखती हूं
नर-मादा जोड़ियों को
घोंसले के लिए बिनते तिनका
होता है अहसास एक अधूरेपन का
बिन घोंसले के होने का
कोशिश तो मैंने भी की थी
तिनका -तिनका बीनकर
नीड़ के निर्माण की
लेकिन बिखर गया सबकुछ
और कहा गया मुझसे नहीं है मुझे
सपने देखने की आजादी
नहीं मिली रोने की भी इजाजत
तो ठहाकों में बदल दिया
मैंने अपने आंसुओं को
और किया निर्णय सपने
तो मैं देखूंगी, सच भी करूंगी.
रजनीश आनंद
28-11-16
शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
क्योंकि एक उम्मीद काफी है जिंदगी के लिए...
क्या तुम्हारे होने का एहसास मात्र
मुझे जिंदगी को जी लेने के लिए प्रेरित करता है?
यह सवाल मेरे मन में कुलबुला रहा है
बेनूर ना सही, लेकिन नाउम्मीद सी
जरूर हो गयी थी जिंदगी
सुबह भी होती थी, शाम भी और रात भी
लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता
जैसी हो गयी थी मैं
होली भी आयी और दीवाली भी
पकवान भी बने बने और गुलाल भी उड़े
मैं मुस्कुराई भी और नये कपड़े भी पहने
लेकिन मुस्कान के पीछे छिपी
मेरी भींगी पलकों को किसी ने देखा नहीं
ना किसी ने मेरी मुस्कान देख कहा
यूं ही बनाये रखना इसे
ना किसी ने यह कहा
कि नीला रंग तुम पर बहुत फबता है
लेकिन अचानक जीवन के एक मोड़ पर मिले तुम
पता नहीं क्यों और कैसे मैं जुड़ती गयी तुमसे
मेरी जिंदगी में एक उम्मीद बनकर आये तुम
और मैंने ये जाना कि
एक उम्मीद काफी है जिंदगी जीने के लिए
रजनीश आनंद
18-11-16
मुझे जिंदगी को जी लेने के लिए प्रेरित करता है?
यह सवाल मेरे मन में कुलबुला रहा है
बेनूर ना सही, लेकिन नाउम्मीद सी
जरूर हो गयी थी जिंदगी
सुबह भी होती थी, शाम भी और रात भी
लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता
जैसी हो गयी थी मैं
होली भी आयी और दीवाली भी
पकवान भी बने बने और गुलाल भी उड़े
मैं मुस्कुराई भी और नये कपड़े भी पहने
लेकिन मुस्कान के पीछे छिपी
मेरी भींगी पलकों को किसी ने देखा नहीं
ना किसी ने मेरी मुस्कान देख कहा
यूं ही बनाये रखना इसे
ना किसी ने यह कहा
कि नीला रंग तुम पर बहुत फबता है
लेकिन अचानक जीवन के एक मोड़ पर मिले तुम
पता नहीं क्यों और कैसे मैं जुड़ती गयी तुमसे
मेरी जिंदगी में एक उम्मीद बनकर आये तुम
और मैंने ये जाना कि
एक उम्मीद काफी है जिंदगी जीने के लिए
रजनीश आनंद
18-11-16
गुरुवार, 10 नवंबर 2016
...तुम पलाश के फूल
मैं हरी घास की चादर
और तुम पलाश के फूल
जब बिछते हो तुम मुझपर
अनुपम होता है सौंदर्य
हरा और सुर्ख लाल
ऐसे खपते हैं दोनों
एक दूसरे में जैसे चुंबक के दोनों ध्रुव
सोचती हूं किस मोड़ पर आ गयी जिंदगी
कुछ समय पहले तक
अनजान थे बिलकुल हम
लेकिन अब आती है हर
सांस लेकर तुम्हारा नाम
तुम बिन कैसे होंगे दिन-रात
इसकी कल्पना मुझसे नहीं संभव
सुनो तुम प्रिये, ये चाह है मेरी
जब आओ तुम बनकर प्रेममेघ
मैं बन जाऊं तपती धरती
समेट लूं हर बूंद
तुम्हारे प्रेम का
क्योंकि हर बूंद है अनमोल मोती
रजनीश आनंद
10-11-16
और तुम पलाश के फूल
जब बिछते हो तुम मुझपर
अनुपम होता है सौंदर्य
हरा और सुर्ख लाल
ऐसे खपते हैं दोनों
एक दूसरे में जैसे चुंबक के दोनों ध्रुव
सोचती हूं किस मोड़ पर आ गयी जिंदगी
कुछ समय पहले तक
अनजान थे बिलकुल हम
लेकिन अब आती है हर
सांस लेकर तुम्हारा नाम
तुम बिन कैसे होंगे दिन-रात
इसकी कल्पना मुझसे नहीं संभव
सुनो तुम प्रिये, ये चाह है मेरी
जब आओ तुम बनकर प्रेममेघ
मैं बन जाऊं तपती धरती
समेट लूं हर बूंद
तुम्हारे प्रेम का
क्योंकि हर बूंद है अनमोल मोती
रजनीश आनंद
10-11-16
मंगलवार, 8 नवंबर 2016
वो बंधन...
जीवन के सफर में मैं और तुम
चले तो थे प्रेमी -हमसफर बनकर
लेकिन, कुछ ही समय में
प्रेम कहीं खो गया और
हावी हुआ स्वार्थ, रिश्तों पर
अहसास हुआ मुझे
खोखला है हमारा रिश्ता
जहां प्रेम तुम्हारे लिए
महज किताबी बातें थीं
कोई मोल नहीं था तुम्हारे लिए
मेरी भावनाओं का
तुम यह बात कभी नहीं समझ पाये
प्रेम सबकुछ सहता है
किंतु उपेक्षा नहीं
आखिर मैं कबतक उपेक्षित रहती
कबतक अपने स्वाभिमान को अपमानित करती
यह सोच मैं ज्यों गयी तोड़ने उस बंधन को
जिसने बांध रखा था मुझे तुमसे
मैंने देखा तुम तो कब के तोड़ गये थे
वो बंधन!!!
मैं तो महज लाश ढो रही थी रिश्तों की...
रजनीश आनंद
08-11-16
चले तो थे प्रेमी -हमसफर बनकर
लेकिन, कुछ ही समय में
प्रेम कहीं खो गया और
हावी हुआ स्वार्थ, रिश्तों पर
अहसास हुआ मुझे
खोखला है हमारा रिश्ता
जहां प्रेम तुम्हारे लिए
महज किताबी बातें थीं
कोई मोल नहीं था तुम्हारे लिए
मेरी भावनाओं का
तुम यह बात कभी नहीं समझ पाये
प्रेम सबकुछ सहता है
किंतु उपेक्षा नहीं
आखिर मैं कबतक उपेक्षित रहती
कबतक अपने स्वाभिमान को अपमानित करती
यह सोच मैं ज्यों गयी तोड़ने उस बंधन को
जिसने बांध रखा था मुझे तुमसे
मैंने देखा तुम तो कब के तोड़ गये थे
वो बंधन!!!
मैं तो महज लाश ढो रही थी रिश्तों की...
रजनीश आनंद
08-11-16
मंगलवार, 1 नवंबर 2016
तुम्हारी इच्छा और मैं...
तुम्हें यह झूठप्रतीत हो सकता है
पर
सच कहती हूं मैं
मेरी हर इच्छा
तुमसे जुड़ी है
क्या तुम्हें भी कभी
ऐसा महसूस हुआ है?
जानते हो प्रिये जब
स्नान के बाद मैं
कपड़े पहनना चाहती हूं
तो
सहसा उस रंग के कपड़े तक
मेरे हाथ चले जाते हैं
जो तुम्हें प्रिय है
जब खुद को संवारने
आइने के सम्मुख होती हूं
तो वह सब कर बैठती हूं
जो है तुम्हारी पसंद
माथे पर लाल बिंदी
मैं बरबस लगा लेती हूं
क्यों?मुझे पता नहीं
पूरा दिन तुमसे बात करती हूं
समझना चाहती हूं तुम्हें
तुम्हारी पसंद-नापसंद
लेकिन आसान नहीं है
तुम्हें पढ़ पाना
क्योंकि विस्तृत है तुम्हारा व्यक्तित्व
फिर भी मैं इतना कह सकती हूं
बहुत प्रेम है तुमसे
बाकी चीजें मैं नहीं समझ पाती
रात नींद तो आती है
पर जागती रहती हूं मैं
यह सोच कि कब तुम्हें
मेरी चाह हो
और
तुम मुझसे कहो
आओ प्रिय उदात्त प्रेम के
सागर में हम डूब जायें
तब मैं समर्पित कर दूं
खुद को तुम्हारे लिए
गहरे प्रेम के उस क्षण में
मैं गहरी आवाज में
जो तुम्हें प्रिय है
सिर्फ लेना चाहती हूं
मैं तुम्हारा नाम
उस पल जब चंचल हो
तुम्हारा स्पर्श और
मादक हो हर ध्वनि
मैं बन जाना चाहती हूं
तुम्हारी इच्छा
और जी लेना चाहती हूं
तुम्हारे लिए बस
तुम्हारे लिए...
रजनीश आनंद
02-011-16
रविवार, 30 अक्टूबर 2016
रिसता दर्द
तुमने कभी सोचा प्रिये?
क्या बितती है मुझपर
तुम्हारी चाह में
हर पल रिसता है
एक दर्द सीने में
मैं वर्णन नहीं कर सकती
उस एहसास का
देखो मेरी आंखों में
तुम्हें स्पष्ट दिखेगी
असीमित इंतजार की तड़प
और
जब तुम कसते हो
मुझे बांहों में तब,
जब वायु का प्रवेश भी
हो जाता है निषेध
मुझे मिलती है प्राणवायु
असीम ऊर्जा से परिपूर्ण
और मैं अपने अधरों से
लिख देती हूं तुम्हारे वक्ष पर
हमारी प्रेमकथा
और जब तुम अपनी अंगुलियां
फेरते हो मेरे केशों में तो
मैं जकड़ती जाती हूं तुम्हें
ताकि एक हो जायें हम
थोड़ी क्रूर होती पकड़
लेकिन सुखद
जब बेसुध सी हो जाती हूं मैं
तब अहसास होता है
मेरा जिस्म मेरा नहीं
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी चाह है
जिसका हर रिसता दर्द
मिटता है तुम्हारी बांहों में आकर
क्या बितती है मुझपर
तुम्हारी चाह में
हर पल रिसता है
एक दर्द सीने में
मैं वर्णन नहीं कर सकती
उस एहसास का
देखो मेरी आंखों में
तुम्हें स्पष्ट दिखेगी
असीमित इंतजार की तड़प
और
जब तुम कसते हो
मुझे बांहों में तब,
जब वायु का प्रवेश भी
हो जाता है निषेध
मुझे मिलती है प्राणवायु
असीम ऊर्जा से परिपूर्ण
और मैं अपने अधरों से
लिख देती हूं तुम्हारे वक्ष पर
हमारी प्रेमकथा
और जब तुम अपनी अंगुलियां
फेरते हो मेरे केशों में तो
मैं जकड़ती जाती हूं तुम्हें
ताकि एक हो जायें हम
थोड़ी क्रूर होती पकड़
लेकिन सुखद
जब बेसुध सी हो जाती हूं मैं
तब अहसास होता है
मेरा जिस्म मेरा नहीं
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी चाह है
जिसका हर रिसता दर्द
मिटता है तुम्हारी बांहों में आकर
रजनीश आनंद
31-10-16
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
संजीवनी बूटी
सच बताना, संकोच ना करना
वैसे तुमसे एक मन की बात कहूं?
मुझे ऐसा प्रतीत होता है
कि मैं बेसब्र हूं
जब तुम नहीं बोलते ना मुझसे
और मैं निराश हो जाती हूं
कभी-कभी छलक जाते हैं नयन
और कभी तो क्रोध आ जाता है
कभी सोचती हूं, रूठ जाऊं
ना करूं तुमसे कोई बात
यह संकल्प कर ज्योंही बैठती हूं
तुम सामने आते हो और
कहते हो क्या नहीं बोलोगी मुझसे
बस, टूट जाती सारी प्रतिज्ञा
और मैं फिर करने लगती हूं बकबक
क्या करूं मैं, जो मन मानता नहीं
तभी ध्यान आता है मुझे मीरा का
कितना धैर्य था उस स्त्री में
जिसने आजीवन बुतपरस्ती की
सोचो तो, क्या उसका श्याम
उससे नहीं बोलता होगा?
मुझे तो पूरा यकीन है
वो बोलता होगा, यह बात दीगर है
कि सुना सिर्फ मीरा ने
वैसे जरूरत भी क्या थी
किसी और को सुनने की
मैं भी तो तुम्हारी मीरा हूं
मेरा भी मन करता है
कि मैं करूं तुम्हारा श्रृंगार
तुम्हारे लिए बनाऊं पकवान
और जब तुम खाओ
तो तुम्हें निहारती रहूं, बड़ा सुख मिलेगा
ए सुनो ना एक बार
चाहे तो ना देना जवाब
पर मैं कहना चाहती हूं
बस एक बार कह दो ना
तुम्हें मुझसे है प्रेम
क्योंकि यही एक शब्द है
जो संजीवनी बूटी है, मेरे जीवन की
रजनीश आनंद
26-10-16
कैसे बचा पाऊंगी मैं ...
मृत्यु पर शोक
जन्म पर खुशी
यही विधान है
लेकिन उस दिन
उल्टी गंगा क्यों बही?
एक अबोध के आगमन पर
जब देने गयी बधाई
तो पसरा था सन्नाटा
खुशी की कोई पहचान
नहीं थी उपस्थित वहां
हां हल्की सी सिसकी थी मौजूद
आशंका से घिर गया मन
कोई अनिष्ट तो....
नहीं-नहीं मैंने
खुद को हिम्मत बंधायी
और पहुंची उस माता के सम्मुख
जिसकी गोद में थी
जीवन की नयी आस
मुस्कुराती, इस दुनिया को
उम्मीद से निहारती
मासूम का प्यारा चेहरा देख
पूछ बैठी मैं उसकी मां से
इतना सुंदर वरदान मिला
फिर भी क्यों है
तेरी पलकें भींगी
खुश हो कि तुमने
अद्भुत सृजन किया
गर्व करो खुद पर
अब तू सिर्फ औरत नहीं मां है
फफक पड़ी वो मां
कलेजे से बच्ची को लगा
कहा, हां मां हूं
इसलिए पलकें हैं भींगी
क्यों जना मैंने एक लड़की
मिले घर वालों के ताने
कहीं कोई खुशी नहीं
सोचती हूं ज्यों-ज्यों
इसकी उम्र बढ़ेगी, बढ़ेंगी इसकी मुश्किलें
क्योंकर मैं बचा पाऊंगी
अपनी लाडो को
इस दूषित समाज से
क्या इसे भी मिलेंगे
बेटी जनने पर ताने?
रजनीश आनंद
25-10-16
जन्म पर खुशी
यही विधान है
लेकिन उस दिन
उल्टी गंगा क्यों बही?
एक अबोध के आगमन पर
जब देने गयी बधाई
तो पसरा था सन्नाटा
खुशी की कोई पहचान
नहीं थी उपस्थित वहां
हां हल्की सी सिसकी थी मौजूद
आशंका से घिर गया मन
कोई अनिष्ट तो....
नहीं-नहीं मैंने
खुद को हिम्मत बंधायी
और पहुंची उस माता के सम्मुख
जिसकी गोद में थी
जीवन की नयी आस
मुस्कुराती, इस दुनिया को
उम्मीद से निहारती
मासूम का प्यारा चेहरा देख
पूछ बैठी मैं उसकी मां से
इतना सुंदर वरदान मिला
फिर भी क्यों है
तेरी पलकें भींगी
खुश हो कि तुमने
अद्भुत सृजन किया
गर्व करो खुद पर
अब तू सिर्फ औरत नहीं मां है
फफक पड़ी वो मां
कलेजे से बच्ची को लगा
कहा, हां मां हूं
इसलिए पलकें हैं भींगी
क्यों जना मैंने एक लड़की
मिले घर वालों के ताने
कहीं कोई खुशी नहीं
सोचती हूं ज्यों-ज्यों
इसकी उम्र बढ़ेगी, बढ़ेंगी इसकी मुश्किलें
क्योंकर मैं बचा पाऊंगी
अपनी लाडो को
इस दूषित समाज से
क्या इसे भी मिलेंगे
बेटी जनने पर ताने?
रजनीश आनंद
25-10-16
गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016
मौन...
कुछ रिश्तों की किस्मत
मौन में सिमट जाती है
हावी हो जाता है
हर भावना पर मौन
शेष कुछ नहीं रहता
तब उठते हैं कुछ सवाल
मन में शिद्दत से
जो खिलखिलाहट थी कभी
क्या वो बनावटी थी?
शायद हां, वरना तो
रिसते जख्मों से भी
आह निकलती है
फिर क्यों हम बुनते हैं
ऐसे रिश्ते जिसमें
ना तो ‘आह’ है ना ‘अहा’!
है तो सिर्फ और सिर्फ
मौन, मौन और मौन
रजनीश आनंद
20-10-16
मौन में सिमट जाती है
हावी हो जाता है
हर भावना पर मौन
शेष कुछ नहीं रहता
तब उठते हैं कुछ सवाल
मन में शिद्दत से
जो खिलखिलाहट थी कभी
क्या वो बनावटी थी?
शायद हां, वरना तो
रिसते जख्मों से भी
आह निकलती है
फिर क्यों हम बुनते हैं
ऐसे रिश्ते जिसमें
ना तो ‘आह’ है ना ‘अहा’!
है तो सिर्फ और सिर्फ
मौन, मौन और मौन
रजनीश आनंद
20-10-16
जो एक बार कह दो तुम...
तुम और मैं, बनें हम
ना तो सात वचन
ना अग्नि के फेरे
ना साक्षी समाज
ना कोई मंत्रोच्चार
लेकिन है विश्वास
साथ हैं हम.
जब आती है सांस
तन में लेकर तुम्हारा नाम
खिल उठता है मन
अंतस से आती है आवाज
तुम्हारी हूं मैं
सात जन्मों तक
साथ रहे ना रहे
पर इतने का है वादा
जब भरूंगी अंतिम सांस
लेकर तुम्हारा नाम
पास हो या दूर तुम
भींग जायेंगी पलकें तुम्हारी
इतना है प्रेम मेरे मन में
लाख रोकती हूं
रूकता नहीं सैलाब
बहते हैं आंसू मेरे दृग से
बस इतना है प्रेम निवेदन
इंतजार की रात,
चाहे कितनी भी हो लंबी
मेरी आंखें बंद होने से पहले
मस्तक को चूम मेरे
कह देना तुम एक बार
तुम्हारा हूं मैं....
रजनीश आनंद
20-10-16
सोमवार, 17 अक्टूबर 2016
सच कर दो मेरा ये सपना...
आधी रात को अचानक
कोई चूमकर मस्तक
जगा देता है मुझे
अंधेरे में चेहरा तो नहीं देख पाती मै
लेकिन प्रतीत होता है
मानो तुम आसपास हो
जानती हूं मैं यह भ्रम है
किंतु करूं क्या मैं
ये तो बता दो?
क्या कर दिया तुमने मुझे?
ज्ञात नहीं, बस इतना मालूम है
कि
अब खुद पर बस नहीं रहा
सीने में एक हूक सी उठती है
चाह होती है थाम कर तुम्हें
जी भर कर रो लूं
खुश हूं मैं, तुम्हारे होने का अहसास है
देखो ना तुम तो नहीं यह अंधेरा ही मुझे
जकड़ लेना चाहता है
अपने बाहुपाश में
और कसती जाती है पकड़
अंकित कर देता है ये
मुझपर तुम्हारे निशान
इस प्रेम आबद्ध के साथ
मैं जीना चाहती हूं
वो सब पाना चाहती हूं
जिसका किया है तुमने वादा
सही है कि तुम्हारे बांहों का घेरा आभासी है
लेकिन इतना सुकून देता है
कि तुम्हारी हो गयी हूं मैं
और इस हक से अनुरोध है तुमसे
कि
सच कर दो ना मेरा ये सपना....
रजनीश आनंद
17-10-16
कोई चूमकर मस्तक
जगा देता है मुझे
अंधेरे में चेहरा तो नहीं देख पाती मै
लेकिन प्रतीत होता है
मानो तुम आसपास हो
जानती हूं मैं यह भ्रम है
किंतु करूं क्या मैं
ये तो बता दो?
क्या कर दिया तुमने मुझे?
ज्ञात नहीं, बस इतना मालूम है
कि
अब खुद पर बस नहीं रहा
सीने में एक हूक सी उठती है
चाह होती है थाम कर तुम्हें
जी भर कर रो लूं
खुश हूं मैं, तुम्हारे होने का अहसास है
देखो ना तुम तो नहीं यह अंधेरा ही मुझे
जकड़ लेना चाहता है
अपने बाहुपाश में
और कसती जाती है पकड़
अंकित कर देता है ये
मुझपर तुम्हारे निशान
इस प्रेम आबद्ध के साथ
मैं जीना चाहती हूं
वो सब पाना चाहती हूं
जिसका किया है तुमने वादा
सही है कि तुम्हारे बांहों का घेरा आभासी है
लेकिन इतना सुकून देता है
कि तुम्हारी हो गयी हूं मैं
और इस हक से अनुरोध है तुमसे
कि
सच कर दो ना मेरा ये सपना....
रजनीश आनंद
17-10-16
शनिवार, 15 अक्टूबर 2016
...क्योंकि मुझे जिद है तुम्हारी हो जाने की
हृदय में उठती है
यह कैसी टीस प्रिय
कि सुनकर नाम तुम्हारा
छलक उठते हैं नयन
मैं खुद भी नहीं समझ पाती
कि चलते-चलते साथ तुम्हारे
ये कहां आ गयी मैं
कहना तो बहुत कुछ चाहता है मन
पर इससे ज्यादा नहीं कह पाता
कि
तुम्हारी हूं मैं
जब तुम कहते हो
बताओ अपना हाल प्रिये
तो चाह होती है
कह दूं वह सबकुछ
जो छिपाकर रखा है तुमसे
कैसे बताऊं कि इंतजार में तुम्हारे
मैंने अपने आंचल में छिपा रखा है
तुम्हारे प्रेम मोती को
इस धवल प्रेम की ज्योति को
मानकर साक्षी मैंने
कर दिया खुद को तुम्हारे हवाले
तुम जो दो, जितना दो
सब स्वीकार्य
लेकिन कभी थामकर
देखना मेरे आंचल को
सिर्फ तुम्हारे प्रेम की खुशबू ही मिलेगी
चाह होती है महसूस कर लूं
तुम्हारे बांहों की गरमाहट को
ताकि घेरे में उसके पिघल जाये
मेरा पृथक अस्तित्व, सिर्फ तुम ही तुम रहो
क्योंकि मुझे जिद है तुम्हारी हो जाने की
रजनीश आनंद
15-10-16
यह कैसी टीस प्रिय
कि सुनकर नाम तुम्हारा
छलक उठते हैं नयन
मैं खुद भी नहीं समझ पाती
कि चलते-चलते साथ तुम्हारे
ये कहां आ गयी मैं
कहना तो बहुत कुछ चाहता है मन
पर इससे ज्यादा नहीं कह पाता
कि
तुम्हारी हूं मैं
जब तुम कहते हो
बताओ अपना हाल प्रिये
तो चाह होती है
कह दूं वह सबकुछ
जो छिपाकर रखा है तुमसे
कैसे बताऊं कि इंतजार में तुम्हारे
मैंने अपने आंचल में छिपा रखा है
तुम्हारे प्रेम मोती को
इस धवल प्रेम की ज्योति को
मानकर साक्षी मैंने
कर दिया खुद को तुम्हारे हवाले
तुम जो दो, जितना दो
सब स्वीकार्य
लेकिन कभी थामकर
देखना मेरे आंचल को
सिर्फ तुम्हारे प्रेम की खुशबू ही मिलेगी
चाह होती है महसूस कर लूं
तुम्हारे बांहों की गरमाहट को
ताकि घेरे में उसके पिघल जाये
मेरा पृथक अस्तित्व, सिर्फ तुम ही तुम रहो
क्योंकि मुझे जिद है तुम्हारी हो जाने की
रजनीश आनंद
15-10-16
गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016
बिना प्रेम समर्पण कैसा?
मैं एक औरत हूं,कठपुतली नहीं
भावनाओं-संवेदनाओं से परिपूर्ण
जिंदगी की जीने की चाह भी है भरपूर
गलत को गलत और सही को सही
कहने का माद्दा भी रखती हूं
फिर क्यों लोग, मुझे बेबस मानते हैं
इज्जत का जामा मुझे पहना
त्याग बलिदान की उम्मीद करते हैं
हमेशा मैं ही क्यों त्याग करूं
मुझे नहीं कहलाना है, सीता-सावित्री
ना अहिल्या ना तुलसी
हर बार छली जाती हूं मैं
नहीं चाहती कोई आदर्श स्थापित करना
अगर अपनी खुशियों को तलाश जीना
चारित्रिक दोष है, तो ठीक है
मैं चरित्रहीन ही सही
पर जीने तो दो मुझे
मैं किसी का अहित नहीं चाहती
ना मांग रही कोई राज्य सिंहासन
बस जीना चाहती हूं,अपनी मरजी से
मैं क्यों करूं अपना शरीर उसे समर्पित
जिससे मुझे नहीं है प्रेम
मेरे शरीर पर तो मेरा अधिकार रहने दो
अगर मैं इतनी बदनसीब हूं
कि
नहीं मिलेगा मुझे कोई प्रेम करने वाला
तो यही सही, लेकिन बिना प्रेम समर्पण कैसा?
रजनीश आनंद
13-10-16
भावनाओं-संवेदनाओं से परिपूर्ण
जिंदगी की जीने की चाह भी है भरपूर
गलत को गलत और सही को सही
कहने का माद्दा भी रखती हूं
फिर क्यों लोग, मुझे बेबस मानते हैं
इज्जत का जामा मुझे पहना
त्याग बलिदान की उम्मीद करते हैं
हमेशा मैं ही क्यों त्याग करूं
मुझे नहीं कहलाना है, सीता-सावित्री
ना अहिल्या ना तुलसी
हर बार छली जाती हूं मैं
नहीं चाहती कोई आदर्श स्थापित करना
अगर अपनी खुशियों को तलाश जीना
चारित्रिक दोष है, तो ठीक है
मैं चरित्रहीन ही सही
पर जीने तो दो मुझे
मैं किसी का अहित नहीं चाहती
ना मांग रही कोई राज्य सिंहासन
बस जीना चाहती हूं,अपनी मरजी से
मैं क्यों करूं अपना शरीर उसे समर्पित
जिससे मुझे नहीं है प्रेम
मेरे शरीर पर तो मेरा अधिकार रहने दो
अगर मैं इतनी बदनसीब हूं
कि
नहीं मिलेगा मुझे कोई प्रेम करने वाला
तो यही सही, लेकिन बिना प्रेम समर्पण कैसा?
रजनीश आनंद
13-10-16
बुधवार, 12 अक्टूबर 2016
...क्योंकि निरर्थक है किसी से तुम्हारी तुलना
आज मन में उठा यह सवाल तुम मुझे
कितना और किसकी तरह प्रिय हो?
देखा जो चांद को, फीका लगा वो
तुम्हारे सामने, मैंने कहा उससे
नहीं, तुममें नहीं वो बात
जो है मेरे प्रिये में
चांद गुर्राया, कहा
ऐसी क्या बात है उसमें
जो मुझमें नहीं
उसकी नजरों का जादू
नहीं है तुम्हारे पास
तभी मेरी नजर गयी
नीले विस्तृत आकाश की ओर
सुंदर, अति सुंदर, किंतु
इस विस्तृत आकाश में वो बात नहीं
वो विस्तार नहीं, जो मेरे प्रिये के प्रेम में है
तभी आकाश में छाये काले बादल ने
मुस्कुरा कर कहा, मेरे बारे में
क्या है तुम्हारी राय?
मैंने कहा, मोहक, मादक
किंतु, मेरे प्रिये की मोहकता और मादकता
तो अद्भुत है, तुम में वो बात नहीं
जब देखती हूं उसे तो नेत्र थकते नहीं
भान होता है, अभी तो कुछ देखा नहीं
नशा तो उसके प्रेम में इतना है
कि
बिना स्पर्श के भी मुझे कर देता है मदहोश
महसूस होती है उसकी उपस्थिति
तभी एहसास हुआ निरर्थक है किसी से तुम्हारी तुलना
क्योंकि कोई मुझे तुम सा लगता नहीं
कितना है प्रेम तुमसे प्रिये
ये तो नहीं ज्ञात मुझे
लेकिन मेरी हर सांस पर अंकित है तुम्हारी छाप
अनमोल हो तुम मेरे लिए,
जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता मेरे जीवन में
क्योंकि मुझे है तुमसे असीम और अथाह प्रेम
रजनीश आनंद
12-10-16
कितना और किसकी तरह प्रिय हो?
देखा जो चांद को, फीका लगा वो
तुम्हारे सामने, मैंने कहा उससे
नहीं, तुममें नहीं वो बात
जो है मेरे प्रिये में
चांद गुर्राया, कहा
ऐसी क्या बात है उसमें
जो मुझमें नहीं
उसकी नजरों का जादू
नहीं है तुम्हारे पास
तभी मेरी नजर गयी
नीले विस्तृत आकाश की ओर
सुंदर, अति सुंदर, किंतु
इस विस्तृत आकाश में वो बात नहीं
वो विस्तार नहीं, जो मेरे प्रिये के प्रेम में है
तभी आकाश में छाये काले बादल ने
मुस्कुरा कर कहा, मेरे बारे में
क्या है तुम्हारी राय?
मैंने कहा, मोहक, मादक
किंतु, मेरे प्रिये की मोहकता और मादकता
तो अद्भुत है, तुम में वो बात नहीं
जब देखती हूं उसे तो नेत्र थकते नहीं
भान होता है, अभी तो कुछ देखा नहीं
नशा तो उसके प्रेम में इतना है
कि
बिना स्पर्श के भी मुझे कर देता है मदहोश
महसूस होती है उसकी उपस्थिति
तभी एहसास हुआ निरर्थक है किसी से तुम्हारी तुलना
क्योंकि कोई मुझे तुम सा लगता नहीं
कितना है प्रेम तुमसे प्रिये
ये तो नहीं ज्ञात मुझे
लेकिन मेरी हर सांस पर अंकित है तुम्हारी छाप
अनमोल हो तुम मेरे लिए,
जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता मेरे जीवन में
क्योंकि मुझे है तुमसे असीम और अथाह प्रेम
रजनीश आनंद
12-10-16
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
प्रेमपाश
वो डोर कौन सी है
जो दिखती तो नहीं
पर महूसस होती है
जिसने बांध रखा है
मुझे तुम्हारे प्रेमपाश में
अद्भुत है इसकी जकड़न
दम घुटता नहीं, बल्कि
मन खिल उठता है
सांस रूकती तो है
पर, जब आती है
तो दमक उठता है चेहरा
हां, जानती हूं मैं यह है
तुम्हारे प्रेम की डोर
थामे इस डोर को
जीना चाहती हूं मैं
कांधे पर तुम्हारे
सिर रखकर बुनना
चाहती हूं सपने
जानते हो प्रिये
कहते हैं लोग
अच्छी नहीं होती
‘अति’ किसी भी चीज की
लेकिन मैं कहती हूं
गलत है ये, क्योंकि
तुम्हारे प्रेम की ‘अति’
तो मनमोहक है
जिसने बांध रखा है
मुझे तुमसे हमेशा के लिए
रजनीश आनंद
10-07-16
जो दिखती तो नहीं
पर महूसस होती है
जिसने बांध रखा है
मुझे तुम्हारे प्रेमपाश में
अद्भुत है इसकी जकड़न
दम घुटता नहीं, बल्कि
मन खिल उठता है
सांस रूकती तो है
पर, जब आती है
तो दमक उठता है चेहरा
हां, जानती हूं मैं यह है
तुम्हारे प्रेम की डोर
थामे इस डोर को
जीना चाहती हूं मैं
कांधे पर तुम्हारे
सिर रखकर बुनना
चाहती हूं सपने
जानते हो प्रिये
कहते हैं लोग
अच्छी नहीं होती
‘अति’ किसी भी चीज की
लेकिन मैं कहती हूं
गलत है ये, क्योंकि
तुम्हारे प्रेम की ‘अति’
तो मनमोहक है
जिसने बांध रखा है
मुझे तुमसे हमेशा के लिए
रजनीश आनंद
10-07-16
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016
क्योंकि मुझे भाती है यह मूढ़ता..
हां मैं मूढ़- अज्ञानी
नहीं समझ सकती
तुम्हारी ज्ञान की बातें
पर क्या करूं जो मुझे
भाती है यह मूढ़ता
जिस प्रकार एक भौंरा
गंवा अपनी आजादी
कैद हो जाना चाहता है
कमल के आगोश में
उसी तरह मैं भी
कैद होना चाहती हूं
तुम्हारी बांहों में ताकि
जब नजदीक से मैं झांकूं
तुम्हारी आंखों में तो
मैं ही मैं नजर आऊं
मैंने पढ़ लिया है उस चेहरे को
जिसे पढ़ना था मुझे
बस, अब कोई और भाता नहीं
सुनो प्रिये मेरे मन की बात
जो तुम ना समझोगे
तो कौन समझेगा
मैंने प्रेम किया है तुमसे
जो ना दे सको प्रेम
तो कोई बात नहीं
पर ये ना कहना दुबारा
कि
पढ़ लो कोई और चेहरा...
रजनीश आनंद
04-10-16
नहीं समझ सकती
तुम्हारी ज्ञान की बातें
पर क्या करूं जो मुझे
भाती है यह मूढ़ता
जिस प्रकार एक भौंरा
गंवा अपनी आजादी
कैद हो जाना चाहता है
कमल के आगोश में
उसी तरह मैं भी
कैद होना चाहती हूं
तुम्हारी बांहों में ताकि
जब नजदीक से मैं झांकूं
तुम्हारी आंखों में तो
मैं ही मैं नजर आऊं
मैंने पढ़ लिया है उस चेहरे को
जिसे पढ़ना था मुझे
बस, अब कोई और भाता नहीं
सुनो प्रिये मेरे मन की बात
जो तुम ना समझोगे
तो कौन समझेगा
मैंने प्रेम किया है तुमसे
जो ना दे सको प्रेम
तो कोई बात नहीं
पर ये ना कहना दुबारा
कि
पढ़ लो कोई और चेहरा...
रजनीश आनंद
04-10-16
रविवार, 25 सितंबर 2016
प्यार का इंद्रधनुष
अकेली बैठ जब करती हूं
मैं तुम्हारा इंतजार,
तो मन क्या कहता है
मालूम है तुम्हें प्रिये ?
चाह होती है ,
हाथ में हो तुम्हारा हाथ
और क्षितिज तक चले जायें हम
तुम्हारे प्यार के इंद्रधनुष पर बैठ
चांद को छू लूं मैं
तुम सजा दो मेरी मांग
पलाश के फूलों से
आवृत हों हम-तुम
प्रेम के लिहाफ में
लेकिन तभी अनिश्चितता की दस्तक
तोड़ देती है सपनों को
और नजर आता है
इंतजार का लंबा सफर
तो, थोड़ा अधीर होता है मन
कैसे कटेगा यह सफर?
लेकिन फिर गूंजती है
तुम्हारी कंठरागिनी
जो कहती है मुझसे
मैं तुम्हारा और तुम मेरी हो
और टूट जाता है अधीरता का मर्तबान
दिखता है खुला आकाश,तुम्हारे प्रेम का
जिसमें डैनों को फैलाकर
मैं गोते लगाना चाहती हूं
और इस तरह खत्म होता है
इंतजार का एक और दिन...
रजनीश आनंद
26-09-16
मैं तुम्हारा इंतजार,
तो मन क्या कहता है
मालूम है तुम्हें प्रिये ?
चाह होती है ,
हाथ में हो तुम्हारा हाथ
और क्षितिज तक चले जायें हम
तुम्हारे प्यार के इंद्रधनुष पर बैठ
चांद को छू लूं मैं
तुम सजा दो मेरी मांग
पलाश के फूलों से
आवृत हों हम-तुम
प्रेम के लिहाफ में
लेकिन तभी अनिश्चितता की दस्तक
तोड़ देती है सपनों को
और नजर आता है
इंतजार का लंबा सफर
तो, थोड़ा अधीर होता है मन
कैसे कटेगा यह सफर?
लेकिन फिर गूंजती है
तुम्हारी कंठरागिनी
जो कहती है मुझसे
मैं तुम्हारा और तुम मेरी हो
और टूट जाता है अधीरता का मर्तबान
दिखता है खुला आकाश,तुम्हारे प्रेम का
जिसमें डैनों को फैलाकर
मैं गोते लगाना चाहती हूं
और इस तरह खत्म होता है
इंतजार का एक और दिन...
रजनीश आनंद
26-09-16
शनिवार, 24 सितंबर 2016
मुझे तुमसे जो हो गया है प्रेम...
मुझे तुमसे जो हो गया है प्रेमलगता है बावली हो गयी हूं मैं
सोचती हूं अहा!
कितना हसीन होगा वो पल
जब होगे तुम मेरे सम्मुख और खुशी से
भर आयीं होगी मेरी आंखें
समझ नहीं पाऊंगी कि क्या करूं मैं
निहारूंगी तुम्हारा मुखमंडल
या बाहों में समा जाऊंगी
या छू लूंगी तुम्हें हौले से
या खो जाऊंगी तुम्हारी आंखों में
जिसमें सजे हैं सपने कई
जिसे सजाया है हमने मिलकर
लेकिन जानते हो तुम बड़ी दुष्ट हैं
तुम्हारी आंखें, जितना मैं झांकती हूं इनमें
खुद से दूर होती जाती हूं
काबू नहीं रहता तनमन पर
लेकिन क्या करूं मैं
भाता है मुझे यह सब
क्योंकि मुझे खुद से ज्यादा
तुमसे जो हो गया है प्रेम...
रजनीश आनंद
24-09-16
गुरुवार, 22 सितंबर 2016
...ताकि मैं भी खिल सकूं
तुम्हें एक बात बताऊं प्रिये
आज जब मैं घर के बागीचे में गयी
तो हतप्रभ थी, वर्षों से फूल के लिए तरसते
गुलाब के पौधे में खिला था एक लाल फूल
मैं भागकर उसे निहारने गयी
अद्भुत मनोहारी था उसका सौंदर्य
पूछा मैंने पौधे से इतने दिन क्यों तरसाया
अब जाकर मस्तक पर तेरे खिला है लाल फूल
मेरी बात पर वह गुर्राया, तू कौन सा
खिली थी अबतक, जैसा माली वैसा बाग
तू खिल गयी तो मैं भी खिल गया
मेरे फूल पर अलि मंडराता है प्रेम की चाह में
मैं रोज खिलता रहूंगा, जानता हूं मैं
तुझे है किसके प्रेम की चाह
तो खुल कर प्रेम निवेदन कर और मुस्कुरा
ताकि मैं भी खिल सकूं जीवंतता के साथ
रजनीश आनंद
22-09-16
आज जब मैं घर के बागीचे में गयी
तो हतप्रभ थी, वर्षों से फूल के लिए तरसते
गुलाब के पौधे में खिला था एक लाल फूल
मैं भागकर उसे निहारने गयी
अद्भुत मनोहारी था उसका सौंदर्य
पूछा मैंने पौधे से इतने दिन क्यों तरसाया
अब जाकर मस्तक पर तेरे खिला है लाल फूल
मेरी बात पर वह गुर्राया, तू कौन सा
खिली थी अबतक, जैसा माली वैसा बाग
तू खिल गयी तो मैं भी खिल गया
मेरे फूल पर अलि मंडराता है प्रेम की चाह में
मैं रोज खिलता रहूंगा, जानता हूं मैं
तुझे है किसके प्रेम की चाह
तो खुल कर प्रेम निवेदन कर और मुस्कुरा
ताकि मैं भी खिल सकूं जीवंतता के साथ
रजनीश आनंद
22-09-16
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