शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

वो लड़की


मेरे साथ हास्टल में रूम पाटर्नर थी वो लड़की. छरहरी काया, साधारण नयननक्श, लेकिन गोरा तन. भारतीय जनमानस के लिए सुंदरता के सबसे बड़े फारमेट ‘गोरा तन’ में फिट थी वो. जब से आयी थी ब्वायफ्रेंड के बहुत किस्से थे उसके पास. मुझसे कहती- दी आप बोरिंग आइटम हो किताबों की दुनिया से बाहर आओ बाहर सब कुछ बहुत सुंदर और सेक्सी है.

अकसर बड़ी गाड़ियां उसे छोड़ने आती. महंगे गिफ्ट उसके शौक में शामिल थे. एक दिन वो बहुत खुश होकर आयी.  मैंने खिड़की से देखा लंबी सी कार से आयी थी वो. कमरे में आकर लिपट गयी मुझसे, उसके हाथ में दो गिफ्ट थे, जो उसे अलग-अलग लड़को ने दिये थे.

मैंने पूछा उससे तू मैनेज कैसे करती है इन्हें? अगर इनमें से किसी ने तुझे दूसरे के साथ देख लिया तो? सड़क पर तेरी बेइज्जती कर दी तो? वह मुस्कुराई और कहा-दी आप जानती नहीं इन साले लड़कों को, इन्हें जो चाहिए मैं देती हूं. किसी को मेरे होंठों की प्यास है तो किसी को...ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे? सेक्स ही तो करेंगे ना! मै बोरिंग आइटम उसकी बात सुनकर भक्क रह गयी थी और वह मुस्कुरा कर वाशरूम चली गयी...

रजनीश आनंद
10-12-16

औरत हूं लेकिन अब त्याग नहीं करूंगी मैं...

भागते-भागते सांस उखड़ रहे थे मेरे
पांव भी साथ नहीं दे रहे थे, देखा तो
पैर के छाले फट गये थे, उनसे अब
 खून भी रिसने लगा था
मैंने निश्चय किया, बस अब और नहीं
कब तक अनवरत मैं भागती रहूं
तुम्हारे पीछे, इस आस में कि
तुम कभी तो दोगे मेरे प्रेम को सम्मान
कभी तो तुम्हें लगेगा, मैं गैरजरूरी नहीं
हाशिये पर जीवन जीते-जीते ऊब गयी हूं
ऐसी नहीं थी मेरी प्रकृति
मेरे अंदर की आग को यूं बुझने नहीं दूंगी
मैं मिटने नहीं दूंगी अपना अस्तित्व
सही है लिखा है तुम्हारा नाम मेरे भाल पर
लेकिन तुम्हारी उपेक्षा ने धूल जमा दी है इसपर
जो रगड़ने से भी नहीं होगी साफ
अब तो कुछ पढ़ा भी नहीं जाता
सिर्फ कुछ लिखा होने का एहसास मात्र है
लेकिन मैं  कब तक यूं ही जीती रहूं
क्योंकि मैं एक औरत हूं, इसलिए इंतजार पर मजबूर रहूं
जबकि मुझे पता है कोई नहीं आने वाला
तुम तो कब का मीलों आगे चले गये
तुम मर्द हो, तुम्हें आजादी है
जब चाहो मेरा इस्तेमाल करो
इंसान से वस्तु बनाकर छोड़ दिया
पहचान खोते अपने चेहरे को मैंने देखा जो आईने में
उम्र से पहले चेहरे पर आयीं लकीरें साफ दिखीं
नहीं-नहीं और नहीं, अब नहीं घुटूंगी मैं
मुझे अपना दमकता चेहरा वापस चाहिए
आंखों में नये सपने चाहिए, जिन्हें जीना है मुझे
जिंदगी बहुत खूबसूरत है, जो दोबारा नहीं मिलेगी
मेरे पास जीने और खुश रहने की कई वजहें हैं
जो हाथ थाम कर मुझे सीने से लगाने के लिए बेचैन हैं
तो हाशिये पर नहीं अब मुखपृष्ठ पर जीना है मुझे
औरत हूं लेकिन अब और त्याग नहीं करूंगी मैं
कुछ पल अपने लिये भी जीऊंगी मैं...

रजनीश आनंद
09-12-16

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

राधा भी रश्क करे इतना प्रेम...

सुनो प्रिये
मन में जो बात है
कहना चाहती हूं तुमसे
जो तुम ना सुनोगे तो
मूक हो जाऊंगी मैं
जानते हो पानी की तरह है मेरा प्रेम
एकदम पारदर्शी, झांककर देखो
छवि दिखेगी तुम्हें अपनी
जैसे चाहो इसे ढाल लो
भर लो किसी पात्र में,
या दे दो कोई और स्वरूप
एक बार होंठों से लगाकर
तो देखो, मिट जायेगी हर प्यास
हां, पानी की तरह है मेरा प्रेम
रंगहीन, गंधहीन
जो चाहे जैसा चाहे रंग दे दो इसे
लाल, हरा, पीला या नीला
एक बार सीने से लगाकर
सराबोर कर दो इसे अपनी मादक खुशबू से
ताकि आजीवन ना मिट पाये वो महक
बस इतनी सी है ख्वाहिश
राधा भी रश्क करे
इतना प्रेम दे दो मुझे...

रजनीश आनंद
08-12-16


अब विश्वास हो चला है...

जीवन में सबकुछ बुरा नहीं
जरूरत है अच्छाइयों से
पहचान बनाने की
बुराई के अंधकार को परे रख
अच्छाई के प्रकाश को
मैंने हथेलियों में समेट लिया है
और देखो ना, साथी के रूप में
नजर आये हो तुम
हृदय को मिला है सुकून
तुम्हारे होने के आभास मात्र से
जागी हैं नयी उम्मीदें,
नयी ऊर्जा से लबरेज हूं
हां, अब अकेली नहीं मैं
जीवनपथ पर संघर्ष तो करना है मुझे
किंतु अगर लड़खड़ाई मैं
तो तुम थाम लोगे मुझे
यह विश्वास अब हो चला है
क्योंकि तुम्हारे साथ होने का अहसास
अब मजबूत हो चला है...
रजनीश आनंद
07-12-16

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

धर्मपत्नी...


हां मैं तुम्हारी धर्मपत्नी हूं
अर्धांगिनी के तमगे के साथ
अग्नि के सात फेरे ले मैं बनी थी
तुम्हारी जीवनसंगिनी
आंखों में थे अनगिनत ख्वाब
जो हकीकत ना बन पाये कभी
हां, आंसुओं का आशियाना जरूर बने
जीवनसाथी तो थे तुम मेरे
लेकिन कभी अहसास,ना हुआ साथ
हर राह पर अकेली ही चली मैं
अपने अश्रु खुद ही सहेजे
बेमानी थे विवाह के सात वचन
अर्धांगिनी तो गूढ़ अर्थ सहेजे है
साथी भी ना बनाया तुमने
हां कुछ पल का भ्रम जरूर पुष्पित हुआ
लेकिन कभी भी चांदनी रात में
तुम संग आंखें ना हुईं वाचाल
सिर्फ मशीनी देहप्रेम नहीं होती
किसी औरत की चाह!
ये बताना चाहती हूं मैं तुम्हें
चूड़ी,बिंदी और सिंदूर नहीं
और भी बहुत कुछ है धर्मपत्नी!!

रजनीश आनंद
05-12-16

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मेरी कलम और तुम

आज नीले रंग की
एक कलम खरीदी मैंने
बेसब्र थी उससे
दिल की कुछ बात
लिख डालने के लिए
उसे गिरफ्त में लिया
तो दिल को मिला कुछ सुकून
चूम कर उसे मैंने
अपने सीने से लगाया
कलम से अपना प्रेम
मैंने कभी नहीं छुपाया
प्रेमातुर हो उसकी चमकीली
नीब को ज्योंही मैंने सफेद
कागज से सटाया
बिजली सी कौंधी और
जो बरसा वह था
सिर्फ तुम्हारा नाम, तुम्हारा नाम...
रजनीश आनंद
02-12-16

क्यों चांद इशारे करता है...

ये क्या हुआ मुझे प्रिये?
क्यों चांद इशारे करता है
क्यों बादल लिपटना चाहता है
क्यों पवन चूमकर जाता है
क्यों पुष्प सजाना चाहता है
ये क्या हुआ मुझे प्रिये
क्यों चांदनी छेड़ कर है
क्यों बिजली सिहरन बन जाती है
क्यों हवा मदहोश हुई जाती है
क्यों कली देख शरमाती है
ये क्या हुआ मुझे प्रिये
क्यों आईना देख लजाती हूं
क्यों चेहरा मेरा दमकता है
क्यों बिन बोले कुछ सुन लेती हूं
क्यों किसी की चाह में तड़पती हूं
ये क्या हुआ मुझे?